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मंगलवार, 18 अप्रैल 2017

नरेंद्र श्रीवास्तव नवनीत की मनभावन आत्मकथा: कंई कूँ ने कंई नी कूँ

ठावा कवि नवनीत जी ने उनां की मनभावन आत्मकथा: कंई कूँ ने कंई नी कूँ

                              प्रो शैलेन्द्रकुमार शर्मा

मालवी ने हिंदी का ठावा कवि ने गद्यकार नरेन्द्र श्रीवास्तव ‘नवनीत’ ( 9 मार्च 1942 ई.) ने एक साथ केई माध्यमहुण से पेलां हिंदी ने फेर मालवी साहित्य को मान बड़ायो हे। उनां ने केई दसक तक हिंदी माय सर्जन कर्यो। अबार वी मालवी माय मर्ममधुर गीत, दोहा, गजल, छंद बद्ध ने मुक्त रचना पिछला दो - तीन दसक से लिखी रिया हे। मालवी कविता ने गद्य - दोई का पाट चोड़ा करवा की उनकी कोसिस चोखो रंग लई री हे। उनां की खास मालवी कविताहुण भुंसारो (2005), ‘उजाला आवा दो’ (2006), ‘सवेरा सवेरी’ (2008), कविता नी मरे रे कदी (2011), कईं तमने सुन्यो (2013) संग्रहहुण में प्रकाशित हे। उनां ने मालवी में खंडकाव्य श्रीदेवनारायण चरित (2009) ने भरत को समाजवाद (2017) की रचना भी करी हे। मालवी में गद्य की कमी से उनको मन व्यथित थो, तब वी वणी दिशा में बी सक्रिय विया। उनां ने मालवी का लोक मनीषी डॉ प्रह्लादचंद्र जोशी की मालवी में जीवनी गुदड़ी को लाल लिखी ने फेर हाल में ज उनां ने मनभावनी मालवी माय अपनी आतमकथा ‘कंई कूँ ने कंई नी कूँ’ पूरी करी हे, जिके हम लोक भाषा की बड़ी उपलब्धि कईं सकां।
नवनीत जी की काव्य प्रतिभा की उठान मालवा का लोक जीवन का घणा ने जीता जागता बिम्बहुण की बुनावट में नगे आए हे। उनकी कविताहुण में लोक के देखवा की चोखी दृष्टि समइ हे। उनां ने जिंदगी का कई रंग गीत, दोहा, गजल आदि का जरिया पेश कर्या हे, जाँ वी छोटा छोटा काव्य कथन का जरिया बी आखो पूरो वातावरण खड़ा करवा में खूब सफल रिया हे। अईं चोमासा रा दोहा की बानगी देखी सको-
फर-फर चाले बायरो, झाड़ रया रे डोल,
छेड़ो उगाड़ आँगणे, आँख्या हँस री बोल।
अई बरात-बूंदा की, बज्या मेघ रा ढोल,
दुलो पानी बाबो रे, दरवज्जो तो खोल।
जद जाड़ो अपणा पूरा साज-बाज के साथ आए हे, तब कवि उका स्वागत में भी पलक-पावड़ा बिछई ने खड़्यो हे। कवि ने जाँ केई नवा उपमान गढ़या हे तो केई व्यंजनामूलक अभिव्यक्ति भी करी हे। ‘जाड़ा रा दोहा’ का कुछ मारक अंश देखो-
झरी रियो हे मेघरो, कंई नगे नी आय,
ई दन बी आँधा हुआ, आँख्या री मिचाय।
कामला में कँपई री, कैसी ठंडी धूर,
छोरा छोरी धूजर्या, या सतवंती हूर।

