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मंगलवार, 13 अप्रैल 2021

लोक पर्व गणगौर : जब लोक में उतरते हैं विश्वाधार : प्रो. शैलेंद्रकुमार शर्मा | Gangaur : The Folk Festival of India : Prof. Shailendra Kumar Sharma

लोक पर्व गणगौर : जब लोक में उतरते हैं विश्वाधार

प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा 


हर बरस मालवा-निमाड़ से लेकर गुजरात, राजस्थान और हरियाणा के विभिन्न अंचलों तक लोक पर्व गणगौर की धूम मचती है। यह विश्वाधार के लोक से संवाद का पर्व है। लोकमन इस मौके पर उमंग और उल्लास में डूब जाता है। आखिर क्यों न हो मालवा की रनुबाई-पार्वती से मिलने घणिया राजा - भोला भण्डारी अपने ससुराल जो आते हैं। फिर दामाद की आवभगत में कमी कैसे रहे।

कुछ तस्वीरें निज संग्रह के काष्ठ शिल्पों की। 

चैत्र महीने की शुक्ल पक्ष की तीज को आता है यह लोक पर्व। इस दिन कुंवारी लड़कियां एवं विवाहित स्त्रियाँ शिवजी (इसर जी) और पार्वती जी (गौरी) की पूजा करती हैं। पूजा करते हुए दूब से पानी के छींटे देते हुए गोर गोर गोमती गीत गाती हैं।


गणगौर गीत 1

गोर गोर गोमती, इसर पूजे पार्वती

म्हे पूजा आला गिला, गोर का सोना का टीका

म्हारे है कंकू का टीका

टीका दे टमका दे ,राजा रानी बरत करे

करता करता आस आयो, मास आयो 

छटो छह मास आयो, खेरो खंडो लाडू लायो

लाडू ले बीरा ने दियो, बीरा ले भावज ने दियो 

भावज ले गटकायगी, चुन्दडी ओढायगी

चुन्दडी म्हारी हरी भरी, शेर सोन्या जड़ी 

शेर मोतिया जड़ी, ओल झोल गेहूं सात

गोर बसे फुला के पास, म्हे बसा बाणया क पास 

कीड़ी कीड़ी लो, कीड़ी थारी जात है 

जात है गुजरात है, गुजरात का बाणया खाटा खूटी ताणया

गिण मिण सोला, सात कचोला इसर गोरा 

गेहूं ग्यारा, म्हारो भाई ऐमल्यो खेमल्यो, लाडू ल्यो , पेडा ल्यो 

जोड़ जवार ल्यो, हरी हरी दुब ल्यो, गोर माता पूज ल्यो।


गणगौर पर्व का सम्बंध है सुखमय जीवन से : 

नवरात्र के तीसरे दिन यानि कि चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया - तीज को गणगौर माता (माँ पार्वती) की पूजा की जाती है। पार्वती के अवतार के रूप में गणगौर माता और भगवान शंकर के अवतार के रूप में ईशर जी की पूजा की जाती है। प्राचीन समय में पार्वती ने शंकर भगवान को पति रूप में पाने के लिए व्रत और तपस्या की। शंकर जी तपस्या से प्रसन्न हो गए और वरदान माँगने के लिए कहा। पार्वती ने उन्हें ही वर के रूप में पाने की अभिलाषा की। पार्वती की मनोकामना पूरी हुई और पार्वती जी का शिव जी से विवाह हो गया। 

तभी से कुंवारी लड़कियां इच्छित वर पाने के लिए ईशर और गणगौर की पूजा करती है। सुहागिन स्त्री पति की लम्बी आयु के लिए यह पूजा करती हैं। गणगौर पूजा चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि से आरम्भ होती है। सोलह दिन तक सुबह जल्दी उठ कर बगीचे में जाती हैं, दूब और फूल चुन कर लाती हैं। उस दूब से दूध के छींटे मिट्टी की बनी हुई गणगौर माता को देती है। थाली में दही, पानी, सुपारी और चांदी के छल्ले आदि पूजन सामग्री से गणगौर माता की पूजा की जाती है।

आठवें दिन ईशर जी पत्नी (गणगौर) के यहां अपनी ससुराल आते हैं। उस दिन सभी लड़कियां कुम्हार के यहाँ जाती हैं और वहाँ से मिट्टी के बर्तन और गणगौर की मूर्ति बनाने के लिए मिट्टी लेकर आती है। उस मिट्टी से ईशर जी, गणगौर माता, मालिन आदि की छोटी छोटी मूर्तियाँ बनाती हैं। जहाँ पूजा की जाती है उस स्थान को गणगौर का पीहर और जहाँ विसर्जन किया जाता है, वह स्थान ससुराल माना जाता है।




यह तस्वीर हमारे निजी संग्रह के काष्ठ शिल्प की।





गणगौर गीत: शुक्र को तारो रे ईश्वर ऊगी रयो। प्रसिद्ध लोक गायिका श्रीमती हेमलता उपाध्याय के स्वरों में। धन्यवाद Shishir Upadhyay - Jaishree Upadhyay

लिंक पर जाएँ :- 

 

https://youtu.be/oFKuw1q8qek










गणगौर गीत 2

पीयर को पेलो जड़ाव की टीकी,

मेण की पाटी पड़ाड़ वो चंदा...

कसी भरी लाऊं यमुना को पाणी...

हारी रणुबाई का अंगणा म ताड़ को झाड़।

ताड़ को झाड़ ओम म्हारी

देवि को र्यवास।

रनूबाई रनू बाई, खोलो किवाड़ी...।

पूजन थाल लई उभी दरवाजा

पूजण वाली काई काई मांग...



गणगौर नृत्य: श्रीमती साधना उपाध्याय के निर्देशन में निमाड़ गणगौर एवं लोक कला मण्डल, खण्डवा के कलाकारों की सम्मोहक प्रस्तुति। आत्मीय धन्यवाद Hemant Upadhyay Adv Animesh Upadhyay 

