मालवा भारत का ह्रदय अंचल है. मालवा और उसकी भाषा ,साहित्य एवं संस्कृति सुदूर अतीत से निरंतर प्रवहमान है. इसे सहेजना भारतीय संस्कृति को सहेजना है.इसी की एक कोशिश है...
पेज
- मुखपृष्ठ
- हिंदी विश्व | Hindi Vishwa - Prof. Shailendra Kumar Sharma https://drshailendrasharma.blogspot.com
- e - Content : Online Study Material - Hindi | Prof. Shailendra Kumar Sharma | ई - कंटेंट : ऑनलाइन स्टडी मैटेरियल - हिंदी - प्रो. शैलेंद्र कुमार शर्मा
- Sanskriti Vimarsh - Prof. Shailendra Kumar Sharma | संस्कृति विमर्श - प्रो. शैलेंद्र कुमार शर्मा https://shailendrakumarsharma.wordpress.com
Folklore लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
Folklore लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
मंगलवार, 28 अप्रैल 2020
Interview of Prof. Shailendra Kumar Sharma on Malvi Language & Folklore मालवी लोक संस्कृति पर प्रो. शैलेंद्रकुमार शर्मा से साक्षात्कार
Interview of Prof. Shailendra Kumar Sharma on Malvi Language & Folklore by Hemlata Sharma Bholi Ben
रविवार, 5 अगस्त 2018
Kabir : Chetavani Bhajan कबीर की चेतावनी: लोक जीवन के विविध रूपकों के जरिए जीवन-मर्म को उद्घाटित करती रम्य रचना
कबीर की चेतावनी: लोक जीवन के विविध रूपकों के जरिए जीवन-मर्म को उद्घाटित करती रम्य रचना
यूट्यूब लिंक पर जाएँ।
शैलेंद्रकुमार शर्मा Shailendrakumar Sharma
मालवी लोक संस्कृति: Malvi Diwas Malvi Folklore
मंगलवार, 18 अप्रैल 2017
नरेंद्र श्रीवास्तव नवनीत की मनभावन आत्मकथा: कंई कूँ ने कंई नी कूँ
ठावा कवि नवनीत जी ने उनां की मनभावन आत्मकथा: कंई कूँ ने कंई नी कूँ
प्रो शैलेन्द्रकुमार शर्मा
मालवी ने हिंदी का ठावा कवि ने गद्यकार नरेन्द्र श्रीवास्तव ‘नवनीत’ ( 9 मार्च 1942 ई.) ने एक साथ केई माध्यमहुण से पेलां हिंदी ने फेर मालवी साहित्य को मान बड़ायो हे। उनां ने केई दसक तक हिंदी माय सर्जन कर्यो। अबार वी मालवी माय मर्ममधुर गीत, दोहा, गजल, छंद बद्ध ने मुक्त रचना पिछला दो - तीन दसक से लिखी रिया हे। मालवी कविता ने गद्य - दोई का पाट चोड़ा करवा की उनकी कोसिस चोखो रंग लई री हे। उनां की खास मालवी कविताहुण भुंसारो (2005), ‘उजाला आवा दो’ (2006), ‘सवेरा सवेरी’ (2008), कविता नी मरे रे कदी (2011), कईं तमने सुन्यो (2013) संग्रहहुण में प्रकाशित हे। उनां ने मालवी में खंडकाव्य श्रीदेवनारायण चरित (2009) ने भरत को समाजवाद (2017) की रचना भी करी हे। मालवी में गद्य की कमी से उनको मन व्यथित थो, तब वी वणी दिशा में बी सक्रिय विया। उनां ने मालवी का लोक मनीषी डॉ प्रह्लादचंद्र जोशी की मालवी में जीवनी गुदड़ी को लाल लिखी ने फेर हाल में ज उनां ने मनभावनी मालवी माय अपनी आतमकथा ‘कंई कूँ ने कंई नी कूँ’ पूरी करी हे, जिके हम लोक भाषा की बड़ी उपलब्धि कईं सकां।
प्रो शैलेन्द्रकुमार शर्मा
मालवी ने हिंदी का ठावा कवि ने गद्यकार नरेन्द्र श्रीवास्तव ‘नवनीत’ ( 9 मार्च 1942 ई.) ने एक साथ केई माध्यमहुण से पेलां हिंदी ने फेर मालवी साहित्य को मान बड़ायो हे। उनां ने केई दसक तक हिंदी माय सर्जन कर्यो। अबार वी मालवी माय मर्ममधुर गीत, दोहा, गजल, छंद बद्ध ने मुक्त रचना पिछला दो - तीन दसक से लिखी रिया हे। मालवी कविता ने गद्य - दोई का पाट चोड़ा करवा की उनकी कोसिस चोखो रंग लई री हे। उनां की खास मालवी कविताहुण भुंसारो (2005), ‘उजाला आवा दो’ (2006), ‘सवेरा सवेरी’ (2008), कविता नी मरे रे कदी (2011), कईं तमने सुन्यो (2013) संग्रहहुण में प्रकाशित हे। उनां ने मालवी में खंडकाव्य श्रीदेवनारायण चरित (2009) ने भरत को समाजवाद (2017) की रचना भी करी हे। मालवी में गद्य की कमी से उनको मन व्यथित थो, तब वी वणी दिशा में बी सक्रिय विया। उनां ने मालवी का लोक मनीषी डॉ प्रह्लादचंद्र जोशी की मालवी में जीवनी गुदड़ी को लाल लिखी ने फेर हाल में ज उनां ने मनभावनी मालवी माय अपनी आतमकथा ‘कंई कूँ ने कंई नी कूँ’ पूरी करी हे, जिके हम लोक भाषा की बड़ी उपलब्धि कईं सकां।
नवनीत जी की काव्य प्रतिभा की उठान मालवा का लोक जीवन का घणा ने जीता जागता बिम्बहुण की बुनावट में नगे आए हे। उनकी कविताहुण में लोक के देखवा की चोखी दृष्टि समइ हे। उनां ने जिंदगी का कई रंग गीत, दोहा, गजल आदि का जरिया पेश कर्या हे, जाँ वी छोटा छोटा काव्य कथन का जरिया बी आखो पूरो वातावरण खड़ा करवा में खूब सफल रिया हे। अईं चोमासा रा दोहा की बानगी देखी सको-
फर-फर चाले बायरो, झाड़ रया रे डोल,
छेड़ो उगाड़ आँगणे, आँख्या हँस री बोल।
अई बरात-बूंदा की, बज्या मेघ रा ढोल,
दुलो पानी बाबो रे, दरवज्जो तो खोल।
जद जाड़ो अपणा पूरा साज-बाज के साथ आए हे, तब कवि उका स्वागत में भी पलक-पावड़ा बिछई ने खड़्यो हे। कवि ने जाँ केई नवा उपमान गढ़या हे तो केई व्यंजनामूलक अभिव्यक्ति भी करी हे। ‘जाड़ा रा दोहा’ का कुछ मारक अंश देखो-
झरी रियो हे मेघरो, कंई नगे नी आय,
ई दन बी आँधा हुआ, आँख्या री मिचाय।
कामला में कँपई री, कैसी ठंडी धूर,
छोरा छोरी धूजर्या, या सतवंती हूर।
‘सियाले’ में उनां ने मानवोचित क्रियाकलापहुण के भी दर्शन कर्या हे। वी जद अपना साथ लईने हमारे हाँपता विया सियाला से भेंट करवाए हे, तब ऊना मोसम का अंदर ने बाहर की दुनिया पे पड़वा वालो असर जीवंत हुई जाए हे। एक चित्र देखो-
दन तो निकल्यो पण, दिखे नी उजालो हे,
धुँध लई ने आयो हाँ पीर्यो सियालो हे।
आँगणे बैठ्या बूढ़ा, तापे छोरा छोरी।
गोबर भर्यो टोपलों, लई ने चाली गोरी।
जिनगी बोझे मर री, मूँडे लग्यो तालो है,
धूँध लई न आयो रे हाँपीर्यों सियालो है। (सियालो)
मालवा में उनाला (ग्रीष्म), बसंत और फागुन की आमद के कवि ने ऊका देशज स्वभाव का सांते जोड़ी ने वर्णन कर्यो हे।
गरमी से जुड़्या केई लोक चित्रहुण के उनां ने दोहा हुण का माध्यम से भी उकेर्यो हे। मनुष्य और चौपायों की कईं पूछां खुद जिन्दगी अपनो दाँव हारती नगे आए हे।
घर बायर रात दन बस, मूँ ती निकले हाय,
कालो हुईर्या मूंड़ा अब बरसी रे लाय।
मनक ने ढाँड़ा ढूंडे, गेरी-गेरी छाँव,
बैठी बैठी हाँफ री, जिनगी हारी दाव (गरमी का दोहा)
बसंत की आमद पे धरती का शृंगार के कवि ने एक गीत का जरिया सरस अभिव्यक्ति दी हे। जाँ बसंत से मिलवा वास्ते बेचेन नायिका धरती ने जो आभूषण-अलंकरण धारण कर्या हे, वी बनावटी नी हुई के ऊनी ऋतुरंग से ही ज उपज्या हे। आखिर फूलां से सजी हरी चूनरी, गऊँ की गलसरी, केसूड़ी की पायल, अलसी की नथ जसा केई उपकरणहुण से सजी-धजी धरती से बसंत क्यों नी आकर्षित होएगा?