           ‘सियाले’ में उनां ने मानवोचित क्रियाकलापहुण के भी दर्शन कर्या हे। वी जद अपना साथ लईने हमारे हाँपता विया सियाला से भेंट करवाए हे, तब ऊना मोसम का अंदर ने बाहर की दुनिया पे पड़वा वालो असर जीवंत हुई जाए हे। एक चित्र देखो-
दन तो निकल्यो पण, दिखे नी उजालो हे,
धुँध लई ने आयो हाँ पीर्यो सियालो हे।
आँगणे बैठ्या बूढ़ा, तापे छोरा छोरी।                        
गोबर भर्यो टोपलों, लई ने चाली गोरी।                                
जिनगी बोझे मर री, मूँडे लग्यो तालो है,
धूँध लई न आयो रे हाँपीर्यों सियालो है। (सियालो)
            मालवा में उनाला (ग्रीष्म), बसंत और फागुन की आमद के कवि ने ऊका देशज स्वभाव का सांते जोड़ी ने वर्णन कर्यो हे।
            गरमी से जुड़्या केई लोक चित्रहुण के उनां ने दोहा हुण का माध्यम से भी उकेर्यो हे। मनुष्य और चौपायों की कईं पूछां खुद जिन्दगी अपनो दाँव हारती नगे आए हे।
घर बायर रात दन बस, मूँ ती निकले हाय,
कालो हुईर्या मूंड़ा अब बरसी रे लाय।
मनक ने ढाँड़ा ढूंडे, गेरी-गेरी छाँव,
बैठी बैठी हाँफ री, जिनगी हारी दाव (गरमी का दोहा)
            बसंत की आमद पे धरती का शृंगार के कवि ने एक गीत का जरिया सरस अभिव्यक्ति दी हे। जाँ बसंत से मिलवा वास्ते बेचेन नायिका धरती ने जो आभूषण-अलंकरण धारण कर्या हे, वी बनावटी नी हुई के ऊनी ऋतुरंग से ही ज उपज्या हे। आखिर फूलां से सजी हरी चूनरी, गऊँ की गलसरी, केसूड़ी की पायल, अलसी की नथ जसा केई उपकरणहुण से सजी-धजी धरती से बसंत क्यों नी आकर्षित होएगा?
बसंत थारी अगवानी में या धरती सिनगार करे रे,
कोयल मीठा गीत गई के, मनवार सतकार करे रे।
देखो पेरी ली या हरी-हरी फूल टकी चूनड़ी,
गला में ‘गँऊ’ री गलसरी, पगड़ा पायल ‘केसूड़ी’।
आखी केसूड़ी वई री लाल।
            नवनीत जी ने सामयिक विसंगतिहुण पे भी खूब लेखनी चलई है वहीं वी कविता के लोगाँ के बीच दिनों दिन चोड़ी होती धरम ने जात पात की खाई हुण के पाटवा को माध्यम भी बनाए हे।
खुदा क्याँ हे दूसरो, ई अल्ला ई राम,
घर का झगड़ा करे, घर को काम तमाम।

नवनीत जी केई गजल बी मालवी में रची हे। उनां की गजलहुण को संग्रह ‘कंई तमने सुन्यो’ माय वी जिंदगी का केई रंग उकेरवा में कामयाब रिया हे। उनकी एक गजल की मारक क्षमता देखो, जद वी घर-संसार में डुब्या लोगां से लईने घरबार छोडीने बाबा बन्या लोगां की खबर ले हे:
दुनियाँ से दूर तपी रिया, बाबाजी।
ईसवर को नाम जपी रिया बाबाजी।