लिंक पर जाएँ :- 


https://youtu.be/bMPv7HrXoKE





गणगौर गीत 3 

गोर ए गणगौर माता खोल किँवाडी

निमाड़ी लोकगीत

पूजा शुरु करने के पहले -


गोर ए गणगौर माता खोल किँवाडी,

 बाहर ऊबी थारी पूजन वाली,

 पूजो ए पुजावो सँइयो काँई-काँई माँगा,

 माँगा ए म्हेँ अन-धन लाछर लिछमी जलहर   जामी बाबुल माँगा,

 राताँ देई माँयड,

 कान्ह कँवर सो बीरो माँगा,

 राई (रुक्मणी) सी भौजाई,

 ऊँट चढ्यो बहनोई माँगा,

 चूनडवाली बहना,

 पून पिछोकड फूफो माँगा,

 माँडा पोवण भूवा,

 लाल दुमाल चाचो माँगा,

 चुडला वाली चाची,

 बिणजारो सो मामो माँगा,

 बिणजारी सी मामी,

 इतरो तो देई माता गोरजा ए,

 इतरो सो परिवार,

 दे ई तो पीयर सासरौ ए,

 सात भायाँ री जोड परण्याँ तो देई माता पातळा (पति) ए,

 साराँ मेँ सिरदार

पूजा शुरु करते हैँ -

ऊँचो चँवरो चौकुटो,

 जल जमना रो नीर मँगावो जी,

 जठे ईसरदासजी सापड्या (विराजे हैँ),

 बहू गोराँ ने गोर पुजावो जी,

 जठे कानीरामजी सापड्या बहु लाडल ने गोर पुजावो जी,

 जठे सूरजमलजी सापड्या,

 बाई रोवाँ ने गोर पुजावो जी,

 गोर पूजंता यूँ कैवे सायब या जोडी इभ् छल (इसी तरह) राखो जी,

 या जोडी इभ् छल राखो जी म्हारा चुडला रो सरव सोहागो जी,

या जोडी इभ छल राखो जी म्हारै चुडला रे राखी बाँधो जी।


दूब के साथ 8 बार पूजा करते हैँ -


गोर-गोर गोमती,

 ईसर पूजूँ पार्वतीजी,

 पार्वती का आला-गीला,

 गोर का सोना का टीका,

टीका दे,

 टमका दे राणी,

 बरत करे गोराँदे रानी,

 करता-करता आस आयो,

 मास आयो,

खेरे खाण्डे लाडू आयो,

 लाडू ले बीरा ने दियो,

 बीरो ले गटकाय ग्यो,

चूँदडी ओढाय ग्यो,

 चूँदड म्हारी इब छल,

 बीरो म्हारो अम्मर,

राण्याँ पूजे राज मेँ,

 म्हेँ म्हाँका सवाग मेँ,

 राण्याँ ने राज-पाट द्यो,

 म्हाँने अमर सवाग द्यो,

राण्याँ को राज-पाट तपतो जाय,

 म्हारो सरब सवाग बढतो जाय ओल-जोल गेहूँ साठ,

 गौर बसे फूलाँ कै बास,

 म्हेँ बसाँ बाण्याँ कै बासकीडी-कीडी कोडूल्यो,

 कीडी थारी जात है,

 जात है गुजरात हैसाडी मेँ सिँघाडा,

 बाडी मेँ बिजौराईसर-गोरजा,

 दोन्यूँ जोडा,

 जोड्या जिमाया,

जोड जँवारा,

 गेहूँ क्यारागणमण सोला,

 गणमण बीस,

 आ ए गौर कराँ पच्चीस

टीकी -

आ टीकी बहू गोराँदे ने सोवै,

 तो ईसरदासजी बैठ घडावै ओ टीकी,

 रमाक झमाँ,

 टीकी,

 पानाँ क फूलाँ टीकी,

 हरयो नगीनो एआ टीकी बाई रोयणदे ने सोवै,

 तो सूरजमलजी बैठ घडावै ओ टीकी,

 रमाक झमाँ,

 टीकी,

 पानाँ क फूलाँ टीकी,

 हरयो नगीनो एआ टीकी बहू ने सोवै,

 तो बेटा बैठ घडावै ओ टीकी,

 रमाक झमाँ,

 टीकी,

 पानाँ क फूलाँ टीकी,

 हरयो नगीनो ऐ।











भास्कर के विशेष कवरेज के लिए धन्यवाद Ashish Dubey


- प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा 

Shailendrakumar Sharma


रविवार, 5 अगस्त 2018

बुधवार, 28 दिसंबर 2016

मालव भूमि की विराट शब्द-यात्रा

मालव भूमि की विराट शब्द-यात्रा: अक्षर पगडंडी
डा. शैलेन्द्रकुमार शर्मा
मालवी साहित्य और संस्कृति के अन्यतम हस्ताक्षर श्री झलक निगम (1940-2010 ई.) एक साथ अनेक दिशाओं में सक्रिय थे। उन्होंने मालवी को कई दृष्टियों से समृद्ध किया है। एक ओर उन्होंने मालवी साहित्य को अनेक महत्त्वपूर्ण कविताएँ और गद्य रचनाएँ देकर समृद्ध कियावहीँ एक श्रेष्ठ अनुवादकसंपादकशोधकर्ता के रूप में विविधमुखी अवदान दिया। उनकी रचनाओं में प्रयोगधर्मिता उभार पर हैजिसके लिए वे विशिष्ट पहचान रखते हैं। झलक जी का कौशल सर्वथाअनछुएअलक्षित विषयों को कविता में ढालने में दिखाई देता है। वे दिनों दिन बढ़ते कथित महानगरीकरण में ओझल होते लोक-जीवन के उन दृश्यों को अनायास पकड़ लेते हैंजो हमारी जैविकता के प्रमाण रहे हैं। उनके मालवी कविता संग्रहों में एरे मेरे की कविता’ (2003 ई.) एवं उजालो आवा दो’ (2006) विशेष उल्लेखनीय हैं। भाँत भाँत की कविता’ शीर्षक एक संग्रह उनके निधन के बाद 2011 में प्रकाशित हुआ। झलक निगम उन कवियों में एक हैंजिन्होंने मालवी कविता की बनी-बनाई लीक को तोड़ने की कोशिश की। साथ ही अपने ढंग से उसे नए सिरे से बनाने की कोशिश भी की। मालवी या किसी अन्य लोक बोली में श्री निगम जैसे साहसी कवि कम ही नजर आते हैंजिन्होंने पुराने और नए दौर की लोक कविता के बीच सेतु की भूमिका निभाई है। उनकी रचनाधर्मिता वर्ण्य-विषय और भाषा की एक नई दुनिया खोलती है। छन्द और लय के संस्कारों के बावजूद लोक-कविता को छंद से मुक्त करने से लेकर नई संवेदनाओं और नए विचारों को नए अंदाज में व्यक्त करने के झलक जी के प्रयत्न महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुए।

मालवी में स्वतंत्र पत्रिका के अभाव की पूर्ति सबसे पहले नरेन्द्र श्रीवास्तव नवनीत’ एवं झलक निगम के संपादन में प्रकाशित फूल-पाती’ से हुईजिसके अब तक कई अंक प्रकाशित हो चुके हैं। इसी कड़ी में श्री झलक निगम के संपादन में वार्षिक पत्रिका जगर मगर’ का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। उनके निधन के बाद श्री निगम की सुपुत्री जेड. श्वेतिमा निगम इसका कुशल संपादन कर रही हैं। जगर मगर’ के अनेक विशेषांक प्रकाशित हुए हैं। झलक जी द्वारा संस्थापित मालवी की इन अव्यावसायिक पत्रिकाओं के प्रकाशन से आज इस क्षेत्र में बहुत बड़े अभाव की पूर्ति हो रही है।
झलक निगम लम्बे समय से मालवी की विशिष्ट शब्दावली पर कार्य कर रहे थे। उन्होंने सुगम राजपथ पर न चलते हुए अक्षर की पगडण्डी पर चलना स्वीकार किया। उनकी इस अत्यंत परिश्रमपूर्वक की गई यात्रा की उपलब्धि है यह पोथी। ‘अक्षर पगडंडी शीर्षक ग्रन्थ झलक जी के जीवन की बड़ी साध और साधना का साकार रूप हैजिसकी पूर्णता के लिए उन्होंने दशकों तक कार्य किया। गाँव-गाँवडगर-डगर घूमते हुए वे एक सजग शब्द-संग्राहक के रूप में अपनी झोली भरते रहे और फिर एक जिज्ञासु की तरह उन शब्दों की व्युत्पत्तिकाल-प्रवाह में आए अर्थ परिवर्तन की मीमांसा करते रहे। यह सुखद है कि उनकी सुपुत्री जेड. श्वेतिमा निगम ने उनकी डायरी और अलग-अलग पन्नों में बिखरे इन शब्द-मोतियों को सँजोने का सार्थक उद्यम किया हैजो हमारे समक्ष है।
झलक जी स्वयं मालवी के विशिष्ट शब्दोंमुहावरों और कहावतों के सजग प्रयोक्ता भी रहे हैं। जीवन से कविता तक वे मालवी की समृद्ध शब्द-राशि का अर्थपूर्ण इस्तेमाल करते रहे। इसीलिए झलक जी की कविताएँ सही अर्थों में लोक हृदय का सार्थक प्रतिबिंब बन पड़ी हैं। वहाँ हमारे युग जीवन की आहट और सामयिक दबाव तो कारगर दिखाई देते ही हैइनसे परे जीवन के शाश्वत प्रवाह के साथ बहने कामालवा के ऋतु-रंग और पर्यावरण में डूबने का सहज व्यापार भी मुखरित हुआ है। उनकी एक कविता में मालवी शब्दावली के सजग प्रयोग से सम्पन्न परिवेश के साथ काले बादल का खिलदंड़ापन हमें उसी तरह आनंदित करता हैजैसा किसी धरती पुत्र किसान या कामगार को। कवि हमें उसके स्वागत में मालवी लोक-संस्कृति के आचार-व्यवहार के साथ ला खड़ा कर देता है।
                घणा हऊ बखत पे आया हो
                म्हूँ गाम का आड़ी तो
                तमारे नारेल चड़ऊँ
                दूध ढोलू
                अगवानी में कंकू अखत चड़ऊँ
                ओ झरता झरमट करता बादला