बसंत थारी अगवानी में या धरती सिनगार करे रे,
कोयल मीठा गीत गई के, मनवार सतकार करे रे।
देखो पेरी ली या हरी-हरी फूल टकी चूनड़ी,
गला में ‘गँऊ’ री गलसरी, पगड़ा पायल ‘केसूड़ी’।
आखी केसूड़ी वई री लाल।
नवनीत जी ने सामयिक विसंगतिहुण पे भी खूब लेखनी चलई है वहीं वी कविता के लोगाँ के बीच दिनों दिन चोड़ी होती धरम ने जात पात की खाई हुण के पाटवा को माध्यम भी बनाए हे।
खुदा क्याँ हे दूसरो, ई अल्ला ई राम,
घर का झगड़ा करे, घर को काम तमाम।
नवनीत जी केई गजल बी मालवी में रची हे। उनां की गजलहुण को संग्रह ‘कंई तमने सुन्यो’ माय वी जिंदगी का केई रंग उकेरवा में कामयाब रिया हे। उनकी एक गजल की मारक क्षमता देखो, जद वी घर-संसार में डुब्या लोगां से लईने घरबार छोडीने बाबा बन्या लोगां की खबर ले हे:
दुनियाँ से दूर तपी रिया, बाबाजी।
ईसवर को नाम जपी रिया बाबाजी।
मन मार मार के लगायो माला मेँ ,
संसारी सुख के छली रिया बाबाजी।
रंग रंगीला मुखडा पे मौन साध्यो
आज बोल के ईं छपी रिया, बाबाजी।
राखोडो खई के तेज बढायो हे,
हिरदा-हिरदा से नपी रिया बाबाजीl
सीख कड़वी या दुनियाँ नी माने हे
नवनीत घणा ईं कंपी रिया बाबाजी।
नवनीत जी ने संस्कृत ने हिंदी से केई खास रचनाहुण को अनुवाद भी कर्यो हे, उदाहरण सारू तुलसी कृत रामचरितमानस, जानकी मंगल, भरथरी का तीनी शतक- नीति, शृंगार ने वैराग्य। मालवी गद्य की परगति में भी वी लगातार लग्या हुआ हे। अच्छा गद्य के कवि को निकष मान्यो ग्यो हे। संस्कृत की उक्ति हे, गद्यं कवीनां निकषं वदन्ति। इको अरथ हे गद्य लेखन ही कवि होवा की सामर्थ्य की कसोटी होए हे अर्थात, जो कवि जितरो साफ सुथरो, गठ्यो हुओ, सारवान ने असर डालवा वालो गद्य लिखी सके हे, ऊ उतरो ज बड़ो कवि बी होय हे। हमारे किणी कवि को मूल्यांकन करनो होए तो ऊका द्वारा लिख्या ग्या गद्य को अध्ययन ने मीमांसा करनो चईये। नवनीत जी जितरा कविता माय सफल हे, उतरा गद्य माय बी निपुण हे। उनाँ की अविराम साहित्य साधना को एक ओर महेकतो फूल हमारे सामे हे, नवनीत जी की मालवी माय रची आतमकथा - कंई कूँ ने कंई नी कूँ। आधुनिक युग के गद्य को युग बोल्यो जाए हे। इणी गद्य साहित्य को परमाण बड़तो जई रियो हे, पण फेर बी गद्य की केई विधा हुण आज तक उपेक्षित ही हे। हिंदी साहित्य के ज देखां तो इणां माय संस्मरण, आतमकथा, जीवनी, यात्रा वृत्तांत, रेखाचित्र, डायरी जसी केई विधा सबसे कम देखवा में अइ री हे, फेर लोक भासा की बात कई करां। जाँ तक हिंदी की आतमकथा साहित्य की परम्परा की बात हे, थोड़ी सी कृतिहुण चरचा में आए हे, जेसे भारतेंदु की कुछ आप बीती कुछ जग बीती, डॉ राजेन्द्र प्रसाद की आत्मकथा, राहुल सांकृत्यायन की मेरी जीवन गाथा, पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ की आत्मकथा अपनी खबर, डॉ हरिवंशराय बच्चन की चार खण्ड में लिखी थकी आत्मकथा- क्या भूलूँ क्या याद करूँ, नीड़ का निर्माण फिर, बसेरे से दूर, दशद्वार से सोपान तक, यशपाल द्वारा तीन खण्ड में लिखी गी आतमकथा सिंहावलोकन आदि। हिंदी माय कुछ आतमकथा स्त्री ने दलित साहित्यकार हुण ने बी लिखी हे, जिणां की घणी चरचा बी हुई। इनमें खास हे, मोहनदास नैमिशराय की अपने-अपने पिंजरे, ओमप्रकाश वाल्मीकि की जूठन, मैत्रेयी पुष्पा की कस्तूरी कुण्डल बसै, तुलसीराम की मुर्दहिया और मणिकर्णिका, श्यौराज सिंह ‘बैचेन’ की मेरा बचपन मेरे कंधों पर आदि। मालवी समेत लोक भासा हुण माय आतमकथा की परंपरा देखवा के बी नी मले हे। म्हारे लगे के मालवी ज ही नी, सगळी लोक भासा हुण माय नवनीत जी या आतमकथा के पेलां पेल की आतमकथा कई सकां।
आतमकथा में व्यक्ति खुद अपना जीवन की कथा के यादगार पलहुण के आधार पे लिखे हे। इणी विधा में लेखक को निष्पक्ष होनो भोत जरूरी हे। अपणा गुण ने दोष सगळा को तटस्थ विश्लेषण करनो चहिए ने काल्पनिक बात ने घटनाहुण से बचनो चहिए। फेर वर्णन करता टेम पे घणो प्रवाह ने घणी रोचकता भी जरूरी वे। नवनीत जी की आतमकथा कंई कूँ ने कंई नी कूँ इणी प्रतिमान हुण पे खरी उतरी हे। इणी आतमकथा माय नवनीत जी का जीवन का केई रंग, केई अनुभव, केई संघर्ष ने केई व्यथा कथा मले हे। इणी आतमकथा को उद्देश्य पाठक के अपनी संघर्ष कथा के सुनावा से ज्यादा उनके दुनिया माय सामे आवा वाली मुसीबत हुण से लड़वा की तैयारी करवाणो हे। नवनीत जी ने लिख्यो बी हे, ‘म्हारी जिनगी में असो तो हे, के दुनियां रा लोग उके बांची ने साहस से मुसीबतां को सामनो करी के अपणा लक्ष्य तक पोची सकेगा। ने अपणा जीवन के सफल बनई सकेगा।‘ वी सुरु से ज पुरुषारथ करता अइ रिया हे, पण जद उनने देख्यो के केवल करम से ज कई नी वे भाग बी होनो चईये तो उनांने माननो पड्यो, ‘म्हारो यो बिसवास रियो के अणी दुनिया में करम से सब कंई पई सकांI पण पोन सो बरस की इणी उमर में इणा नतीजा पे पोच्यों के करम का सांते भाग बी होनो ज़रुरी हेI मनख़ सोचे कंई ने सोच्यो साकार करवा सारु भरपूर करम बी करे पण भाग कंई से कंई मोड़ी दे याने आगेज नी बढ़वा दे। भाग जो चावे ऊज होय हेI मण चायो करम रा बाद कमज होय हे या नीज होय।‘ नवनीत जी का सामे या चुनोती बी थी के आत्मकथा में अपना जीवन के पारदरसी ढंग से रखणो जरूरी हे, ईमे वी काफी हद तक कामयाब बी रिया हे। उनां ने अपना आतमकथा लेखन की परक्रिया का बारा में लिख्यो हे, ‘वेचार आयो आतमकथा तो लिखां ई। थोड़ो लिख़नो बी सिरु कर्यो ने वेचार आयो, कंई आतमकथा सई सई लीखां। सई सई लिखनी बडो मुसकल हेI हर मनख में कमजोरी होय। मनख मे जा सदगुण होय वां दुरगुण बी होय। या यूं कई सका के बखत मन की कमजोरी को फायदो उठइ के नाजाईज़ काम बी करवई ले। असो ऊज करे, जिका संस्कार पक्का नी होय ओर जिका संस्कार पक्का नी होय, ऊ डगमगई जाय ने गरीबी का हालत तो पतन का खाड़ा में गिरई केज माने। बाद में उके पछतानो होय पण मजबूरी असी के उको मन बी बस में नी रेवे। उकी मति भिरष्ट हुई जाय ने ऊ नी चाता हुया बी अनैतिक काम करवा लगे। म्हारे तो यो पक्को बिसवास हुईग्यो हे के मनख जो बी करे, ऊ भगवान की प्रेरणा से ई करे। चाय ऊ अच्छी या बुरो काम करेI वणी के इणा जगत में जो जो काम करवाना हे, ऊज करनो पड़ेगा।‘
इणी आतमकथा की सुरुआत नवनीत जी ने अपना जनम का गाम झोंकर, जिला शाजापुर का परिचय से करी हे, जाँ पे उनको बचपन बित्यो थो। गाम ने घर परवार का वातावरण ने उनां के केई संस्कार दिया, जिकी बानगी हम शुरुआत का केई रोचक प्रसंग में देखी सकां। इणी प्रसंगहुण माय हमारे एक ऐसा दोर का लोक जीवन की झांकी देखवा के मले हे, जीनी बखत लोग बाग भोत सादगी से ने बिना किणी परकार का आडम्बर के रेता था। झोंकर में शुरूआती शिक्षा, उज्जैन का महाराजवाड़ा में हायर सेकंडरी ने फेर माधव कॉलेज में ग्रेजुएशन की पड़ई का दोरान इणी नगर का खास धार्मिक, साहित्यिक ने सांस्कृतिक माहौल ने उनां के व्यक्तित्व के खासो प्रभावित कर्यो थो, इके बहुत अच्छा ढंग से हम याँ देखी सकां। उनां का जीवन माय केई साहित्यकार आया, उनसे जुड़्या केई मार्मिक संस्मरण इणी आतमकथा की रोचकता के बड़ाए हे। काम काज ने नोकरी से लई ने परवार का पालन पोसन तक, हिंदी में क्षणिका ने गीत- नवगीत लिखवा से लई ने कविता पाठ ने प्रकाशन को सिलसिलो – इणा सब के बी नवनीत जी ने बेती वी भासा में पिरोयो हे। साहित्य का क्षेत्र में नवनीत जी केई दशक से सक्रिय हे, पन पिछला दो तीन दसक से तो उनां ने अपनो तन, मन ने धन सब कईं मालवी का सारू अरपित करी दियो हे। मालवी को प्रचार, प्रसार ने ऊका माय लेखन ने परकाशन सारू किया ग्या उनां का जी तोड़ परयास के हम पोथी का उत्तरार्ध वाला हिस्सा में देखी सकां हाँ। वी खुद मालवी माय लेखन, अनुवाद ने प्रकाशन में जुट्या रे ने नवी पीड़ी के भी आगे बड़ावा सारू खूब काम करे हे। मालवी का ठावा कवि श्री झलक निगम का साथे मिली ने मालवी माय पत्रिका को अभाव के खतम करवा वास्ते फूल पाती ने जगर मगर की सुरुआत करी। इणा पत्रिका माय उनां ने केई पेलां का लोगां के जोड्यो तो नई उछेर के बी आगे बड़ायो। इणी पत्रिका हुण का प्रकाशन की मुस्कल भरी यात्रा बी इणी आतमकथा माय समइ हे। जमुनादेवी लोक साहित्य संस्थान की संकल्पना, मालवी चोपाल की सुरुआत, केई किताब हुण को लेखन ने प्रकासन की प्रक्रिया के विस्तार से नवनीत जी ने वर्णन कर्यो हे। उनां की बेटी रचना नन्दिनी सक्सेना बी लेखन में जुटी गी हे, उनां की पोथीहुण का प्रकासन की कथा बी इणी आतमकथा माय अइ हे।