मन मार मार के लगायो माला मेँ ,
संसारी सुख के छली रिया बाबाजी।

रंग रंगीला मुखडा पे मौन साध्यो
आज बोल के ईं छपी रिया, बाबाजी।

राखोडो खई के तेज बढायो हे,
हिरदा-हिरदा से नपी रिया बाबाजीl

सीख कड़वी या दुनियाँ नी माने हे
नवनीत घणा ईं कंपी रिया बाबाजी।

 नवनीत जी ने संस्कृत ने हिंदी से केई खास रचनाहुण को अनुवाद भी कर्यो हे, उदाहरण सारू तुलसी कृत रामचरितमानस, जानकी मंगल,  भरथरी का तीनी शतक- नीति, शृंगार ने वैराग्य। मालवी गद्य की परगति में भी वी लगातार लग्या हुआ हे। अच्छा गद्य के कवि को निकष मान्यो ग्यो हे। संस्कृत की उक्ति हे, गद्यं कवीनां निकषं वदन्ति। इको अरथ हे गद्य लेखन ही कवि होवा की सामर्थ्य की कसोटी होए हे अर्थात, जो कवि जितरो साफ सुथरो, गठ्यो हुओ, सारवान ने असर डालवा वालो गद्य लिखी सके हे, ऊ उतरो ज बड़ो कवि बी होय हे। हमारे किणी कवि को मूल्यांकन करनो होए तो ऊका द्वारा लिख्या ग्या गद्य को अध्ययन ने मीमांसा करनो चईये। नवनीत जी जितरा कविता माय सफल हे, उतरा गद्य माय बी निपुण हे। उनाँ की अविराम साहित्य साधना को एक ओर महेकतो फूल हमारे सामे हे, नवनीत जी की मालवी माय रची आतमकथा - कंई कूँ ने कंई नी कूँ। आधुनिक युग के गद्य को युग बोल्यो जाए हे। इणी गद्य साहित्य को परमाण बड़तो जई रियो हे, पण फेर बी गद्य की केई विधा हुण आज तक उपेक्षित ही हे। हिंदी साहित्य के ज देखां तो इणां माय संस्मरण, आतमकथा, जीवनी, यात्रा वृत्तांत, रेखाचित्र, डायरी जसी केई विधा सबसे कम देखवा में अइ री हे, फेर लोक भासा की बात कई करां। जाँ तक हिंदी की आतमकथा साहित्य की परम्परा की बात हे, थोड़ी सी कृतिहुण चरचा में आए हे, जेसे भारतेंदु की कुछ आप बीती कुछ जग बीती, डॉ राजेन्द्र प्रसाद की आत्मकथा, राहुल सांकृत्यायन की मेरी जीवन गाथा, पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ की आत्मकथा अपनी खबर, डॉ हरिवंशराय बच्चन की चार खण्ड में लिखी थकी आत्मकथा- क्या भूलूँ क्या याद करूँ, नीड़ का निर्माण फिर, बसेरे से दूर, दशद्वार से सोपान तक,  यशपाल द्वारा तीन खण्ड में लिखी गी आतमकथा सिंहावलोकन आदि। हिंदी माय कुछ आतमकथा स्त्री ने दलित साहित्यकार हुण ने बी लिखी हे, जिणां की घणी चरचा बी हुई। इनमें खास हे,  मोहनदास नैमिशराय की अपने-अपने पिंजरे, ओमप्रकाश वाल्मीकि की जूठन, मैत्रेयी पुष्पा की कस्तूरी कुण्डल बसै, तुलसीराम की मुर्दहिया और मणिकर्णिका, श्यौराज सिंह ‘बैचेन’ की  मेरा बचपन मेरे कंधों पर आदि।  मालवी समेत लोक भासा हुण माय आतमकथा की परंपरा देखवा के बी नी मले हे। म्हारे लगे के मालवी ज ही नी, सगळी लोक भासा हुण माय नवनीत जी या आतमकथा के पेलां पेल की आतमकथा कई सकां।