इसी तरह भारतीय समाज व्यवस्था के विसंगत चेहरे का साक्षात् कराती हाली प्रथा’ को कवि श्री निगम ने चीन्हा और उसे अपनी कविता में साकार किया। वे देखते हैं कि आज भी बड़ी संख्या में हाली हैंजो बंधुआ मजदूर से भी बदतर जिन्दगी जी रहे हैं। उन्हें न दिन में चैन है और न रात में आराम। उस पर यह कहावत ‘‘हाली मवाली को कई है या जात भरोसे का लायक होयज नी है।’’ हाशिये के ऐसे यशहीन लोगों की व्यथा को कवि ने गहरी सहानुभूति के साथ उकेरा।
              घाणी का बैल जस भमता रेवे
              फेर भी जस कोनी हाली का भाग में
              दुनियां काँ जई रीऊन्के नी मालम
             देस में कून राजा कुन पाल्टी को राज।  
लोकभाषाओं के शब्दकोश तो अनेक बने हैंकिन्तु विशिष्ट शब्दावली, जिसमें पारिभाषिक शब्दावली भी समाहित होती है, के विवेचनात्मक परिचय को लेकर बहुत कम कार्य ही हुए हैं।राजस्थानी, भोजपुरी, अवधी, ब्रजी जैसी कुछ लोकभाषाओं में इस तरह का कार्य हुआ है। मालवी में कथाकार स्व. चंद्रशेखर दुबे ने जिंदगी के गीत पुस्तिका में इस तरह के चुनिन्दा शब्दों का संकलन कर परिचय दिया था। उसी पथ पर आगे चलकर श्री झलक निगम ने मालवी में इस तरह की विशिष्ट शब्दावली के संग्रह के अभाव की पूर्ति ‘अक्षर पगडंडी के माध्यम से की है।
लोक के शब्द लंबी यात्रा करते हैं। झलक निगम द्वारा तैयार इस कोश में ऐसे कई शब्द हैं जो काल प्रवाह में गति करते हुए अपनी पहचान को बरकरार रखे हैं। जैसे दान के रूप में अर्पित की जाने वाली अखोतीअक्षत का ही रूप है। पंचामृत दूधदहीघीशहद और शकर के मेल से निर्मित प्रसाद है तो पंजेरी पिसे हुए धनिये के साथ शकर या गुड़ का मिश्रण हैजो कृष्ण जन्माष्टमी पर पूजा में अर्पित किया जाता है। काशी जाना यज्ञोपवीत के अवसर पर विद्याध्ययन के लिए प्रवृत्त होने का प्रतीक हैवहीं पस्ताव तीर्थयात्रा के लिए प्रस्थान की क्रिया हैजो अपशकुन से बचाव के लिये की जाती है। इसमें तीर्थयात्री अपना सामान पहले किसी परिचित के यहाँ रख देते हैंबाद में वास्तविक यात्रा प्रारम्भ करने पर वहीं से सामान उठा कर चल देते हैं।
इस शब्द संचयन में संकलित शब्द कई प्रकार के हैं। उदाहरण के रूप में कृषि एवं व्यवसाय संबंधीपारंपरिक ज्ञानविज्ञानपरक,  लोकाचारपरकसंस्कारपरक, क्रीड़ा, कला एवं मनोरंजनपरकलोक-देवता एवं पर्वोत्सव संबंधी, वस्तु संबंधीविशिष्ट क्रियापरक, शृंगार एवं वस्त्राभूषण संबंधीलोक-विश्वासपरक आदि। संग्रह के बहुत से शब्द मालवा में प्रचलित लोकाचारों का संवहन करते हैं। उदाहरण के रूप में संजा, मांडना, हिरणी, वलसो,मौसर, नातरा, तेड़ा, मांडवो, जलवा, आदि। क्रीड़ा, कला एवं मनोरंजनपरक शब्दों में सतोलिया, माच, छुपमछई, कामण आदि को देखा जा सकता है। कृषि एवं व्यवसाय संबंधी विशिष्ट शब्दों में वखार, वावस्यां, निहरनी आदि उल्लेखनीय हैं। शृंगार एवं वस्त्राभूषण संबंधी शब्दों में कांकण, कांचली, ओढ़नी आदि को देखा जा सकता है।    
झलक जी ने कई विलुत होती परम्पराओंरीति-रिवाजों और वस्तुओं से जुड़े पारिभाषिक शब्दों को भी इस कोश में स्थान दिया है। हीड़बेकड़ली आदि इसी प्रकार के शब्द हैं। बेकड़ली घर-घर जाकर अनाज मांगने की प्रथा हैजो अब लगभग विलुप्ति के कगार पर है। हीड़ मालवा की प्रबन्धात्मक वीरगाथा हैजो बगड़ावत के रूप में सुविख्यात है।
इस संग्रह में कई पारंपरिक ज्ञान-विज्ञानपरक शब्द भी संचित हैं, जैसे चींटियों के आवास को मालवी में कीड़ी नगरा कहा जाता है। मगर-कोदो वह पौधा है, जो जलराशि के किनारे पनपता है और उसे मगर बड़े चाव से खाता है। थुवर, थाला, थागतेलन (एक विशिष्ट कीड़ा), छुईमुई, छेक, घट्टी की माकड़ी, गोयरा, काबर, ओरा, हात्या आदि भी इसी प्रकार के हैं, जिनसे पारंपरिक ज्ञान का संवहन होता आ रहा है।
समग्रतः यह पोथी एक लोक-मनीषी की शब्द साधना का साकार रूप है। इस संचयन के लिए झलक जी ने बड़ी दुरूह राह अपनाई थी। मालवीप्रेमियों, साहित्यकारों के साथ ही आने वाले शोधकों के लिए उनका यह प्रयत्न अत्यंत उपयोगी और प्रेरणास्पद सिद्ध होगा, इसमें कोई संदेह नहीं।      

प्रो शैलेन्द्रकुमार शर्मा
आचार्य एवं कुलानुशासक
विक्रम विश्वविद्यालय,उज्जैन 




गुरुवार, 17 नवंबर 2016

धर्मराजेश्वर मन्दिर और बौद्ध गुफा शृंखला: प्रकृति के सुरम्य अंचल में आस्था और सभ्यता का अनुपम दृष्टान्त - प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा | Dharmarajeshwar Temple and Buddhist Cave Series: A Unique Example of Faith and Civilization in the Picturesque Region of Nature - Prof. Shailendrakumar Sharma