श्रीवास्तव जी ने भारतीय भाषाहुण से केई खास कृति हुण को मालवी में उल्थो कर्यो हे। केई दफा साधारण सा दिखवा वाला कथन को अनुवाद जद मुस्कल हुई जाए तो साहित्य, खास तोर पे कविता को उल्थो तो भोत कठन ने चुनोती देवा वालो होए हे। पण नवनीत जी इणी चुनोती का सामना करवा में अगवान हे। इणी आतमकथा माय उनां ने अपणा एसाज अनुवाद काम को जिकर भी कर्यो हे, जिणां में रामचरित मानस ने भरतरी का तीन सतक खास हे। भरतरी का तीनी सतक को अनुवाद हिंदी ने दूसरी केई भाषाहुण में वियो हे, पण लोक भाषा मालवी में पद्यानुवाद को बड़ो काम हात में लईने नवनीत जी ने बोत बड़ी चुनोती स्वीकार करी थी। तीन साल तक वी इणी काम में लग्या रिया ने केई बार मुसकल देखी ने घबराया बी, पण आखर में वी सफल हुआ हे। मालवी भरथरी सतक शीर्षक से हाल में ज प्रकाशित इणी अनुवाद माय उनां ने केई प्रसंग में भरतरी का भाव को विस्तार कर्यो हे तो कई जगा कठन से कठन बात के बी बड़ी सहजता से मालवी पद्य में राखी दी हे। सिंगार वर्णन का मोका पे कईं बी उनां प्रसंग के अश्लील नी बनवा दियो हे। कुछेक बानगी देखो:
मोटा, लांबा ने काला जेरीला सांप खई जाय,
वी भयानक नी, दवई कर्या ती जेर उतरी जाय,
पण लांबी, मोटी, जंघा ने तेडी मोया' वाली कामनी काट्रयो मनख, भोंया वाली
कामनी काट्यो मनख दवई कर्या नी बची पाय।
पांची इंदरी मनख के काम में ई लगई रखे
इनमे ती एक की किरिया, ग्यान के दबई रखे,
ऊ काम सुख पई, परमारथ ग्यान भूलें, इंद्री हुण
उके अपनो लक्ष भुलाय ने काम में फंसई रखे।
जो जोबन मदिरा छके, उपे काम को कोप हे रे,
उके मिरगी आय, तन टूटे, आँख्या नचाय हे रे,
मिरगी दवई ती ठीक हुई जाय हे, पण इणी रोग पे
कोई दवई, जंतर नी लगे, यो रोग बुरो है रे।
कामी मनख धन जोबन, काम आय दे झोक।
बेरा अपनी अदा ती, ग्यान, सोच दे रोक।।
नवनीत जी लोक का प्रति गेरी निष्ठा रखवा वाला कवि ने गद्यकार हे। वी इणा सारू दन रात लग्या रे हे। पचत्तर साल की उम्मर का पड़ाव पे बी उनां को उत्साह ने नवा नवा रचवा की साध देखवा लायक हे। इणी आतमकथा माय उनां को यो उत्साह ने लिखवा की उमंग जगे जगे नगे आए। वी इणी तरा माँ मालवी खोली भरता रे, ऐसी कामना हर मालवी परेमी की हे।
प्रो शैलेन्द्रकुमार शर्मा
आचार्य एवं हििंदी विभागाध्यक्ष
कुलानुशासक
विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन
ई मेल : shailendrasharma1966@gmail.com
विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन
ई मेल : shailendrasharma1966@gmail.com
बुधवार, 28 दिसंबर 2016
मालव भूमि की विराट शब्द-यात्रा
मालव भूमि की विराट शब्द-यात्रा: अक्षर पगडंडी
डा. शैलेन्द्रकुमार शर्मा
मालवी साहित्य और संस्कृति के अन्यतम हस्ताक्षर श्री झलक निगम (1940-2010 ई.) एक साथ अनेक दिशाओं में सक्रिय थे। उन्होंने मालवी को कई दृष्टियों से समृद्ध किया है। एक ओर उन्होंने मालवी साहित्य को अनेक महत्त्वपूर्ण कविताएँ और गद्य रचनाएँ देकर समृद्ध किया, वहीँ एक श्रेष्ठ अनुवादक, संपादक, शोधकर्ता के रूप में विविधमुखी अवदान दिया। उनकी रचनाओं में प्रयोगधर्मिता उभार पर है, जिसके लिए वे विशिष्ट पहचान रखते हैं। झलक जी का कौशल सर्वथा, अनछुए, अलक्षित विषयों को कविता में ढालने में दिखाई देता है। वे दिनों दिन बढ़ते कथित महानगरीकरण में ओझल होते लोक-जीवन के उन दृश्यों को अनायास पकड़ लेते हैं, जो हमारी जैविकता के प्रमाण रहे हैं। उनके मालवी कविता संग्रहों में ‘एरे मेरे की कविता’ (2003 ई.) एवं ‘उजालो आवा दो’ (2006) विशेष उल्लेखनीय हैं। ‘भाँत भाँत की कविता’ शीर्षक एक संग्रह उनके निधन के बाद 2011 में प्रकाशित हुआ। झलक निगम उन कवियों में एक हैं, जिन्होंने मालवी कविता की बनी-बनाई लीक को तोड़ने की कोशिश की। साथ ही अपने ढंग से उसे नए सिरे से बनाने की कोशिश भी की। मालवी या किसी अन्य लोक बोली में श्री निगम जैसे साहसी कवि कम ही नजर आते हैं, जिन्होंने पुराने और नए दौर की लोक कविता के बीच सेतु की भूमिका निभाई है। उनकी रचनाधर्मिता वर्ण्य-विषय और भाषा की एक नई दुनिया खोलती है। छन्द और लय के संस्कारों के बावजूद लोक-कविता को छंद से मुक्त करने से लेकर नई संवेदनाओं और नए विचारों को नए अंदाज में व्यक्त करने के झलक जी के प्रयत्न महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुए।
मालवी में स्वतंत्र पत्रिका के अभाव की पूर्ति सबसे पहले नरेन्द्र श्रीवास्तव ‘नवनीत’ एवं झलक निगम के संपादन में प्रकाशित ‘फूल-पाती’ से हुई, जिसके अब तक कई अंक प्रकाशित हो चुके हैं। इसी कड़ी में श्री झलक निगम के संपादन में वार्षिक पत्रिका ‘जगर मगर’ का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। उनके निधन के बाद श्री निगम की सुपुत्री जेड. श्वेतिमा निगम इसका कुशल संपादन कर रही हैं। ‘जगर मगर’ के अनेक विशेषांक प्रकाशित हुए हैं। झलक जी द्वारा संस्थापित मालवी की इन अव्यावसायिक पत्रिकाओं के प्रकाशन से आज इस क्षेत्र में बहुत बड़े अभाव की पूर्ति हो रही है।
झलक निगम लम्बे समय से मालवी की विशिष्ट शब्दावली पर कार्य कर रहे थे। उन्होंने सुगम राजपथ पर न चलते हुए अक्षर की पगडण्डी पर चलना स्वीकार किया। उनकी इस अत्यंत परिश्रमपूर्वक की गई यात्रा की उपलब्धि है यह पोथी। ‘अक्षर पगडंडी’ शीर्षक ग्रन्थ झलक जी के जीवन की बड़ी साध और साधना का साकार रूप है, जिसकी पूर्णता के लिए उन्होंने दशकों तक कार्य किया। गाँव-गाँव, डगर-डगर घूमते हुए वे एक सजग शब्द-संग्राहक के रूप में अपनी झोली भरते रहे और फिर एक जिज्ञासु की तरह उन शब्दों की व्युत्पत्ति, काल-प्रवाह में आए अर्थ परिवर्तन की मीमांसा करते रहे। यह सुखद है कि उनकी सुपुत्री जेड. श्वेतिमा निगम ने उनकी डायरी और अलग-अलग पन्नों में बिखरे इन शब्द-मोतियों को सँजोने का सार्थक उद्यम किया है, जो हमारे समक्ष है।
झलक जी स्वयं मालवी के विशिष्ट शब्दों, मुहावरों और कहावतों के सजग प्रयोक्ता भी रहे हैं। जीवन से कविता तक वे मालवी की समृद्ध शब्द-राशि का अर्थपूर्ण इस्तेमाल करते रहे। इसीलिए झलक जी की कविताएँ सही अर्थों में लोक हृदय का सार्थक प्रतिबिंब बन पड़ी हैं। वहाँ हमारे युग जीवन की आहट और सामयिक दबाव तो कारगर दिखाई देते ही है, इनसे परे जीवन के शाश्वत प्रवाह के साथ बहने का, मालवा के ऋतु-रंग और पर्यावरण में डूबने का सहज व्यापार भी मुखरित हुआ है। उनकी एक कविता में मालवी शब्दावली के सजग प्रयोग से सम्पन्न परिवेश के साथ काले बादल का खिलदंड़ापन हमें उसी तरह आनंदित करता है, जैसा किसी धरती पुत्र किसान या कामगार को। कवि हमें उसके स्वागत में मालवी लोक-संस्कृति के आचार-व्यवहार के साथ ला खड़ा कर देता है।
घणा हऊ बखत पे आया हो
म्हूँ गाम का आड़ी तो
तमारे नारेल चड़ऊँ
दूध ढोलू
दूध ढोलू
अगवानी में कंकू अखत चड़ऊँ
ओ झरता झरमट करता बादला
इसी तरह भारतीय समाज व्यवस्था के विसंगत चेहरे का साक्षात् कराती ‘हाली प्रथा’ को कवि श्री निगम ने चीन्हा और उसे अपनी कविता में साकार किया। वे देखते हैं कि आज भी बड़ी संख्या में हाली हैं, जो बंधुआ मजदूर से भी बदतर जिन्दगी जी रहे हैं। उन्हें न दिन में चैन है और न रात में आराम। उस पर यह कहावत ‘‘हाली मवाली को कई है या जात भरोसे का लायक होयज नी है।’’ हाशिये के ऐसे यशहीन लोगों की व्यथा को कवि ने गहरी सहानुभूति के साथ उकेरा।
घाणी का बैल जस भमता रेवे
फेर भी जस कोनी हाली का भाग में
दुनियां काँ जई री, ऊन्के नी मालम
देस में कून राजा कुन पाल्टी को राज।
लोकभाषाओं के शब्दकोश तो अनेक बने हैं, किन्तु विशिष्ट शब्दावली, जिसमें पारिभाषिक शब्दावली भी समाहित होती है, के विवेचनात्मक परिचय को लेकर बहुत कम कार्य ही हुए हैं।राजस्थानी, भोजपुरी, अवधी, ब्रजी जैसी कुछ लोकभाषाओं में इस तरह का कार्य हुआ है। मालवी में कथाकार स्व. चंद्रशेखर दुबे ने ‘जिंदगी के गीत’ पुस्तिका में इस तरह के चुनिन्दा शब्दों का संकलन कर परिचय दिया था। उसी पथ पर आगे चलकर श्री झलक निगम ने मालवी में इस तरह की विशिष्ट शब्दावली के संग्रह के अभाव की पूर्ति ‘अक्षर पगडंडी’ के माध्यम से की है।
लोक के शब्द लंबी यात्रा करते हैं। झलक निगम द्वारा तैयार इस कोश में ऐसे कई शब्द हैं जो काल प्रवाह में गति करते हुए अपनी पहचान को बरकरार रखे हैं। जैसे दान के रूप में अर्पित की जाने वाली अखोती, अक्षत का ही रूप है। पंचामृत दूध, दही, घी, शहद और शकर के मेल से निर्मित प्रसाद है तो पंजेरी पिसे हुए धनिये के साथ शकर या गुड़ का मिश्रण है, जो कृष्ण जन्माष्टमी पर पूजा में अर्पित किया जाता है। काशी जाना यज्ञोपवीत के अवसर पर विद्याध्ययन के लिए प्रवृत्त होने का प्रतीक है, वहीं पस्ताव तीर्थयात्रा के लिए प्रस्थान की क्रिया है, जो अपशकुन से बचाव के लिये की जाती है। इसमें तीर्थयात्री अपना सामान पहले किसी परिचित के यहाँ रख देते हैं, बाद में वास्तविक यात्रा प्रारम्भ करने पर वहीं से सामान उठा कर चल देते हैं।