आतमकथा में व्यक्ति खुद अपना जीवन की कथा के यादगार पलहुण के आधार पे लिखे हे। इणी विधा में लेखक को  निष्पक्ष होनो भोत जरूरी हे। अपणा गुण ने दोष सगळा को तटस्थ विश्लेषण करनो चहिए ने काल्पनिक बात ने घटनाहुण से बचनो चहिए। फेर वर्णन करता टेम पे घणो प्रवाह ने घणी रोचकता भी जरूरी वे। नवनीत जी की आतमकथा कंई कूँ ने कंई नी कूँ इणी प्रतिमान हुण पे खरी उतरी हे। इणी आतमकथा माय नवनीत जी का जीवन का केई रंग, केई अनुभव, केई संघर्ष ने केई व्यथा कथा मले हे। इणी आतमकथा को उद्देश्य पाठक के अपनी संघर्ष कथा के सुनावा से ज्यादा उनके दुनिया माय सामे आवा वाली मुसीबत हुण से लड़वा की तैयारी करवाणो हे। नवनीत जी ने लिख्यो बी हे, ‘म्हारी जिनगी में असो तो हे, के दुनियां रा लोग उके बांची ने साहस से मुसीबतां को सामनो करी के अपणा लक्ष्य तक पोची सकेगा। ने अपणा जीवन के सफल बनई सकेगा।‘ वी सुरु से ज पुरुषारथ करता अइ रिया हे, पण जद उनने देख्यो के केवल करम से ज कई नी वे भाग बी होनो चईये तो उनांने माननो पड्यो, ‘म्हारो यो बिसवास रियो के अणी दुनिया में करम से सब कंई पई सकांI पण पोन सो बरस की इणी उमर में इणा नतीजा पे पोच्यों के करम का सांते भाग बी होनो ज़रुरी हेI मनख़ सोचे कंई ने सोच्यो साकार करवा सारु भरपूर करम बी करे पण भाग कंई से कंई मोड़ी दे याने आगेज नी बढ़वा दे। भाग जो चावे ऊज होय हेI मण चायो करम रा बाद कमज होय हे या नीज होय।‘ नवनीत जी का सामे या चुनोती बी थी के आत्मकथा में अपना जीवन के पारदरसी ढंग से रखणो जरूरी हे, ईमे वी काफी हद तक कामयाब बी रिया हे। उनां ने अपना आतमकथा लेखन की परक्रिया का बारा में लिख्यो हे, ‘वेचार आयो आतमकथा तो लिखां ई। थोड़ो लिख़नो बी सिरु कर्यो ने वेचार आयो, कंई आतमकथा सई सई लीखां। सई सई लिखनी बडो मुसकल हेI हर मनख में कमजोरी होय। मनख मे जा सदगुण होय वां दुरगुण बी होय। या यूं कई सका के बखत मन की कमजोरी को फायदो उठइ के नाजाईज़ काम बी करवई ले। असो ऊज करे, जिका संस्कार पक्का नी होय ओर जिका संस्कार पक्का नी होय, ऊ डगमगई जाय ने गरीबी का हालत तो पतन का खाड़ा में गिरई केज माने। बाद में उके पछतानो होय पण मजबूरी असी के उको मन बी बस में नी रेवे। उकी मति भिरष्ट हुई जाय ने ऊ नी चाता हुया बी अनैतिक काम करवा लगे। म्हारे तो यो पक्को बिसवास हुईग्यो हे के मनख जो बी करे, ऊ भगवान की प्रेरणा से ई करे। चाय ऊ अच्छी या बुरो काम करेI वणी के इणा जगत में जो जो काम करवाना हे, ऊज करनो पड़ेगा।‘

इणी आतमकथा की सुरुआत नवनीत जी ने अपना जनम का गाम झोंकर, जिला शाजापुर का परिचय से करी हे, जाँ पे उनको बचपन बित्यो थो। गाम ने घर परवार का वातावरण ने उनां के केई संस्कार दिया, जिकी बानगी हम शुरुआत का केई रोचक प्रसंग में देखी सकां। इणी प्रसंगहुण माय हमारे एक ऐसा दोर का लोक जीवन की झांकी देखवा के मले हे, जीनी बखत लोग बाग भोत सादगी से ने बिना किणी परकार का आडम्बर के रेता था। झोंकर में शुरूआती शिक्षा, उज्जैन का महाराजवाड़ा में हायर सेकंडरी ने फेर माधव कॉलेज में ग्रेजुएशन की पड़ई का दोरान इणी नगर का खास धार्मिक, साहित्यिक ने सांस्कृतिक माहौल ने उनां के व्यक्तित्व के खासो प्रभावित कर्यो थो, इके बहुत अच्छा ढंग से हम याँ देखी सकां। उनां का जीवन माय केई साहित्यकार आया, उनसे जुड़्या केई मार्मिक संस्मरण इणी आतमकथा की रोचकता के बड़ाए हे। काम काज ने नोकरी से लई ने परवार का पालन पोसन तक, हिंदी में क्षणिका ने गीत- नवगीत लिखवा से लई ने कविता पाठ ने प्रकाशन को सिलसिलो – इणा सब के बी नवनीत जी ने बेती वी भासा में पिरोयो हे।  साहित्य का क्षेत्र में नवनीत जी केई दशक से सक्रिय हे, पन पिछला दो तीन दसक से तो उनां ने अपनो तन, मन ने धन सब कईं मालवी का सारू अरपित करी दियो हे। मालवी को प्रचार, प्रसार ने ऊका माय लेखन ने परकाशन सारू किया ग्या उनां का जी तोड़ परयास के हम पोथी का उत्तरार्ध वाला हिस्सा में देखी सकां हाँ। वी खुद मालवी माय लेखन, अनुवाद ने प्रकाशन में जुट्या रे ने नवी पीड़ी के भी आगे बड़ावा सारू खूब काम करे हे। मालवी का ठावा कवि श्री झलक निगम का साथे मिली ने मालवी माय पत्रिका को अभाव के खतम करवा वास्ते फूल पाती ने जगर मगर की सुरुआत करी। इणा पत्रिका माय उनां ने केई पेलां का लोगां के जोड्यो तो नई उछेर के बी आगे बड़ायो। इणी पत्रिका हुण का प्रकाशन की मुस्कल भरी यात्रा बी इणी आतमकथा माय समइ हे। जमुनादेवी लोक साहित्य संस्थान की संकल्पना, मालवी चोपाल की सुरुआत, केई किताब हुण को लेखन ने प्रकासन की प्रक्रिया के विस्तार से नवनीत जी ने वर्णन कर्यो हे। उनां की बेटी रचना नन्दिनी सक्सेना बी लेखन में जुटी गी हे, उनां की पोथीहुण का प्रकासन की कथा बी इणी आतमकथा माय अइ हे।