धर्मराजेश्वर मन्दिर और बौद्ध गुफा शृंखला : प्रकृति के सुरम्य अंचल में आस्था और सभ्यता का दृष्टान्त | Dharmarajeshwar Temple and Buddhist Cave Series: A Unique Example of Faith and Civilization in the Picturesque Region of Nature

प्रो शैलेन्द्रकुमार शर्मा
Prof. Shailendrakumar Sharma

मालवा की समृद्ध स्थापत्य कला विरासत के अनन्य प्रतीक धर्मराजेश्वर के शिला निर्मित मन्दिरों और बौद्ध विहारों का अवलोकन स्मरणीय अनुभव बन पड़ा। मध्य प्रदेश के मन्दसौर जिलान्तर्गत शामगढ़ के समीप चन्दवासा (गरोठ) की मनोरम पहाड़ियों को काट कर बनाए गए ये आराधनालय वैश्विक कला विरासत का बेजोड़ उदाहरण हैं। बौद्ध वाङ्मय में उल्लिखित यह स्थान प्राचीन काल में चन्दनगिरि के नाम से प्रसिद्ध था, जिसका प्रभाव समीपस्थ कस्बे चन्दवासा (चन्दनवासा) की संज्ञा में देखा जा सकता है।

लोक किंवदंतियों के बीच भीम द्वारा निर्मित देवालय और गुफाओं के रूप में इनकी चर्चा रही है। धर्मराजेश्वर मन्दिर की तुलना एलोरा के कैलाश मन्दिर से की जाती हैं, क्‍योकि यह मन्दिर भी कैलाश मन्दिर के समान ही एकाश्म शैली में निर्मित है। 8वीं शती में निर्मित इस मन्दिर के लिए विराट पहाड़ी को खोखला कर ठोस प्रस्‍तर शिला को देवालय में बदला गया है। अपनी विशालता, सौंदर्य और कलात्मक उत्‍कृष्‍टता के लिये इस मन्दिर की प्रसिद्धि है, जो 54 मीटर लम्‍बी, 20 मीटर चौडी और 9 मीटर गहरी चट्टान को तराशकर बनाया गया है। उत्तर भारत के मन्दिरों की तरह इस मन्दिर में भी द्वार-मण्‍डप, सभा मण्डप, अर्ध मण्डप, गर्भगृह और कलात्मक शिखर निर्मित हैं।








मध्‍य में एक विशाल मन्दिर है, जिसकी लम्‍बाई 14.53 मीटर तथा चौडाई 10 मीटर हैं, जिसका उन्‍नत शिखर आमलक तथा कलश से युक्‍त है। मन्दिर में महामण्‍डप की रचना उत्कीर्ण की गई है, जो पिरा‍मिड के आकार में है। धर्मराजेश्वर मन्दिर की सुन्‍दर तक्षण कला यहाँ आने प्रत्येक व्यक्ति को पत्‍थर में काव्य का आभास कराती है। प्रतिहार राजाओं की स्थापत्य कलाभिरुचि यहाँ देखने को मिलती है। प्रशस्त शिवलिंग और चतुर्भुज श्रीविष्णु की प्रतिमा मुख्य मंदिर में स्थापित हैं। मुख्य मंदिर के चारों ओर बने छोटे-छोटे मंदिरों में भी 8वीं शताब्दी की मूर्तियां हैं। इनमें एक मूर्ति दशावतार भगवान विष्णु की है, जो तीन भागों में टूटी हुई है। पहले विष्‍णु मंदिर बनाया गया था, जिसे बाद में शिव मंदिर का रूप दिया गया।






 धर्मराजेश्वर मंदिर का शिखर


काउजन के अनुसार पहले यह वैष्णव मंदिर था। बाद में शैव मंदिर में बदल दिया गया। मुख्य मंदिर के गर्भगृह में मध्य में शिवलिंग विराजमान है तथा दीवार पर विष्णु की प्रतिमा है। मुख्य द्वार पर भैरव तथा भवानी की प्रतिमाएँ हैं, जिनके कलात्मक स्वरूप को सिन्दूर से अलग रूप दे दिया है। मुख्य मंदिर के आसपास सात छोटे मंदिर हैं। इनमें एक में सप्तमातृकाओं सहित शिव के तांडव नृत्य का अंकन है। लघु मन्दिरों में शेषशायी विष्णु, दशावतार के पट्ट भी हैं। वहीं कुछ लघु मंदिर प्रतिमा रहित हैं। प्रतिवर्ष महाशिवरात्रि पर यहां मेले का आयोजन किया जाता है।




धर्मराजेश्वर दिल्ली-मुम्बई रेल मार्ग पर स्थित शामगढ़ से 20 किमी दूर है। इस जगह को भीम नगरा भी कहते है। जनश्रुति के अनुसार भीम ने चंबल नदी से विवाह करना चाहा, तो चंबल ने एक ही रात में पूरा शहर बसाने की शर्त रखी, किन्तु शर्त पूरी नहीं हो सकी और भीम पत्थर का हो गया। धमनार की गुफाएं वास्तव में 4-5 वीं शती में निर्मित बौद्धविहार हैं। 





धर्मराजेश्वर मंदिर का गलियारा 








इतिहासकारों में सबसे पहले जेम्स टाड 1821 ई में यहां आये थे। अपने जैन गुरु यतिज्ञानचन्द्र के कथन पर इन्हें जैन गुफा बताया। जेम्स टाड ने अश्वनाल आकृति की शैल शृंखला में लगभग 235 गुफाओं की गणना की थी, किन्तु जेम्स फर्गुसन को 60-70 गुफाएं ही महत्वपूर्ण लगीं।



























लगभग 2 किमी के घेरे में फैली गुफाओं में भी 14 गुफाएं विशेष उल्लेखनीय हैं। छठी गुफा बड़ी कचहरी के नाम से पुकारी जाती है। यह वर्गाकार है तथा इसमें चार खंभों का एक दालान है। सभा कक्ष 636 मीटर का है। 8वीं गुफा छोटी कचहरी कहलाती है। 9वीं गुफा में चार कमरे हैं। चौथे कमरे में पश्चिम की तरफ एक मानव आकृति उत्कीर्ण है। 10वीं गुफा राजलोक रानी का महल अथवा 'कामिनी महल' के नाम से प्रसिद्ध है। 11वीं गुफा में चैत्य बना हुआ है। इसके पार्श्व में मध्य का कमरा बौद्ध भिक्षुओं की उपासना और ध्यान का स्थान था। पश्चिम की ओर बुद्ध की दो प्रतिमाएं उत्कीर्ण हैं। 12वीं गुफा हाथी बंधी कहलाती है। इसका प्रवेश द्वार 16 1/2 फिट ऊंचा है। 13वीं गुफा में कई बड़ी-बड़़ी बुद्ध मूर्तियां हैं।





बौद्ध विहार







गौतम बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद आज से लगभग 1500 साल पहले बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार और व्यापार के लिए एक देश से दूसरे देश तक भ्रमण करने वाले व्यापारियों की मदद ली जाती थी। गुप्त काल में व्यापारियों के लिए समुद्र तट तक पहुंचने के प्रचलित मार्ग में ही मंदसौर का धमनार बौद्ध विहार भी बना था। बौद्ध धर्म की शिक्षा-दीक्षा के लिए यहाँ विहार हुआ करता थे, जहां व्यापारी भी कुछ समय ठहर कर विश्राम करते थे।


प्रो शैलेन्द्रकुमार शर्मा
आचार्य एवम् 
विभागाध्यक्ष
कुलानुशासक
विक्रम विश्वविद्यालय
उज्जैन