इस शब्द संचयन में संकलित शब्द कई प्रकार के हैं। उदाहरण के रूप में कृषि एवं व्यवसाय संबंधी, पारंपरिक ज्ञानविज्ञानपरक, लोकाचारपरक, संस्कारपरक, क्रीड़ा, कला एवं मनोरंजनपरक, लोक-देवता एवं पर्वोत्सव संबंधी, वस्तु संबंधी, विशिष्ट क्रियापरक, शृंगार एवं वस्त्राभूषण संबंधी, लोक-विश्वासपरक आदि। संग्रह के बहुत से शब्द मालवा में प्रचलित लोकाचारों का संवहन करते हैं। उदाहरण के रूप में संजा, मांडना, हिरणी, वलसो,मौसर, नातरा, तेड़ा, मांडवो, जलवा, आदि। क्रीड़ा, कला एवं मनोरंजनपरक शब्दों में सतोलिया, माच, छुपमछई, कामण आदि को देखा जा सकता है। कृषि एवं व्यवसाय संबंधी विशिष्ट शब्दों में वखार, वावस्यां, निहरनी आदि उल्लेखनीय हैं। शृंगार एवं वस्त्राभूषण संबंधी शब्दों में कांकण, कांचली, ओढ़नी आदि को देखा जा सकता है।
झलक जी ने कई विलुत होती परम्पराओं, रीति-रिवाजों और वस्तुओं से जुड़े पारिभाषिक शब्दों को भी इस कोश में स्थान दिया है। हीड़, बेकड़ली आदि इसी प्रकार के शब्द हैं। बेकड़ली घर-घर जाकर अनाज मांगने की प्रथा है, जो अब लगभग विलुप्ति के कगार पर है। हीड़ मालवा की प्रबन्धात्मक वीरगाथा है, जो बगड़ावत के रूप में सुविख्यात है।
इस संग्रह में कई पारंपरिक ज्ञान-विज्ञानपरक शब्द भी संचित हैं, जैसे चींटियों के आवास को मालवी में कीड़ी नगरा कहा जाता है। मगर-कोदो वह पौधा है, जो जलराशि के किनारे पनपता है और उसे मगर बड़े चाव से खाता है। थुवर, थाला, थाग, तेलन (एक विशिष्ट कीड़ा), छुईमुई, छेक, घट्टी की माकड़ी, गोयरा, काबर, ओरा, हात्या आदि भी इसी प्रकार के हैं, जिनसे पारंपरिक ज्ञान का संवहन होता आ रहा है।
समग्रतः यह पोथी एक लोक-मनीषी की शब्द साधना का साकार रूप है। इस संचयन के लिए झलक जी ने बड़ी दुरूह राह अपनाई थी। मालवीप्रेमियों, साहित्यकारों के साथ ही आने वाले शोधकों के लिए उनका यह प्रयत्न अत्यंत उपयोगी और प्रेरणास्पद सिद्ध होगा, इसमें कोई संदेह नहीं।
प्रो शैलेन्द्रकुमार शर्मा
आचार्य एवं कुलानुशासक
सोमवार, 15 जून 2015
संजा लोकोत्सव: विविधरंगी लोक और जनजातीय कला प्रदर्शन
संजा लोकोत्सव : उज्जैन में प्रतिकल्पा द्वारा आयोजित संजा लोकोत्सव के अंतर्गत 15 से 21 सितम्बर 2014 तक दक्षिण मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र, [भारत सरकार], नागपुर के सौजन्य से लोक यात्रा, संजा- मांडना स्पर्धा, कला सम्मान और विविधरंगी लोक और जनजातीय कला प्रदर्शन किये गए। महाराष्ट्र का बंजारा नृत्य, गुजरात का सिद्दी धमाल, राजस्थान का कालबेलिया नृत्य, लांगा गायन, डिंडौरी [मध्यप्रदेश] का सैला कर्मा, मालवा का माच, कानग्वालिया नृत्य, गणगौर, संजा गीत आदि रम्य- रंजनकारी सिद्ध हो रहे हैं। इस अवसर पर डॉ शैलेन्द्रकुमार शर्मा, श्री वानखेडे [नागपुर], डॉ शिव चौरसिया, संस्थाध्यक्ष श्री गुलाबसिंह यादव और सचिव डॉ पल्लवी किशन विभिन्न प्रान्तों के कलाकारों के साथ दीपदीपन करते हुए, नृत्यगुरू श्री हीरालाल जौहरी के सम्मान और विविध प्रस्तुतियों की छबियाँ पेश हैं । इसी कड़ी में 21 सितम्बर को राष्ट्रीय संगोष्ठी कालिदास संस्कृत अकादेमी में संयोजित हुआ। जिसमें डॉ पूरन सहगल, डॉ मणिमोहन चवरे, डॉ शिव चौरसिया, डॉ श्रीकृष्ण जुगनू, डॉ शैलेन्द्रकुमार शर्मा, डॉ लक्ष्मीनारायण पयोधि, डॉ जगदीशचन्द्र शर्मा , डॉ पल्लवी किशन , डॉ सरिता मैकहार्ग , डॉ राजेश रावल सुशील , सन्दीप सृजन , डॉ अनिल जूनवाल आदि सहित कई संस्कृतिकर्मी शामिल रहे।
सोमवार, 9 दिसंबर 2013
मालवा के माच सहित विविध लोक आयामों को समेटता एक महत्त्वपूर्ण ग्रंथ
मालवा का लोकनाट्य माच और अन्य विधाएँ : पुस्तक समीक्षा
लोक - नाट्य की परम्परा की दृष्टि से भारत सहित सम्पूर्ण एशिया अत्यंत समृद्ध है। लोकरंजन एवं लोकोपदेश की अनायासता उसे विशिष्ट पहचान देती है।भारत के ह्रदय अंचल मालवा का लोक नाट्य माच इस क्षेत्र में यदि अपनी विलक्षण हैसियत रखता है तो इसका कारण है- माच का समावेशी व्यक्तित्व। माच सहित मालवा की विविधरंगी कला परम्पराओं पर केंद्रित पुस्तक ‘मालवा का लोक-नाट्य और अन्य विधाएं’ हाल के वर्षों के गहन शोध और विमर्श का परिणाम है। इस पुस्तक की समीक्षा सुधी साहित्यकार गफूर स्नेही की कलम से प्रस्तुत है।
समीक्षक - गफूर स्नेही
अंकुर मंच, उज्जैन द्वारा प्रकाशित एवं प्रख्यात रंग समीक्षक डा. शैलेन्द्रकुमार शर्मा द्वारा संपादित मुख्य रूप से लोक नाट्य माच पर केन्द्रित पुस्तक ‘मालवा का लोक-नाट्य और अन्य विधाएं’ हाल के वर्षों के प्रकाशनों के बीच एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है। संपादकीय में डा. शैलेन्द्रकुमार शर्मा माच को एक
सम्पूर्ण नाट्य और मालवा अंचल का मूर्त स्वरूप माना गया है। प्रकाशकीय में हफीज
खान ने इस परम्परा के समक्ष मौजूद चुनौतियों के प्रति चिंता प्रकट करते हुए
निरंतरता एवं समर्पण की आवश्यकता जताई
है । सम्पादक एवं प्रकाशक का
परिश्रम किताब में सर्वत्र परिलक्षित होता है। पुस्तक में सम्मिलित आलेखों ने मालवा के लगभग सम्पूर्ण आयामों को समेट दिया है।
जिज्ञासु एवं ज्ञान पिपासुओं के लिए पुस्तक सप्त - सिंधुओं का जल उपलब्ध कराती है।
ग्रंथ में प्रकाशित
लेख ‘भारतीय लोक-नाट्य और माच’ में देवीलाल सामर ने भरत
मुनि के लिखित भाषाई स्वरूप को जटिल नियमबद्ध कहा तो लोक बोली को सरल-सहज
लोक-नाट्य में समाहित बताया है। उन्होंने नाटक, रूपक
और नाट्य की व्याख्या के साथ लोक नाटकों की उत्पत्ति और इतिहास पर भी प्रकाश डाला
है। इनके स्रोत रामायण, महाभारत प्रमुख हैं। इनमें आंचलिक प्रेम कथाओं
के साथ मुस्लिम आक्रमणों के समय उर्दू-फारसी का सीधा प्रभाव भी बताया है।
लोक-नाट्य की विशेषताओं और तुर्रा-कलंगी का विस्तार से वर्णन है। गुंसाई और शाह
अली के बीच के दंगल का जिक्र है। तुर्रा शक्ति और कलंगी पुरुष (शिव) का प्रतीक है।
मालवा की माच परम्परा
के संवाहक सिद्धेश्वर सेन ने माच के खेल रचे भी हैं
। उनका लेख भी महत्त्वपूर्ण बन पड़ा है। उज्जैन से प्रारंभ
इस गाथा के नायक गोपाल गुरु है तो बाद में बालमुकुंद जी। माच नायक जावरा के तो
गायिका कालूराम की शिष्या। वैसे माचों में पुरुष ही स्त्री स्वांग रखते रहते हैं।
इसी प्रकार विभिन्न वाद्य एवं नृत्यों का भी उल्लेख श्री सेन ने किया है। ‘माच का दर्शन’ में डा. भगवतीलाल राजपुरोहित ने संस्कृत ग्रंथों से
बात प्रारंभ की है, जहाँ कालिदास का नाट्य दर्शन भी हैं। उन्होंने
सांख्य दर्शन से वही पुरुष-प्रकृति के बीज का माच में प्रस्फुटन होते दर्शाया है।
रंग समीक्षक डा. शैलेन्द्रकुमार शर्मा ने उज्जैन की माच परम्परा पर केन्द्रित अपने लेखों में
मालवा को विक्रमादित्य और कालिदास से लेकर भेाज-मुंज काल तक सांस्कृतिक वैभव से
पोषित बताया है। उज्जैन के माच गुरुओं का ब्यौरा प्रामाणिक है। डा. शर्मा सरल-सहज शैली में प्रभावी परिचय छोड़ते हैं। वे अंकुर मंच तक
वृत्तांत पूर्ण करते है। उनका एक आलेख 'लोकनाट्य माच : प्रदर्शन शैली और शिल्प ' माच मंच की सूक्ष्मताओं का प्रमाणिक आकलन करता है।
डा. शैलेन्द्रकुमार शर्मा ने अपने एक और संकलित आलेख में सामाजिक समरसता के महत्त्वपूर्ण सूत्र माच में तलाशे हैं।
इतना ही नहीं, उसकी महती भूमिका भी उजागर करते हैं । वेदकालीन संदर्भ से तुलसी काल तक दृष्टिपात करते
हैं। भरत मुनि के नाट्य शास्त्र से लोक-नाट्य माच तक नजर दौड़ाते हैं। उन्होंने
मालव सीमा, उससे लगे राजस्थान के ख्याल का प्रभाव और उज्जैन को
माच भूमि निरूपित किया है। समरसता के अन्तर्गत दर्शन से लेकर सामाजिक समता तथा
धार्मिक सहिष्णुता तक की भाव भूमि पर दृष्टिपात किया है। धार्मिक कथाओं का अतिरेक
नहीं, समृद्धकारी कहना उचित होगा। वीरतापूर्ण कथानकों की
भी शक्ति बताई है। लोक मंगल और साम्य भावना उभरी है। जाति एवं समाज संबंधी समस्या
पर भी माच सुधारक दृष्टि रखते रहे हैं। निष्कर्ष में वे माच को सच्चा साहित्य कहते
हैं, जो मूलतः सामाजिक-वैचारिक क्रांति का मार्ग प्रशस्त करता
है।
डा. श्यामसुन्दर निगम
ने तुर्रा-कलंगी को नौटंकी से एकदम पृथक् बताया है। लोकनुरंजन है, किंतु लोक आदर्श के साथ। मंच, बोली, वेशभूषा,
गीत-संगीत, लय-नृत्य तक की बारीकियों का
उल्लेख किया है। माच गुरुओं की फेहरिस्त सिलसिलेवार है। माच स्थल एवं विषय तथा
विधान परम्परा श्लाघनीय है।
डा. जगदीशचन्द्र
शर्मा सीधे माच को मचान से जोड़ते हैं। परवर्ती प्रांतों के साथ मालवा में
केन्द्रित माच गीतों से परिपूर्ण है। मालवा की नकल, स्वांग
कला, सवाल-जवाब का सिलसिला, सूझ
और दर्शन के साथ इतिहास और लोकजीवन से सम्मिश्रित है। इनमें गणेश, हनुमान भी लोक स्वरूप मे हैं। वे भानावत के हवाले से शेर खां पठान जैसे नायकों
को भी सम्मिलित करते हैं। इसमें प्रेम वृत्तांत, संत
चरित्र अहम स्वरूप में हैं।
डा.