श्रीवास्तव जी ने भारतीय भाषाहुण से केई खास कृति हुण को मालवी में उल्थो कर्यो हे। केई दफा साधारण सा दिखवा वाला कथन को अनुवाद जद मुस्कल हुई जाए तो साहित्य, खास तोर पे कविता को उल्थो तो भोत कठन ने चुनोती देवा वालो होए हे। पण नवनीत जी इणी चुनोती का सामना करवा में अगवान हे। इणी आतमकथा माय उनां ने अपणा एसाज अनुवाद काम को जिकर भी कर्यो हे, जिणां में रामचरित मानस ने भरतरी का तीन सतक खास हे। भरतरी का तीनी सतक को अनुवाद हिंदी ने दूसरी केई भाषाहुण में वियो हे, पण लोक भाषा मालवी में पद्यानुवाद को बड़ो काम हात में लईने नवनीत जी ने बोत बड़ी चुनोती स्वीकार करी थी। तीन साल तक वी इणी काम में लग्या रिया ने केई बार मुसकल देखी ने घबराया बी, पण आखर में वी सफल हुआ हे। मालवी भरथरी सतक शीर्षक से हाल में ज प्रकाशित इणी अनुवाद माय उनां ने केई प्रसंग में भरतरी का भाव को विस्तार कर्यो हे तो कई जगा कठन से कठन बात के बी बड़ी सहजता से मालवी पद्य में राखी दी हे। सिंगार वर्णन का मोका पे कईं बी उनां प्रसंग के अश्लील नी बनवा दियो हे। कुछेक बानगी देखो:
मोटा, लांबा ने काला जेरीला सांप खई जाय,
वी भयानक नी, दवई कर्या ती जेर उतरी जाय,
पण लांबी, मोटी, जंघा ने तेडी मोया' वाली कामनी काट्रयो मनख, भोंया वाली
कामनी काट्यो मनख दवई कर्या नी बची पाय।

पांची इंदरी मनख के काम में ई लगई रखे
इनमे ती एक की किरिया, ग्यान के दबई रखे,
ऊ काम सुख पई, परमारथ ग्यान भूलें, इंद्री हुण
उके अपनो लक्ष भुलाय ने काम में फंसई रखे।

जो जोबन मदिरा छके, उपे काम को कोप हे रे,
उके मिरगी आय, तन टूटे, आँख्या नचाय हे रे,
मिरगी दवई ती ठीक हुई जाय हे, पण इणी रोग पे
कोई दवई, जंतर नी लगे, यो रोग बुरो है रे।

कामी मनख धन जोबन, काम आय दे झोक।
बेरा अपनी अदा ती, ग्यान, सोच दे रोक।।

नवनीत जी लोक का प्रति गेरी निष्ठा रखवा वाला कवि ने गद्यकार हे। वी इणा सारू दन रात लग्या रे हे। पचत्तर साल की उम्मर का पड़ाव पे बी उनां को उत्साह ने नवा नवा रचवा की साध देखवा लायक हे। इणी आतमकथा माय उनां को यो उत्साह ने लिखवा की उमंग जगे जगे नगे आए। वी इणी तरा माँ मालवी खोली भरता रे, ऐसी कामना हर मालवी परेमी की हे।

प्रो शैलेन्द्रकुमार शर्मा
आचार्य एवं कुलानुशासक
विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन
ई मेल : shailendrasharma1966@gmail.com