सोमवार, 15 जून 2015

संजा लोकोत्सव: विविधरंगी लोक और जनजातीय कला प्रदर्शन

संजा लोकोत्सव : उज्जैन में प्रतिकल्पा द्वारा आयोजित संजा लोकोत्सव के अंतर्गत 15 से 21 सितम्बर 2014 तक दक्षिण मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र, [भारत सरकार], नागपुर के सौजन्य से लोक यात्रा, संजा- मांडना स्पर्धा, कला सम्मान और विविधरंगी लोक और जनजातीय कला प्रदर्शन किये गए। महाराष्ट्र का बंजारा नृत्य, गुजरात का सिद्दी धमाल, राजस्थान का कालबेलिया नृत्य, लांगा गायन, डिंडौरी [मध्यप्रदेश] का सैला कर्मा, मालवा का माच, कानग्वालिया नृत्य, गणगौर, संजा गीत आदि रम्य- रंजनकारी सिद्ध हो रहे हैं। इस अवसर पर डॉ शैलेन्द्रकुमार शर्मा, श्री वानखेडे [नागपुर], डॉ शिव चौरसिया, संस्थाध्यक्ष श्री गुलाबसिंह यादव और सचिव डॉ पल्लवी किशन विभिन्न प्रान्तों के कलाकारों के साथ दीपदीपन करते हुए, नृत्यगुरू श्री हीरालाल जौहरी के सम्मान और विविध प्रस्तुतियों की छबियाँ पेश हैं । इसी कड़ी में 21 सितम्बर को राष्ट्रीय संगोष्ठी कालिदास संस्कृत अकादेमी में संयोजित हुआ। जिसमें डॉ पूरन सहगल, डॉ मणिमोहन चवरे, डॉ शिव चौरसिया, डॉ श्रीकृष्ण जुगनू, डॉ शैलेन्द्रकुमार शर्मा,   डॉ लक्ष्मीनारायण पयोधि, डॉ जगदीशचन्द्र शर्मा , डॉ पल्लवी किशन , डॉ सरिता मैकहार्ग , डॉ राजेश रावल सुशील , सन्दीप सृजन , डॉ अनिल जूनवाल आदि सहित कई संस्कृतिकर्मी शामिल रहे।







शनिवार, 25 मई 2013

अब विद्यार्थी पढ़ेंगे 'यो है म्हारो देश मालवो'



अब विद्यार्थी पढ़ेंगे 'यो है म्हारो देश मालवो'

मालवी और लोकनाट्य माच को वैश्विक शिक्षा पटल पर मिला मान, यूजीसी ने ई-पीजी पाठशाला के सिलेबस में किया शामिल 


आशीष दुबे , उज्जैन 

यो है म्हारो देश मालवो मईमां यां की मोटी, जंगल-जंगल में मंगल पग-पग में पाणी-रोटी। अब तक मेला मंचों और मालवी क्षेत्रों में गूंजने वाले इस गीत को अब स्नातकोत्तर (पीजी) के विद्यार्थी पढऩे, लिखने और याद करने के साथ परीक्षा में भी लिखेंगे। तीन राज्यों के 22 जिलों में दो करोड़ से अधिक लोगों द्वारा बोली जाने वाली मालवी बोली और 220 साल पुराने मालवांचल के प्रसिद्ध लोकनाट्य माच को वैश्विक शिक्षा पटल पर मान मिला है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने मालवा और माच को सम्मान देते हुए इसे ई-पीजी पाठशाला के सिलेबस का हिस्सा बनाया है। 
मानव संसाधन विकास मंत्रालय के राष्ट्रीय शिक्षा मिशन के अंतर्गत ई-पीजी पाठशाला के लिए दो माह पहले ही निर्णय हुआ है, जिसमें यूजीसी इंटरनेट के माध्यम से घर बैठे विद्यार्थियों को विषय के आधार पर पढऩे योग्य सामग्री मुहैया कराएगा। 
हिंदी साहित्य के अंतर्गत भारत के लोक साहित्य की परंपरा विषय में मालवी, मालवी भाषा, लोकनाट्य माच को भी शामिल किया है। 
विक्रम विवि उज्जैन के कुलानुशासक डॉ. शैलेंद्र शर्मा को ई-कंटेंट तैयार करने का जिम्मा यूजीसी की ओर से मिला है। यूजीसी की ई-पीजी पाठशाला के लिए हिंदी कोर्स के को-ऑर्डिनेटर एवं जवाहरलाल नेहरू विवि नईदिल्ली के प्रो. राम बक्ष ने बताया केंद्र की विशेष योजना के अंतर्गत विषय सामग्री तैयार करने का काम किया जा रहा है। आगामी सत्र (2013-14) से इसे शुरू करने का प्रयास है। इससे दुनियाभर के विद्यार्थी, शिक्षक और शोधार्थी घर बैठे पढ़ाई का लाभ ले सकेंगे। 
मालवा और माच पर केंद्रित रहेंगे तीन पाठ 
लोकनाट्य माच एवं मालवी के लिए ई-कंटेंट तैयार कर रहे विक्रम विवि के डॉ. शैलेंद्र शर्मा ने बताया सिलेबस में इन विषयों के करीब तीन पाठ शामिल होंगे। इसमें मालवा, मालवी बोली, लोकनाट्य माच की पृष्ठभूमि, विकास यात्रा, प्रमुख विशेषताएं, शिल्प विधान, वर्ण के रूप में माच गुरु सिद्धेश्वर सेन का माच राजयोगी भर्तृहरि और मार्मिक प्रसंगों को शामिल किया जाएगा। माच पर आधारित वीडियो भी इंटरनेट पर डाले जाएंगे। डॉ. शर्मा के अनुसार विषय सामग्री तैयार कर जल्द ही इसे अंतिम रूप देकर यूजीसी को भेजा जाएगा। मालवी और माच के अलावा बृज, अवधी, मैथिली, भोजपुरी, छत्तीसगढ़ी, राजस्थानी, बुंदेली, हरियाणवी, पहाड़ी और खड़ी बोली को भी विषय सामग्री में शामिल किया जाएगा। 
शहर से ही हुई थी माच की शुरुआत 
इतिहासकार डॉ. भगवतीलाल राजपुरोहित के अनुसार लोकनाट्य माच करीब 220 साल पुराना है। उज्जैन के भागसीपुरा के गुरु गोपालजी ने 1793 में माच लेखन के साथ इसकी शुरुआत की थी। उनके बाद गुरु बालमुकुंदजी, गुरु फकीरचंदजी, गुरु भेरूलालजी और नए दौर में सिद्धेश्वर सेन व ओमप्रकाश शर्मा ने इसे आगे बढ़ाया। माच में संवाद, गीत, नृत्य, संगीत और विशिष्ट रंगतों का प्रयोग कर संपूर्ण नाट्य के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। इसमें पुरुष ही महिलाओं की भूमिका निभाते हैं। माच मालवी की विभिन्न लोकपरंपराओं का समावेश करता है। उज्जैन के अलावा इंदौर भी माच का बड़ा केंद्र है। 






Published on 24 May-2013 DAINIK BHASKAR

रविवार, 22 जनवरी 2012

आधुनिक मालवी कविता के उन्मेषक नरहरि पटेल - प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा

नरहरि पटेल उज्जैन में रचना पाठ  करते हुए।साथ में  डॉ. शैलेंद्रकुमार शर्मा, डॉ. टी. जी.प्रभाशंकर प्रेमी व डॉ. भगवतीलाल राजपुरोहित।   