शिव चौरसिया जैसे सुघर कवि-वक्ता
हैं, वैसे ही माच के पैरोकार भी। वे मालवा का प्रांत और प्रांतों
की सीमा तोड़ता परिक्षेत्रा बताते हैं। माच को सीधे लोक-नाट्य कहा है। इसकी
तुल्यता गरबा, तमाशा, नौटंकी, गबरी के समकक्ष है। डा. चैरसिया के अनुसार मुस्लिम आक्रमणों से इतिहास में जो
हुआ उसके विपरीत समृद्धि आई, नई धाराएं जुड़ीं। उज्जैन,
बड़नगर, नीमच के परिक्षेत्रा से
वर्तमान तक कलम चली है।
डा. शिवकुमार मधुर ने
माच को लोक-संस्कृति के विविध रंगों से चित्रित बताया है। माच को लोक जीवन का अपना
साहित्य भी कहा है। वैवाहिक पद्धति का चित्राण भी उनमें एक बताया। बनड़ा, बधाबा, पारसी, कामण सोदाहरण है। सती
वृत्तांत भी है, जो लोक जीवन में रचा बसा रहा। हल्दी गीत से भोजन तक
का परिदृश्य उकेरा है।
मालवी
माच में चिंतन की यात्रा नरहरि पटेल ने अपने लेख में की है। संक्षिप्त, सारगर्भित लेखन में इसे लोकरंजक बताया है। डा. प्यारेलाल सरस पंडित ने अपने
लेख में प्रभावी लोक-नाट्य माच और उसके संगीत पक्ष पर बखूबी प्रस्तुति की। चूंकि
लेखक संगीत के ज्ञाता हैं और माच की जान संगीत, वह
भी ठेठ लोक अंचल का। उन्होंने इसमें 68 रंगतें (धुनें) बताई
हैं, जो 24 लोक धुन पर आधारित हैं।
स्वयं सिद्धेश्वर सेन ने 24-25 रंगतें साधी थीं। इस पर शोध
कराना, उपादेय होगा। ढोलक, सारंगी,
हारमोनियम, क्लेरेनेट जैसे साद्यों के
साथ घुंघरू तो नर्तक के पगों में शुरू से होते हैं।
संपादक डा. शर्मा ने ‘लोक-नाट्य माच की प्रदर्शन शैली और शिल्प’ विषय
लेकर फिर उपस्थिति दर्ज की है। यह आपका अध्ययन एवं सामथ्र्य है। रंगमंचीय खूबियों
का महत्त्व तो है ही, दर्शकों को रात-रातभर जादुई कथानकों में बांधे रखना
विशेष तथ्य है। माच मंच खुला ही रहता है। जैसा सादा लोक जीवन, वैसा सादा माच मंच। मंच के रेखाचित्रा के साथ ही लेख में आधारभूत
पृष्ठभूमि का परिचय दिया है।
अशोक वक्त ने शायराना
अंदाज से ‘माच उर्फ शबे मालवा में थिरकती संस्कृति’ में बात पूरी की है। उन्हें माच में मालवा और उज्जैन को केन्द्र बनाए आसपास के
रंग बिखरे दिखे हैं। न केवल माच वरन् मांडनों से भी क्षेत्रा जाना जाता है।
तुर्रा-कलंगी वाला कथानक माच में ठेठ रूप लिए हुए है। इतना ही नहीं उन्होंने माच
की अलग-अलग रिवायतंे भी बताई हैं। क्षेत्रों का उल्लेख करते हुए तकनीक और
स्वरूप-मंच साज-सज्जा, अभिनय सहित मालवी वैभव का
कोश माच है।
मालवी कवि झलक निगम
माच के संदर्भ ‘ढोलक तान फड़क के’ में
सांगीतिकता पर बल देते हैं। उनके अनुसार सन् 1800
के आसपास राजस्थान की धारा उज्जैन की ओर आई वहीं विस्तार हुआ, जिसका सबने उल्लेख किया है। कलाकारों को रियासतें भी संरक्षक देती रही हैं।
बालमुकुन्द जी से सिद्धेश्वर सेन और युवा अनिल पांचाल तक की माच यात्रा को श्री
निगम ने सँजोया है। माच और काबुकी के तहत राजेन्द्र चावड़ा ने इतिहास में 300 वर्ष की यात्रा की है। वे इसे पूर्व की श्वेत-श्याम फिल्म कहते हैं, जो
रंगीन हो गया माच में। अभिनय, गायन और संगीत का परिपाक माच है। काबुकी में तत्कालीन राजा-महाराजाओं का जीवन
चरित्रा रहा। ये जापान के समुराई हैं, जो संस्कृति के रक्षक
हैं। सहिष्णुता से माच व्यापक होता गया है।
डा. धर्मनारायण शर्मा
ने तुर्रा-कलंगी को सांस्कृतिक, धार्मिक समन्वय का माध्यम
माना हैं जो यथार्थ के सन्निकट है। माच में भी यही देशकाल परिस्थितियों के अनुसार
आई है। उन्होंने ब्रह्म और माया का आधार तुर्रा-कलंगी परम्परा में दिखाया है।
जाहिर है कि राजा नवाब की भोग विलासिता के विरुद्ध माच विधा विकसित हुई और इसका
सद्भाव उपजाने वाला संदेश भी मुखर हुआ। यह कबीर और सूफी विचारों से प्रभावित है।
इस संदर्भ में विशद चर्चा की गई है। उदाहरण उक्तियां भी सराहनीय और विषय
प्रतिपादित करती हैं।
डा. पूरन सहगल ने यायावरी
शोध से ‘दशपुर-मालवांचल की माच परम्परा’ को अहम चर्चा का विषय बनाया। जैसे उज्जैन, वैसा
गढ़ मंदसौर को बताया है। माच के उद्भव-विकास में चंदेरी का योग बताते हुए जयसिंह
राठौर, शाहअली और तुकनगीर गुंसाई की अनिवार्य उपस्थिति
दर्ज की, जो तुर्रा-कलंगी के मूल में है। अखाड़ों में
रंगतें-लोकगीत खूब परवान चढ़े। इसी में नीमच, मल्हारगढ़,
बघाना, धसूंडी का भी जिक्र है।
इसमें संगीत, गायकी, नर्तन के समावेश का
भी उल्लेख है। मेवाड़-झालावाड़ से प्रेरित माच आज दुर्दिन देख रहा है। उन्होंने
इसे पुनर्जीवित करने की आवश्यकता बताई है।
इसी भांति डा.सुरेन्द्र
शक्तावत नीमच पर केन्द्रित तुर्रा-कलंगी अखाड़ों के इतिहास की प्रामाणिक व्याख्या
करते हैं। उन्होंने तुर्रा-कलंगी के प्रमुख खिलाडि़यों की सूची और कुछ चित्र भी
दिए हैं । मंचन से लेकर उद्देश्य, संगीत पक्ष सामाजिक सरोकार
तक को कुशलता के साथ रेखांकित किया है। माच की दृष्टि और संदेश के साथ कुछ
संग्राहकों के संग्रह राष्ट्रीय धरोहर योग्य हैं।
ललित शर्मा की कलम से
झालावाड़ की माच परम्परा की संक्षिप्त सारगर्भित प्रस्तुति की गई है। डा. पूरन
सहगल के लेख में माच से हटकर प्रदर्शनकारी लोक कलाओं के ठाठ का भी विवरण है। वे
कालबेलिया नृत्य, कच्छी घोड़ी नृत्य, घुमर
घूमरा, भुवाई, माच, रासलीला, रामलीला, बहरूपिया, विवाह अवसर के खेल तमाशे, पाबूजी, देवनारायणजी की पड़, नट, बाज़ीगर,
मदारी, सांसी, कंजर, बेड़नी नृत्य, मौजम
बहार, कठपुतली, बाना, गरबा, कालगुवालिया का उल्लेख निपुणता से करते हैं ।
मालवा की लोककलाएँ और
लोक विधाएं, लेख में डा. आलोक भावसार ने अनूठापन बताया है।
उन्होंने मांडना, गोदना, संज्ञा, चित्रावण, लोकगीत, नृत्य, माच की चर्चा की है। ये सभी वसुधैव कुटुम्बकम् का समर्थन करते हैं।
‘धन है मनक जमारो ’
में डा. विवेक चौरसिया की युवा कलम ने परम्परा के प्रति अनुराग और समर्पण जगाया है। प्रकृति के
साथ घुल मिलकर लोक जीवन में परम्पराएं बल प्रधान करती हैं। प्रत्येक माह के
तीज-त्यौहारों में समाहित लोक देवता और उनकी कृपा से जीवन में धन्यता बिखरते लोग
हम हैं, हम सब हैं।
‘मालवा में लुप्त होती
लोक विधा-बेकड़ली’ लेख
में डा. धर्मेन्द्र वर्मा ने बेकड़ली की चर्चा की है, जिसे
बेजड़ली (घालमेल) भी कहा जाता है। इसमें छल्ले गाते हैं मांगते हुए। यह एक प्रकार
से लांगूरिया की निकट भी है। कान गुवालिया, डेंडक
माता के सन्निकट भी।
‘मालवी हीड़ लोक काव्य’
लेख को रमाकांत चौरडि़या ने सिद्धेश्वर सेन की पंक्तियों के साथ प्रारंभ किया है-मोती की मनवार
मालवो, ममता भरयो टिपारो, धन
धन या मालव की धरती, धन है मनक जमारो। हीड़ बगड़ावत वीर गाथा है। इसे
मालवी-गुर्जर महाभारत भी कहते हैं। विभिन्न हीड़ें हैं- देवनारायण, चालर-गाय, साढू माता, धौला-बैल आदि की
हीड़। पशुचारण काल में जन्मी हीड़ में ‘हे ऽ ऽ’ की टेर और लोकदेवताओं की स्तुति समाहित है।
पुस्तक में ‘मालवा की चित्रकला-शैलचित्रों से चित्रावण तक (डा. भगवतीलाल राजपुरोहित),
मालवा-निमाड़ एवं अन्य अंचल के पारम्परिक लोकचित्र (बसंत
निरगुणे), मालवा की चित्रावण विधा (डा. लक्ष्मीनारायण भावसार),
मालवा की लोककलाः मांडना और संजा (कृष्णा वर्मा) आदि जैसे
महत्त्वपूर्ण और सारगर्भित लेख भी हैं। अस्सी का माच मेला-प्रयोजन एवं अनुभव,
मालवा माच महोत्सव: खुली आँखों का सपना (हफीज खान), मालवा माच महोत्सवः विविध रंगी माच प्रस्तुतियाँ (डा. शैलेन्द्रकुमार शर्मा),
मालवा माच महोत्सवः अपनी पहचान को बचाए रखने का सार्थक
उपक्रम (राजेन्द्र चावड़ा) एक तरह से उपसंहारवत
लगते हैं। बाल माच प्रदर्शन और लोक संस्कृति संरक्षण की
कोशिशों में पंकज आचार्य उम्मीद जगाते हैं। अंत में लोकरंग श्री सम्मान से विभूषित
विभूतियों का विवरण है। यह ग्रंथ मालवी संस्कृति और माच के संरक्षण का सुदृढ़ चरण
है।
-गफूर
‘स्नेही’
सी-79,
अर्पिता एंक्लेव
नानाखेड़ा,
उज्जैन (म.प्र.)
पुस्तक: मालवा का लोकनाट्य माच और अन्य विधाएँ
सम्पादक: डा. शैलेन्द्रकुमार शर्मा
मूल्य: 100/-रु. पृ. 200, प्रथम संस्करण 2008
प्रकाशक: अंकुर मंच, फव्वारा चौक, उज्जैन

शनिवार, 25 मई 2013
अब विद्यार्थी पढ़ेंगे 'यो है म्हारो देश मालवो'
अब विद्यार्थी पढ़ेंगे 'यो है म्हारो देश मालवो'
मालवी और लोकनाट्य माच को वैश्विक शिक्षा पटल पर मिला मान, यूजीसी ने ई-पीजी पाठशाला के सिलेबस में किया शामिल
आशीष दुबे , उज्जैन
यो है म्हारो देश मालवो मईमां यां की मोटी, जंगल-जंगल में मंगल पग-पग में पाणी-रोटी। अब तक मेला मंचों और मालवी क्षेत्रों में गूंजने वाले इस गीत को अब स्नातकोत्तर (पीजी) के विद्यार्थी पढऩे, लिखने और याद करने के साथ परीक्षा में भी लिखेंगे। तीन राज्यों के 22 जिलों में दो करोड़ से अधिक लोगों द्वारा बोली जाने वाली मालवी बोली और 220 साल पुराने मालवांचल के प्रसिद्ध लोकनाट्य माच को वैश्विक शिक्षा पटल पर मान मिला है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने मालवा और माच को सम्मान देते हुए इसे ई-पीजी पाठशाला के सिलेबस का हिस्सा बनाया है।मानव संसाधन विकास मंत्रालय के राष्ट्रीय शिक्षा मिशन के अंतर्गत ई-पीजी पाठशाला के लिए दो माह पहले ही निर्णय हुआ है, जिसमें यूजीसी इंटरनेट के माध्यम से घर बैठे विद्यार्थियों को विषय के आधार पर पढऩे योग्य सामग्री मुहैया कराएगा।
हिंदी साहित्य के अंतर्गत भारत के लोक साहित्य की परंपरा विषय में मालवी, मालवी भाषा, लोकनाट्य माच को भी शामिल किया है।
विक्रम विवि उज्जैन के कुलानुशासक डॉ. शैलेंद्र शर्मा को ई-कंटेंट तैयार करने का जिम्मा यूजीसी की ओर से मिला है। यूजीसी की ई-पीजी पाठशाला के लिए हिंदी कोर्स के को-ऑर्डिनेटर एवं जवाहरलाल नेहरू विवि नईदिल्ली के प्रो. राम बक्ष ने बताया केंद्र की विशेष योजना के अंतर्गत विषय सामग्री तैयार करने का काम किया जा रहा है। आगामी सत्र (2013-14) से इसे शुरू करने का प्रयास है। इससे दुनियाभर के विद्यार्थी, शिक्षक और शोधार्थी घर बैठे पढ़ाई का लाभ ले सकेंगे।
मालवा और माच पर केंद्रित रहेंगे तीन पाठ
लोकनाट्य माच एवं मालवी के लिए ई-कंटेंट तैयार कर रहे विक्रम विवि के डॉ. शैलेंद्र शर्मा ने बताया सिलेबस में इन विषयों के करीब तीन पाठ शामिल होंगे। इसमें मालवा, मालवी बोली, लोकनाट्य माच की पृष्ठभूमि, विकास यात्रा, प्रमुख विशेषताएं, शिल्प विधान, वर्ण के रूप में माच गुरु सिद्धेश्वर सेन का माच राजयोगी भर्तृहरि और मार्मिक प्रसंगों को शामिल किया जाएगा। माच पर आधारित वीडियो भी इंटरनेट पर डाले जाएंगे। डॉ. शर्मा के अनुसार विषय सामग्री तैयार कर जल्द ही इसे अंतिम रूप देकर यूजीसी को भेजा जाएगा। मालवी और माच के अलावा बृज, अवधी, मैथिली, भोजपुरी, छत्तीसगढ़ी, राजस्थानी, बुंदेली, हरियाणवी, पहाड़ी और खड़ी बोली को भी विषय सामग्री में शामिल किया जाएगा।
शहर से ही हुई थी माच की शुरुआत
इतिहासकार डॉ. भगवतीलाल राजपुरोहित के अनुसार लोकनाट्य माच करीब 220 साल पुराना है। उज्जैन के भागसीपुरा के गुरु गोपालजी ने 1793 में माच लेखन के साथ इसकी शुरुआत की थी। उनके बाद गुरु बालमुकुंदजी, गुरु फकीरचंदजी, गुरु भेरूलालजी और नए दौर में सिद्धेश्वर सेन व ओमप्रकाश शर्मा ने इसे आगे बढ़ाया। माच में संवाद, गीत, नृत्य, संगीत और विशिष्ट रंगतों का प्रयोग कर संपूर्ण नाट्य के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। इसमें पुरुष ही महिलाओं की भूमिका निभाते हैं। माच मालवी की विभिन्न लोकपरंपराओं का समावेश करता है। उज्जैन के अलावा इंदौर भी माच का बड़ा केंद्र है।
Published on 24 May-2013 DAINIK BHASKAR
रविवार, 22 जनवरी 2012
आधुनिक मालवी कविता के उन्मेषक नरहरि पटेल - प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा
| नरहरि पटेल उज्जैन में रचना पाठ करते हुए।साथ में डॉ. शैलेंद्रकुमार शर्मा, डॉ. टी. जी.प्रभाशंकर प्रेमी व डॉ. भगवतीलाल राजपुरोहित। |
मालवी
कविता में नया उन्मेष लाने वाले रचनाकार नरहरि पटेल
प्रो. डॉ. शैलेन्द्रकुमार शर्मा
भारत के हृदय अंचल की मीठी जुबान मालवी का चाहे लोक
साहित्य हो या अभिजात साहित्य – उनमें मालवा की सहज और निश्छल अभिव्यक्ति के दर्शन
होते हैं। यह साहित्य सदियों से मालवा के लोक-मानस को प्रतिबिम्बित करता आ रहा है।
अन्य भाषाओं के समान मालवी में भी पद्य की शुरूआत पहले हुई। मालवी कविता का
शुरूआती रूप कालिदास-शूद्रक आदि की प्राकृत-अपभ्रंश से लेकर राजा भोज के
ग्रन्थों और रोड़कवि के राउलवेल काव्य में देखा जा
सकता है। फिर इस काव्यधारा को गुरु गोरखनाथ, संत पीपाजी, सिंगाजी, रानी रूपमती, चंद्रसखी, सुन्दर कवयित्री, अफजल सहित कई कवियों ने आगे बढ़ाया। आधुनिक काल में
पन्नालाल नायाब, नवनिधि कुँवर
खांगारोत, युगलकिशोर
द्विवेदी,
आनन्दराव
दुबे,
हरीश
निगम,
सुल्तान
मामा,
भावसार
बा,
गिरवरसिंह
भँवर,
नरेन्द्रसिंह
तोमर,
पूनमचंद
सोनी,
मदनमोहन
व्यास, बालकवि बैरागी, नरहरि पटेल, पुखराज पांडे, मोहन सोनी, शिव चौरसिया, झलक निगम,नरेन्द्र श्रीवास्तव नवनीत, ललिता रावल, बंसीधर बंधु, राजेश रावल सुशील आदि जैसे अनेक कवियों ने इसे समृद्ध किया। गद्यकार के रूप
में पं. सूर्यनारायण व्यास, श्रीनिवास जोशी, चन्द्रशेखर दुबे, डॉ. प्रहलादचन्द्र
जोशी, डॉ. पूरन सहगल, ललिता रावल, डॉ. श्यामसुंदर निगम, सिद्धेश्वर सेन, डॉ. भगवतीलाल
राजपुरोहित,
डॉ.