मालवी कविता में नया उन्मेष लाने वाले रचनाकार नरहरि पटेल

प्रो. डॉ. शैलेन्द्रकुमार शर्मा
        
      भारत के हृदय अंचल की मीठी जुबान मालवी का चाहे लोक साहित्य हो या अभिजात साहित्य – उनमें मालवा की सहज और निश्छल अभिव्यक्ति के दर्शन होते हैं। यह साहित्य सदियों से मालवा के लोक-मानस को प्रतिबिम्बित करता आ रहा है। अन्य भाषाओं के समान मालवी में भी पद्य की शुरूआत पहले हुई। मालवी कविता का शुरूआती रूप कालिदास-शूद्रक आदि की प्राकृत-अपभ्रंश से लेकर राजा भोज के ग्रन्थों और रोड़कवि के राउलवेल काव्य में देखा जा सकता है। फिर इस काव्यधारा को गुरु गोरखनाथ, संत पीपाजी, सिंगाजी, रानी रूपमती, चंद्रखी, सुन्दर कवयित्री, अफजल सहित कई कवियों ने आगे बढ़ाया। आधुनिक काल में पन्नालाल नायाब, नवनिधि कुँवर खांगारोत, युगलकिशोर द्विवेदी, आनन्दराव दुबे, हरीश निगम, सुल्तान मामा, भावसार बा, गिरवरसिंह भँवर, नरेन्द्रसिंह तोमर, पूनमचंद सोनी, मदनमोहन व्यास, बालकवि बैरागी, नरहरि पटेल, पुखराज पांडे, मोहन सोनी, शिव चौरसिया, झलक निगम,नरेन्द्र श्रीवास्तव नवनीत, ललिता रावल, बंसीधर बंधु, राजेश रावल सुशील आदि जैसे अनेक कवियों ने इसे समृद्ध किया। गद्यकार के रूप में पं. सूर्यनाराय व्यास, श्रीनिवास जोशी, चन्द्रशेखर दुबे, डॉ. प्रहलादचन्द्र जोशी, डॉ. पूरन सहगल, ललिता रावल, डॉ. श्यामसुंदर निगम, सिद्धेश्वर सेन, डॉ. भगवतीलाल राजपुरोहित, डॉ. शैलेन्द्रकुमार शर्मा, संजय पटेल, डॉ. तेजसिंह गौड़, विश्वनाथ पोल, राधेश्याम पाठक उत्तम’, सतीश श्रोत्रिय, राधेश्याम परमार बंधु आदि ने मालवी साहित्य को आगे बढ़ाया। मालवी में गद्य और पद्य की अनेक पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। मालवी में पत्रिका प्रकाशन को भी गति मिली है। इसके साथ ही मालवी भाषा और साहित्य के विविध पक्षों पर शोध कार्य में भी तेजी आई है। कथित आधुनिकता के दौर में भी मालवी भाषा और उसके साहित्य का यहाँ लोक-जीवन, लोकमन और पर्यावरण के साथ गहरा रिश्ता बना हुआ है। मालवमना साहित्यकारों और संस्कृतिकर्मियों के सद्संकल्पों से उसे और फलने-फूलने का अवसर आज मिल रहा है। मालवी में संस्कृत, हिन्दी सहित कई भारतीय भाषाओं के साहित्य के अनुवाद में भी तेजी आई है। कालिदास की कृतियों और श्रीमद्‌भगवद्‌गीता से लेकर रामचरितमानस और आधुनिक हिन्दी काव्य तक अनेक रचनाओं के मालवी में अनुवाद हुए हैं।