शैलेन्द्रकुमार शर्मा, संजय पटेल, डॉ. तेजसिंह गौड़, विश्वनाथ पोल, राधेश्याम पाठक ‘उत्तम’, सतीश श्रोत्रिय, राधेश्याम परमार ‘बंधु’ आदि ने मालवी साहित्य को आगे बढ़ाया। मालवी में गद्य
और पद्य की अनेक पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। मालवी में पत्रिका प्रकाशन को भी गति
मिली है। इसके साथ ही मालवी भाषा और साहित्य के विविध पक्षों पर शोध कार्य में भी
तेजी आई है। कथित आधुनिकता के दौर में भी मालवी भाषा और उसके
साहित्य का यहाँ लोक-जीवन,
लोकमन
और पर्यावरण के साथ गहरा रिश्ता बना हुआ है। मालवमना
साहित्यकारों और संस्कृतिकर्मियों के सद्संकल्पों से उसे और फलने-फूलने
का अवसर आज मिल रहा है। मालवी में संस्कृत, हिन्दी सहित कई भारतीय भाषाओं के साहित्य
के अनुवाद में भी तेजी आई है। कालिदास की कृतियों और श्रीमद्भगवद्गीता से लेकर
रामचरितमानस और आधुनिक हिन्दी काव्य तक अनेक रचनाओं के मालवी में अनुवाद हुए हैं।
आधुनिक मालवी कविता में एक
साथ कई दृष्टियों से नवोन्मेष लाने वाले रचनाकारों में नरहरि पटेल का
स्थान अप्रतिम है। 2 जनवरी 1934 को सैलाना, जिला रतलाम के एक
प्रतिष्ठित परिवार में जन्मे श्री पटेल की आरंभिक शिक्षा वहीं हुई। 16 वर्ष
की आयु में वे इंदौर आ गये। एम.ए. , एल.एल.बी. तक की
शिक्षा इंदौर में हुई और वे अभिभाषक और बाद में कर-सलाहकार बन गये। बचपन से उनके
मन में लोक-कला,
लोक-गायन
और लोक-संस्कृति के प्रति लगाव रहा है। विविधायामी प्रतिभा से सम्पन्न व्यक्तित्व
श्री पटेल कवि,
रंगकर्मी, लेखक, समीक्षक, संस्कृतिमनीषी और गायक हैं। नाट्य क्षेत्र
में उनकी गहरी रुचि रही है। इंदौर नगर की रंग-गतिविधियों में वे
सदैव सक्रिय रहे हैं। इंदौर में वे नाट्य संस्था इप्टा की स्थापना से जुड़े
रहे, जो बाद में यवनिका बन गई। बाबा डिके के नाटकों
से भी वे सम्बद्ध रहे। कलागुरु विष्णु
चिंचालकर से भी उनका गहरा संपर्क बना रहा। अनेक नाटकों में अभिनय करने के साथ ही
रंगमंच के कार्यों में वे निरंतर सक्रिय रहे हैं। आकाशवाणी
के नाट्य- रूपकों में उन्होंने महती भूमिका का निर्वहन किया। विगत छह दशकों से उनकी
काव्य-साधना निरंतर गतिमान है।
नरहरि पटेल (1934) मालवी कविता के क्षेत्र में ध्वनि
गीतकार एवं गजलकार के रूप में समादृत हैं।‘मत रो माता और मालव की रात उनके मालवी गीत
संग्रह हैं। थोड़ी-घणी, सिपरा के किनारे एवं गुलमोरी धरती पटेलजी के मालवी गजल-संग्रह
प्रकाशित हुए हैं। झुमको उनके मालवी गीत, कविता और गजलों का
नायाब गुलदस्ता है। उन्होंने हिन्दी में भी सृजन किया है। उजाला दो, गीत गंगा और
मन-मुरली उनके प्रमुख हिन्दी कविता संकलन हैं। पटेलजी ने आनंदराव
दुबे के काव्य संकलन रामाजी रइग्या ने रेल जाती री, श्रीनिवास जोशी के
गद्य संग्रह-वारे पट्ठा भारी करी तथा नरेन्द्रसिंह तोमर के तीन संकलनों का
सम्पादन भी किया है।
श्री पटेल ने
स्वातंत्र्योत्तर भारत में नवनिर्माण, श्रम और वीरोचित
उत्साह के जागरण के लिए मालवी एवं हिन्दी में काव्य-सृजन की शुरूआत की। प्रथम चरण
की उनकी मालवी कविताओं में राष्ट्रीय भावना के साथ-साथ मालवा के लोक-जीवन से जुड़े कई आयाम उभरते
दिखाई दिए। इसी कड़ी में उन्होंने मालवी लोकधुनों पर आधारित
अनेक मर्ममधुर गीत भी रचे। प्रणय और प्रकृति-सौंदर्य के अनेकानेक संदर्भों को
उन्होंने बड़ी कुशलता से अपने काव्य में पिरोया है।
बोल्यो कागो कजरारो जी, बिरहण को बारहमासा, आयो फागणियो, जुगल गीत, गोरी तीर नैण का, झुमको जैसे गीतों को
इसी श्रेणी में रखा जा सकता है। उनके श्रम एवं प्रयाण गीतों ने भी मालवजन को
पर्याप्त उत्प्रेरित किया। इस श्रेणी के गीतों में जारे रण में, म्हारो फूलाँ वारो
देस, करज को चुकावणो करो, अब काम करो रे भैया, सीमा पे तू वेगो
वेगो चाल,
कैसी
खेती उगई हो राम,
अड़ कल-दड़ कल, आई उजाली पूरब वाली
आदि उल्लेखनीय हैं। उनकी अधिकांश रचनाएँ वाचिक परंपरा के वैशिष्ट्य का संवहन
करती हैं । इसीलिए उन्हें रूबरू सुनना एक अद्वितीय दृश्य- श्रव्य अनुभव होता है।
अपनी ग़ज़लों में उन्होंने
लोक मन और लोक-जीवन में आ रहे परिवर्तनों के साथ-साथ समसामयिक राजनीतिक-सामाजिक
विसंगतियों पर सार्थक टिप्पणी की है। ध्वनिगीत और हाइकू जैसे माध्यमों को भी
उन्होंने बखूबी साधा है। उनकी काव्य-यात्रा के पूर्वार्द्ध के मर्मस्पर्शी मालवी गीत
और कविताएँ ‘मत रो माता’ और ‘मालव की रात’ में संकलित हैं। उत्तरार्द्ध के गीत, गजल, हाइकू ,ध्वनिगीत जैसी विविध
विधाओं की रचनाएँ थोड़ी घणी ,गुलमोरी धरती, सिपरा के किनारे और
झुमको में संकलित हैं। उनका मन मालवी लोक-संस्कृति के रस-रंगों से सराबोर है। वे
मालव की रात का आनंद सबको बाँटना चाहते हैं।
चंग झाझर धक ढोल
मंजीरा
चंचल चित मत वे
मतिधीर/ होरी में हुड दंग रंगीला
नत नत का तेवार/
मालव की राताँ में....
पंथीड़ा परभाते जाजो/ मालव
की मत रात भुलाजो
जाजो पर या बात
निभाजो/ आजो जी बारम्बार
मालव की राता में/
हे चाँद कुमुदणी को प्यार/ मालव की राताँ में
भावुकमना श्री पटेल ने पारिवारिक रिश्तों
को लेकर कई हृदयग्राही कविताओं की रचना की हैं। माँ, ममता, बापू, दादी, हीरा-मोती, बेटो, बेटा को जनम, बेटी, पीहर-वाट, भुवा आदि इसी प्रकार की रचनाएँ हैं। दादी का मर्मस्पर्शी
चित्र देखिए-
सुमरणी हाथ में, आँखयाँ में भर्या
सोरमघट
चुगाती चरकला दादी
दया की भण्डारण
अबोली बावड़ी उँडी, वरद की पोटली जूनी
खुणा में सादड़ी सुखी पड़ी हे आपणी दादी।
यद्यपि नरहरि पटेल ने मालवी में कविता,गीत, गजल, हाइकू आदि सभी कुछ
लिखा है,
पर
उनकी खयाति एक गीतकार और गजलकार के रूप में अधिक है। मालवी में चली आती हुई गजलों
की परंपरा और उर्दू गजल के सामंजस्य से पटेलजी ने मालवी में गजल रचना को आगे बढ़ाया। उन्होंने प्रचुर
परिमाण में गजलें लिखी हैं। उनके गीतों और गजलों में ताजातरीन सौन्दर्यबोध है।
उनमें मालवा की काली मिट्टी की गंध स्पष्ट रूप से अनुभव की जा सकती है। यहाँ के
लोक-जीवन में जैसी फसलें पकती हैं, उसका वैसा ही रूप इनकी रचनाओं में उतरा है। गेहूं, चना, अलसी और मक्का के खेतों की सहज सुंदरता कवि मन को बाँधती
है। खिलते पलाश उन्हें मुग्ध करते हैं। गन्ने की चरखी से उठती मीठी-मीठी गंध
उन्हें आकर्षित करती है और वे उन्हें अपनी रचनाओं से चित्रित करते हैं। बच्चों के
खेल-गीतों की तर्ज को आधार बनाकर वे जीवन-मर्म को साकार करने का माद्दा भी रखते
है। चर्चित गीत ‘छोटी – छोटी मच्छी
कितरो पाणी’ में वे जल की गहराई बढ़ने के साथ कालचक्र में बंधे
बचपन, जवानी और बुढ़ापे को जीवंत कर जाते हैं-
छोटी – छोटी मच्छी कितरो पाणी/ कितरो पाणी ?
म्हे नी बतावां
लावों गुड-धानी/ लो गुड-धानी
यो सरवर तीर
किनारो हे । बस घुटना-घुटना गारो हे
भई पाणी की
बलिहारी जी। झलमल हे प्यारो प्यारो हे
लो आओ बतावां इतरो पाणी। ब ब ब ब हप्प, घूघर मार धमीर को ...
श्री पटेल की काव्य-भाषा
में मुहावरों-कहावतों का प्रयोग प्रचुर मात्रा में हुआ है। सादगी और सहजता से भरी
भाषा में प्रयोगधर्मिता भी दृष्टिगोचर होती है। उनकी रचनाओं में मालवा के गाँवों का समस्त
परिवेश - घर- आँगन, खेत-खलिहान, ग्रामीणों के दैनिक
कार्य-कलाप की मर्मस्पर्शी बुनावट है। पारिवारिक रिश्तों
की गरमाहट के बीच जब वे अपने बालपन के चित्र सघन ध्वन्यात्मकता के साथ बुनते हैं, तब लगता है पूरा
मालवा उनके साथ झूम रहा हो-
चरर मरर, चरर मरर, चरखो चाले
दादी थारो चरखो चाले
कारी कारी गाय को धोरो धोरो दूध रे भई
भर्या भर्या माटला तायो तायो दूध रे भई
मचमचाती माटली छपछपाती छाछ रे भई
कसमसाती कांचली चमचमाती खांच रे भई
घमड़-घमड़ घमड़-घमड़ जावण वाजे
भाभी थारो बेरको हाले ....
नरहरि पटेल मालवी लोक जीवन के विविध रंगों-रूपों को उकेरने
वाले सहज कवि हैं। उनकी रचनाओं में लोक गंध, राष्ट्रीय भावना और
सांस्कृतिक चेतना के साथ मानवतावादी विचारधारा के दर्शन होते हैं। रजवाड़ी की झलक लिए उनकी
मालवी मीठा प्रभाव छोड़ती है। आधुनिक मालवी कविता-धारा में उनका विशिष्ट स्थान है।
लोकमनीषी रामनारायण उपाध्याय ने ठीक ही लिखा है-‘‘नरहरि पटेल के गीत, गजल और उनमें निहित
मालव माटी की महक मंत्रमुग्ध कर देती है, जैसे रेगिस्तान में
पानी बरस जाय, भरी दुपहरिया में नंगे पाँव ऊबड़ –खाबड़ पगडंडी पर चलते कोई बदली आशीर्वाद बनकर सिर पर
अपना वरदहस्त रख दे।’
‘माँ की वंदना’ गीत के जरिये नरहरि पटेल ने जननी जन्मभूमि की
अपार महिमा को उकेरा है। इस गीत में उन्होंने प्रकृति के उदात्त और
महिमाशाली रूप की झांकी प्रस्तुत कराते हुए चराचर जगत को एकरस कर दिया है, वहीं धरती माँ के दाय को याद कराते हुए
उसे परिश्रम के पाट पर विराजने की मनुहार करते हैं ।
| नरहरि पटेल उज्जैन में रचना पाठ करते हुए |
म्हें
तो वारी वारी जाऊँ मात ये
थारी मेहमा अपरम्पार ये
म्हें तो वारी वारी
जाऊँ
धरऊ दिसा में परबत
राजा
चँवर ढुलावे माई
थारे जी ओ
चाँद-सुरज थारी करे
हे आरती
सागर चरण पखारे जीओ
म्हें तो वारी वारी
जाऊँ मात ये
थारी महिमा अपरम्पार
ये।
लाऊ झाऊ लाऊ झाऊ
फसलाँ आवे
खेताँ में नी मावे
जीओ
मेनत को जद फल
पावेतो
मनवो कईं कईं गावे
जीओ
म्हें तो वारी वारी
जाऊ मात ये
तू सब की हे भरतार
ये।
मन
में संकलप सम्प का धारूँ
अखत बीज का बावूँ जी
ओ
धूप दीप तो साँच
प्रेम का
सुख का फल जद पाऊँ
जीओ
म्हें तो वारी वारी
जाऊँ मात ये
तू श्रम के पाट पधार
ये। (मत रो माता
संग्रह
से)
आई उजाली पूरब वाली रचना में वे मेहनत को
पूजने का संदेश देते हैं, क्योंकि वही मनुष्य का भाग्य बनाता- संवारता है।
| नरहरि पटेल रचना पाठ करते हुए |
आई उजाली, पूरब वाली
आओ रे गावो रे
धन धन हे गऊ का जाया
खेत हँकावो रे
इन्दर राजा बाजा
बजावे
बीज वोवावो रे
उठो रे प्यारी सोना की क्यारी
गाड़ी भरावो रे।
घर घर का सब हाँ
भैया
कोई नी दूजो रे
आओ रे आओ रे ढोल
बजाओ रे
मेनत पूजो रे
भूमि हे वाली, या रखवाली
देव बधाओ रे।
भूमि
को आसीस बड़ो सब
सीस चढावो रे
छत्तर माँ को ऊँची
करो ने
हाथ बढाओ रे
नवी नवेली लावो
हथेली
भाग लिखावो रे। (मालव
की रात
संग्रह
से)
गुलमोरी धरती तो उनके लिए अपने
प्राण जैसी है, जिस पर सभी को गर्व
होना चाहिए। इस गीत में श्री पटेल भारत माता का शृंगार करते किसान , भोले- भाले भारतवासी, सुख- संतोष का पाठ पढ़ाते संत- फकीर और तृप्ति का अनुभव करते अतिथि- सब को एक लय में बांधते हैं।
म्हारी गुलमोरी धरती, गुल क्यारी धरती-प्यारी हे म्हारी जान
म्हारी चाँदी री
धरती, सोना री धरती-वाली हे म्हारी जान।
अन धन दाता भारत
माता बेटा थारा करसाण
मन का राजा मस्त
फकीरा नेक कसा इन्सान
म्हारी दूधाँरी धरती, पूताँरी धरती-प्यारी
हे म्हारी जान
म्हारी चाँदी री
धरती सोना री धरती-वाली
हे म्हारी जान।
मीरा रा मंदर मस्त
कलंदर चौपाला में तान
घट-घट में संतोस
समायो धापीग्या मेहमान
म्हारी संता री धरती, वजंता री धरती-प्यारी हे म्हारी जान
म्हारी चाँदी री
धरती, सोना री धरती-वाली
हे म्हारी जान।
कस्ती डुबी नी हस्ती मिटी नी ऊँची थारी शान
परमाणु री हाँक लगी
तो थर्रइग्यो यो जहान।
म्हारी वीराँ री
धरती,धीराँ री
धरती-प्यारी हे म्हारी जान
म्हारी चाँदी री
धरती, सोना री धरती-वाली हे म्हारी जान। (गुलमोरी
धरती संग्रह से)
फूल
बनड़ो में उन्होंने लोक
में प्रचलित पारंपरिक बन्ना गीत को नया अंदाज दिया है। बन्ने के
रूप-सौंदर्य को उन्होने जहां चंद-सूरज से आँका है , वहीं उसकी मनभावनी बातों को भी बड़ी शालीनता से मूर्तिमन्त किया है।
म्हारो फूल बनड़ो /
फूल बनड़ो-दिलजानी बनड़ो
म्हारो गेंद बनड़ो /
गेंद बनड़ो-दिलदानी बनड़ो।
ईंकी वास हे घणी सुवाणी, ईकी वात हे घणी
लुभाणी
ईंका रूप को तोल नी
ताणी-यो सोमाणी बनड़ो।
यो तो सूरज जाणे चमके, यो तो चंदो जाणे
चमके
यो तो ध्यानी जेसो
दमके-यो गुणज्ञानी बनड़ो।
आधी राते चंदो आवे, आखी आखी रात सतावे
म्हारे सिरहाणे लंग
जावे-यो रूमानी बनड़ो।
जाणो हो पटेल यो छोरो, प्यारो प्यारो गोरो
गोरो
छोरो लागे भोरो भोरो
- यो नादानी बनड़ो। (झुमको संग्रह से)
उनकी ग़ज़ल के
शेर थोड़े में बहुत कुछ कहने-समझाने की ताकत रखते हैं। उन्होंने अपनी
गज़लों को मानवीय विकलता की अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया है। छोटी-बड़ी सभी बहरों की ग़ज़लें उन्होंने की हैं, जहां रदीफ़ –काफ़िये के निर्वाह के साथ सांकेतिकता और संक्षिप्तता विशेष प्रभाव जमाती है। उर्दू गज़ल के व्याकरण से
अनुशासित होने के बावजूद वातावरण और मानसिकता की
दृष्टि से उनकी गज़लों को खालिस मालवी ग़ज़ल कहा जा सकता है। अपनी गज़लों में कहीं उनका मन इंसान के निजी और अंतरंग क्षणों को उकेरने में रमा है, तो कहीं वे व्यापक
सामाजिक सरोकारों को बड़ी शिद्दत से उभारते हैं। खासतौर पर वे दिनों-दिन छीजते सहज प्रेम, पारस्परिक
सद्भाव और सहज उल्लास को फिर से नया उन्मेष देना चाहते हैं। मालवा के देशज
मुहावरे और बिंबों ने उनकी गज़लों को जमीनी सचाई से सराबोर किया है, वहीं उन शेरों की सांकेतिकता को और गहराया है। उनकी एक मालवी ग़ज़ल के चंद शेर
देखिए-
लगई लो जोर को हाको लगई ने देखो तो,
जगेगा
कोई तो देखो जगई ने देखो तो।
अँधारी
रात हे चमकादडाँ हे बंद कपाट,
नकूचा
भेद का तोडो तुड़ई ने देखो तो।
चरकली
एक पडीगी तड़पती जंगल में,
दया से
हाथ में राखो उड़ई देख तो लो।
जरा सी
प्रेम की पुड़िया हे देवता को प्रसाद,
सबा ने
प्रेम से वाँटो वँटई ने देख तो लो।
जुदा
जुदा जो उड्या आपणा कबूतर हे,
बुलई
ने खाँख में राखो बुलई ने देख तो लो।
कदी
पटेल चुभीगी वे वात, माफ करो,
कदी जो
वाँक वे म्हाको भुलई ने देख तो लो। ('थोडी
घणी' संग्रह से)
जाहिर है नरहरि पटेल मालवी कविता धारा में एक विलक्षण
उपस्थिति बन गए हैं। मालवी कविता का पाट चौड़ा करने में उनकी भूमिका अद्वितीय रही है। उन्होंने बंधी-बंधाई लीक से हटकर चलते हुए अपनी राह खुद बनाई है । ऐसा करते हुए वे लोकधारा को न सिर्फ आयत्त करते हैं, उसे पुनराविष्कृत भी करते चलते हैं। वे मालव माटी की सौरम को अपनी रचनाओं से गमकाते हैं, जीवन के उन क्षणों की याद दिलाते हैं, जिन्हें छोड़ मनुष्य जाने- अनजाने एक अंधी दौड़ में शामिल हो गया है।
कसा चहकता था
चरकला, कई याद हे के नी
याद हे
मस्ती में गम्मत रतजगा, कई याद हे के नी
याद हे।
चमचम चमकता था आँगन, चोखूंट मंडता था मांडणा
बचपन का घुघरा चुरवणियाँ, कई याद हे के नी याद हे।
प्रो. डॉ.
शैलेन्द्रकुमार शर्मा
| डॉ. शैलेन्द्रकुमार शर्मा , श्री पटेल, डॉ. देवेंद्र जोशी और डॉ. राजपुरोहित के साथ |
प्रोफेसर
एवं कुलानुशासक
विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन
एफ -2/27 ,विक्रम विश्वविद्यालय परिसर, उज्जैन
[म.प्र.]
email:shailendrasharma1966@gmail.com
सदस्यता लें
संदेश (Atom)
विशिष्ट पोस्ट
हिंदी-भीली अध्येता कोश : निर्माण प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा एवं समूह
Hindi - Bhili Learner's Dictionary by Prof Shailendrakumar Sharma & Group हिंदी-भीली अध्येता कोश : कोश निर्माण प्रो शैलेंद्रकुमा...
Folklore of India मालवी लोक संस्कृति की लोकप्रिय पोस्ट
-
आज से २०६८ वर्षों पूर्व चैत्र शुक्ल प्रतिपदा[गुडी पडवा] को मालव संवत का प्रवर्तन हुआ था. मालवा क्षेत्र से प्राप्त प्राचीन ताम्र मुद्रा [ प...
-
सन् 1857 के महासमर में सोंधवा ड़ - मालवा की भूमिका The Role of Sondhwad - Malva in Great Rebellion of 1857 1857 ...
-
मालवा का लोकनाट्य माच और अन्य विधाएँ : पुस्तक समीक्षा लोक - नाट्य की परम्परा की दृष्टि से भारत सहित सम्पूर्ण एशिया अत्यंत समृद्ध है। ल...
-
नरहरि पटेल उज्जैन में रचना पाठ करते हुए।साथ में डॉ. शैलेंद्रकुमार शर्मा, डॉ. टी. जी.प्रभाशंकर प्रेमी व डॉ. भगवतीलाल राजपुरोहित। ...
-
धर्मराजेश्वर मन्दिर और बौद्ध गुफा शृंखला : प्रकृति के सुरम्य अंचल में आस्था और सभ्यता का दृष्टान्त | Dharmarajeshwar Temple and Buddhist...
-
सु मालव देस भलो सबहीं तैं प्रो. शैलेन्द्रकुमार शर्मा भारत का अलग -अलग अंचल में ब...
-
मध्य प्रदेश के पश्चिमी भूभाग और राजस्थान के पूर्वी क्षेत्र को मालवा के नाम से जाना जाता है. इसी मालव प्रदेश की मर्म मधुर बोली...
-
मालवी के मर्ममधुर गीतकार मोहन सोनी : रई रई के म्हारे हिचक्याँ अइ री हे - प्रो शैकेन्द्रकुमार शर्मा Mohan Soni : The Melodious Lyricist of ...
-
मालव भूमि की विराट शब्द-यात्रा: अक्षर पगडंडी डा. शैलेन्द्रकुमार शर्मा मालवी साहित्य और संस्कृति के अन्यतम हस्ताक्षर श्री झलक निगम ...
-
मालवी के मली री हे दुनिया माय पेचान प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा ग्रीक ने मालवी सभ्यता को घणो पुरानो रिश्तो रियो हे। मालवा का केई पुरातात्...









.jpg)
.jpg)