       आधुनिक मालवी कविता में एक साथ कई दृष्टियों से नवोन्मेष लाने वाले रचनाकारों में नरहरि पटेल का स्थान अप्रतिम है। 2 जनवरी 1934 को सैलाना, जिला तलाम के एक प्रतिष्ठित परिवार में जन्मे श्री पटेल की आरंभिक शिक्षा वहीं हुई। 16 वर्ष की आयु में वे इंदौर आ गये। एम.ए. , एल.एल.बी. तक की शिक्षा इंदौर में हुई और वे अभिभाषक और बाद में कर-सलाहकार बन गये। बचपन से उनके मन में लोक-कला, लोक-गायन और लोक-संस्कृति के प्रति लगाव रहा है। विविधायामी प्रतिभा से सम्पन्न व्यक्तित्व श्री पटेल कवि,  रंगकर्मी,  लेखक,  समीक्षक,  संस्कृतिमनीषी और गायक हैं। नाट्‌य क्षेत्र में नकी गहरी रुचि रही है। इंदौर नगर की रंग-गतिविधियों में वे सदैव सक्रिय रहे हैं। इंदौर में वे नाट्‌य संस्था इप्टा की स्थापना से जुड़े रहे, जो बाद में यवनिका बन गई। बाबा डिके के नाटकों से भी वे सम्बद्ध रहे। कलागुरु विष्णु चिंचालकर से भी उनका गहरा संपर्क बना रहा। अनेक नाटकों में अभिनय करने के साथ ही रंगमंच के कार्यों में वे निरंतर सक्रिय रहे हैं। आकाशवाणी के नाट्‌य- रूपकों में उन्होंने महती भूमिका का निर्वहन किया। विगत छह दशकों से उनकी काव्य-साधना निरंतर गतिमान है।
          नरहरि पटेल (1934) मालवी कविता के क्षेत्र में ध्वनि गीतकार एवं गजलकार के रूप में समादृत हैं।मत रो माता  और मालव की रात उनके मालवी गीत संग्रह हैं। थोड़ी-घणी,  सिपरा के किनारे एवं गुलमोरी धरती पटेलजी के मालवी गजल-संग्रह प्रकाशित हुए हैं। झुमको उनके मालवी गीत, कविता और गजलों का नायाब गुलदस्ता है। उन्होंने हिन्दी में भी सृजन किया है। उजाला दो, गीत गंगा और मन-मुरली उनके प्रमुख हिन्दी कविता संकलन हैं। पटेलजी ने आनंदराव दुबे के काव्य संकलन रामाजी रइग्या ने रेल जाती री, श्रीनिवास जोशी के गद्य संग्रह-वारे पट्‌ठा भारी करी  तथा नरेन्द्रसिंह तोमर के तीन संकलनों का सम्पादन भी किया है।
       श्री पटेल ने स्वातंत्र्योत्तर भारत में नवनिर्माण, श्रम और वीरोचित उत्साह के जागरण के लिए मालवी एवं हिन्दी में काव्य-सृजन की शुरूआत की। प्रथम चरण की उनकी मालवी कविताओं में राष्ट्रीय भावना के साथ-साथ मालवा के लोक-जीवन से जुड़े कई आयाम उभरते दिखाई दिए। इसी कड़ी में उन्होंने मालवी लोकधुनों पर आधारित अनेक मर्ममधुर गीत भी रचे। प्रणय और प्रकृति-सौंदर्य के अनेकानेक संदर्भों को उन्होंने बड़ी कुशलता से अपने काव्य में पिरोया है। बोल्यो कागो कजरारो जी, बिरहण को बारहमासा, आयो फागणियो, जुगल गीत, गोरी तीर नैण का, झुमको जैसे गीतों को इसी श्रेणी में रखा जा सकता है। उनके श्रम एवं प्रयाण गीतों ने भी मालवजन को पर्याप्त उत्प्रेरित किया। इस श्रेणी के गीतों में जारे रण में, म्हारो फूलाँ वारो देस, करज को चुकावणो करो, अब काम करो रे भैया, सीमा पे तू वेगो वेगो चाल, कैसी खेती उगई हो राम, कल-द कल, आई उजाली पूरब वाली आदि उल्लेखनीय हैं। उनकी अधिकांश रचनाएँ वाचिक परंपरा के वैशिष्ट्य का संवहन करती हैं । इसीलिए उन्हें रूबरू सुनना एक अद्वितीय दृश्य- श्रव्य अनुभव होता है।   
       अपनी ग़ज़लों में उन्होंने लोक मन और लोक-जीवन में आ रहे परिवर्तनों के साथ-साथ समसामयिक राजनीतिक-सामाजिक विसंगतियों पर सार्थक टिप्पणी की है। ध्वनिगीत और हाइकू जैसे माध्यमों को भी उन्होंने बखूबी साधा है। उनकी काव्य-यात्रा के पूर्वार्द्ध के मर्मस्पर्शी मालवी गीत और कविताएँ मत रो माता और मालव की रात में संकलित हैं। उत्तरार्द्ध के गीत, गजल, हाइकू ,ध्वनिगीत जैसी विविध विधाओं की रचनाएँ थोड़ी घणी ,गुलमोरी धरती, सिपरा के किनारे और झुमको में संकलित हैं। उनका मन मालवी लोक-संस्कृति के रस-रंगों से सराबोर है। वे मालव की रात का आनंद सबको बाँटना चाहते हैं।
                             चंग झाझर धक ढोल मंजीरा
                  चंचल चित मत वे मतिधीर/ होरी में हुड दंग रंगीला
                             नत नत का तेवार/ मालव की राताँ में....
                पंथीड़ा परभाते जाजो/ मालव की मत रात भुलाजो
                             जाजो पर या बात निभाजो/ आजो जी बारम्बार
                             मालव की राता में/ हे चाँद कुमुदणी को प्यार/ मालव की राताँ में
       भावुकमना श्री पटेल ने पारिवारिक रिश्तों को लेकर कई हृदयग्राही कविताओं की रचना की हैं। माँ, ममता, बापू, दादी, हीरा-मोती, बेटो, बेटा को जनम, बेटी, पीहर-वाट, भुवा आदि इसी प्रकार की रचनाएँ हैं। दादी का मर्मस्पर्शी चित्र देखिए-
                             सुमरणी हाथ में, आँखयाँ में भर्‌या सोरमघट
                             चुगाती चरकला दादी दया की भण्डारण
                             अबोली बावड़ी उँडी, वरद की पोटली जूनी
                             खुणा में सादड़ी सुखी पड़ी हे आपणी दादी।
       यद्यपि नरहरि पटेल ने मालवी में कविता,गीत, गजल, हाइकू आदि सभी कुछ लिखा है, पर उनकी खयाति एक गीतकार और गजलकार के रूप में अधिक है। मालवी में चली आती हुई गजलों की परंपरा और उर्दू गजल के सामंजस्य से पटेलजी ने मालवी में गजल रचना को आगे बढ़ाया। उन्होंने प्रचुर परिमाण में गजलें लिखी हैं। उनके गीतों और गजलों में ताजातरीन सौन्दर्यबोध है। उनमें मालवा की काली मिट्‌टी की गंध स्पष्ट रूप से अनुभव की जा सकती है। यहाँ के लोक-जीवन में जैसी फसलें पकती हैं, उसका  वैसा ही रूप इनकी रचनाओं में उतरा है। गेहूं, चना, अलसी और मक्का के खेतों की सहज सुंदरता कवि मन को बाँधती है। खिलते पलाश उन्हें मुग्ध करते हैं। गन्ने की चरखी से उठती मीठी-मीठी गंध उन्हें आकर्षित करती है और वे उन्हें अपनी रचनाओं से चित्रित करते हैं। बच्चों के खेल-गीतों की तर्ज को आधार बनाकर वे जीवन-मर्म को साकार करने का माद्दा भी रखते है। चर्चित गीत छोटी – छोटी मच्छी किरो पाणी में वे जल की गहराई बढ़ने के साथ कालचक्र में बंधे बचपन, जवानी और बुढ़ापे को जीवंत कर जाते हैं-   
                                                   छोटी – छोटी मच्छी किरो पाणी/ किरो पाणी ?
म्हे नी बतावां लावों गुड-धानी/ लो गुड-धानी
यो सरवर तीर किनारो हे । बस घुटना-घुटना गारो हे
भई पाणी की बलिहारी जी। झलमल हे प्यारो प्यारो हे
लो आओ बतावां इतरो पाणी। ब ब ब ब हप्प, घूघर मार धमीर को ...
         श्री पटेल की काव्य-भाषा में मुहावरों-कहावतों का प्रयोग प्रचुर मात्रा में हुआ है। सादगी और सहजता से भरी भाषा में प्रयोगधर्मिता भी दृष्टिगोचर होती है। उनकी रचनाओं में मालवा के गाँवों का समस्त परिवेश - घर- आँगन, खेत-खलिहान, ग्रामीणों के दैनिक कार्य-कलाप की मर्मस्पर्शी बुनावट है। पारिवारिक रिश्तों की गरमाहट के बीच जब वे अपने बालपन के चित्र सघन ध्वन्यात्मकता के साथ बुनते हैं, तब लगता है पूरा मालवा उनके साथ झूम रहा हो-
                चरर मरर, चरर मरर, चरखो चाले
                दादी थारो चरखो चाले
               कारी कारी गाय को धोरो धोरो दूध रे भई
               भर्या भर्या माटला तायो तायो दूध रे भई
               मचमचाती माटली छपछपाती छाछ रे भई
               कसमसाती कांचली चमचमाती खांच रे भई
               घमड़-घमड़ घमड़-घमड़ जावण वाजे
               भाभी थारो बेरको हाले ....     
          नरहरि पटेल मालवी लोक जीवन के विविध रंगों-रूपों को उकेरने वाले सहज कवि हैं। उनकी रचनाओं में लोक गंध, राष्ट्रीय भावना और सांस्कृतिक चेतना के साथ मानवतावादी विचारधारा के दर्शन होते हैं। रजवाड़ी की झलक लिए उनकी मालवी मीठा प्रभाव छोती है। आधुनिक मालवी कविता-धारा में उनका विशिष्ट स्थान है। लोकमनीषी रामनारायण उपाध्याय ने ठीक ही लिखा है-नरहरि पटेल के गीत,  गजल और उनमें निहित मालव माटी की महक मंत्रमुग्ध कर देती है, जैसे रेगिस्तान में पानी बरस जाय,  भरी दुपहरिया में नंगे पाँव ऊब –खाब पगडंडी पर चलते कोई बदली आशीर्वाद बनकर सिर पर अपना वरदहस्त रख दे।
       माँ की वंदना गीत के जरिये नरहरि पटेल ने जननी जन्मभूमि की अपार महिमा को उकेरा है। इस गीत में उन्होंने प्रकृति के उदात्त और महिमाशाली रूप की झांकी प्रस्तुत कराते हुए चराचर जगत को एकरस कर दिया है, वहीं धरती माँ के दाय को याद कराते हुए उसे परिश्रम के पाट पर विराजने की मनुहार करते हैं ।

नरहरि पटेल उज्जैन में रचना पाठ  करते हुए




म्हें तो वारी वारी जाऊँ मात ये 
थारी मेहमा अपरम्पार ये 
म्हें तो वारी वारी जाऊँ 
धरऊ दिसा में परबत राजा

चँवर ढुलावे माई थारे जी ओ


चाँद-सुरज थारी करे हे आरती


सागर चरण पखारे जीओ


म्हें तो वारी वारी जाऊँ मात ये


थारी महिमा अपरम्पार ये।
लाऊ झाऊ लाऊ झाऊ फसलाँ आवे
खेताँ में नी मावे जीओ
मेनत को जद फल पावेतो
मनवो कईं कईं गावे जीओ
म्हें तो वारी वारी जाऊ मात ये
तू सब की हे भरतार ये।

       मन में संकलप सम्प का धारूँ
          अखत बीज का बावूँ जी ओ
          धूप दीप तो साँच प्रेम का
          सुख का फल जद पाऊँ जीओ
          म्हें तो वारी वारी जाऊँ मात ये
          तू श्रम के पाट पधार ये। (मत रो माता संग्रह से)
       
          आई उजाली पूरब वाली रचना में वे मेहनत को पूजने का संदेश देते हैं, क्योंकि वही मनुष्य का भाग्य बनाता- संवारता है।

नरहरि पटेल  रचना पाठ  करते हुए
      आई उजाली,  पूरब वाली
      आओ रे गावो रे
      धन धन हे गऊ का जाया
      खेत हँकावो रे
      इन्दर राजा बाजा बजावे
      बीज वोवावो रे
      उठो रे प्यारी सोना की क्यारी
      गाड़ी भरावो रे।
    घर घर का सब हाँ भैया
      कोई नी दूजो रे
      आओ रे आओ रे ढोल बजाओ रे
      मेनत पूजो रे
      भूमि हे वाली,  या रखवाली
      देव बधाओ रे।
    भूमि को आसीस बड़ो सब
      सीस चढावो रे
      छत्तर माँ को ऊँची करो ने
       हाथ बढाओ रे
       नवी नवेली लावो हथेली
       भाग लिखावो रे। (मालव की रात संग्रह से)
          गुलमोरी धरती तो उनके लिए अपने प्राण जैसी है, जिस पर सभी को गर्व होना चाहिए। इस गीत में श्री पटेल भारत माता का शृंगार करते किसान , भोले- भाले भारतवासी, सुख- संतोष का पाठ पढ़ाते संत- फकीर और तृप्ति का अनुभव करते अतिथि- सब को एक लय में बांधते हैं।  
       म्हारी गुलमोरी धरती, गुल क्यारी धरती-प्यारी हे म्हारी जान
          म्हारी चाँदी री धरती, सोना री धरती-वाली हे म्हारी जान।
          अन धन दाता भारत माता बेटा थारा करसाण
          मन का राजा मस्त फकीरा नेक कसा इन्सान
          म्हारी दूधाँरी धरती,  पूताँरी धरती-प्यारी हे म्हारी जान
          म्हारी चाँदी री धरती सोना री धरती-वाली हे म्हारी जान।
          मीरा रा मंदर मस्त कलंदर चौपाला में तान
          घट-घट में संतोस समायो धापीग्या मेहमान
          म्हारी संता री धरती, वजंता री धरती-प्यारी हे म्हारी जान
          म्हारी चाँदी री धरती, सोना री धरती-वाली हे म्हारी जान।
          कस्ती डुबी नी हस्ती मिटी नी ऊँची थारी शान
          परमाणु री हाँक लगी तो थर्रइग्यो यो जहान।
          म्हारी वीराँ री धरती,धीराँ री धरती-प्यारी हे म्हारी जान
          म्हारी चाँदी री धरती, सोना री धरती-वाली हे म्हारी जान। (गुलमोरी धरती संग्रह से)
       फूल बनड़ो में उन्होंने लोक में प्रचलित पारंपरिक बन्ना गीत को नया अंदाज दिया है। बन्ने के रूप-सौंदर्य को उन्होने जहां चंद-सूरज से आँका है , वहीं उसकी मनभावनी बातों को भी बड़ी शालीनता से मूर्तिमन्त किया है।  
          म्हारो फूल बनड़ो / फूल बनड़ो-दिलजानी बनड़ो
          म्हारो गेंद बनड़ो / गेंद बनड़ो-दिलदानी बनड़ो।
          ईंकी वास हे घणी सुवाणी, ईकी वात हे घणी लुभाणी
          ईंका रूप को तोल नी ताणी-यो सोमाणी बनड़ो।
          यो तो सूरज जाणे चमके, यो तो चंदो जाणे चमके
          यो तो ध्यानी जेसो दमके-यो गुणज्ञानी बनड़ो।
          आधी राते चंदो आवे, आखी आखी रात सतावे
          म्हारे सिरहाणे लंग जावे-यो रूमानी बनड़ो।
          जाणो हो पटेल यो छोरो, प्यारो प्यारो गोरो गोरो
          छोरो लागे भोरो भोरो - यो नादानी बनड़ो। (झुमको संग्रह से)  
       उनकी ग़ज़ल के शेर थोड़े में बहुत कुछ कहने-समझाने की ताकत रखते हैं। उन्होंने अपनी गज़लों को मानवीय विकलता की अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया है। छोटी-बड़ी सभी बहरों की ग़ज़लें उन्होंने की हैं, जहां रदीफ़ –काफ़िये के निर्वाह के साथ सांकेतिकता और संक्षिप्तता विशेष प्रभाव जमाती है। उर्दू गज़ल के व्याकरण से अनुशासित होने के बावजूद वातावरण और मानसिकता की दृष्टि से उनकी गज़लों को खालिस मालवी ग़ज़ल कहा जा सकता है। अपनी गज़लों में कहीं उनका मन इंसान के निजी और अंतरंग क्षणों को उकेरने में रमा है, तो कहीं वे व्यापक सामाजिक सरोकारों को बड़ी शिद्दत से उभारते हैं। खासतौर पर वे दिनों-दिन छीजते सहज  प्रेम, पारस्परिक सद्‌भाव और सहज उल्लास को फिर से नया उन्मेष देना चाहते हैं। मालवा के देशज मुहावरे और बिंबों ने उनकी गज़लों को जमीनी सचाई से सराबोर किया है, वहीं उन शेरों की सांकेतिकता को और गहराया है। उनकी एक  मालवी ग़ज़ल के चंद शेर देखिए-
       लगई लो जोर को हाको लगई ने देखो तो,
                जगेगा कोई तो देखो जगई ने देखो तो।
                अँधारी रात हे चमकादडाँ हे बंद कपाट,
                नकूचा भेद का तोडो तुई ने देखो तो।
                चरकली एक पडीगी तपती जंगल में,
                दया से हाथ में राखो उई देख तो लो।
       जरा सी प्रेम की पुड़िया हे देवता को प्रसाद,
                सबा ने प्रेम से वाँटो वँटई ने देख तो लो।
                जुदा जुदा जो उड्‌या आपणा कबूतर हे,
                बुलई ने खाँख में राखो बुलई ने दे तो लो।
                कदी पटेल चुभीगी वे वात, माफ करो,
                कदी जो वाँक वे म्हाको भुलई ने देख तो लो। ('थोडी घणी' संग्रह से)
       जाहिर है नरहरि पटेल मालवी कविता धारा में एक विलक्षण उपस्थिति बन गए हैं। मालवी कविता का पाट चौड़ा करने में उनकी भूमिका अद्वितीय रही है। उन्होंने बंधी-बंधाई लीक से हटकर चलते हुए अपनी राह खुद बनाई है । ऐसा करते हुए वे लोकधारा को न सिर्फ आयत्त करते हैं, उसे पुनराविष्कृत भी करते चलते हैं। वे मालव माटी की सौरम को अपनी रचनाओं से गमकाते हैं, जीवन के उन क्षणों की याद दिलाते हैं, जिन्हें छोड़ मनुष्य जाने- अनजाने एक अंधी दौड़ में शामिल हो गया है।        
कसा चहकता था चरकला, कई याद हे के नी या हे
मस्ती में गम्मत रतजगा, कई याद हे के नी या हे।
चमचम चमकता था आँगन, चोखूंट मंडता था मांडणा
बचपन का घुघरा चुरवणियाँ, कई याद हे के नी या हे।
                                
प्रो. डॉ. शैलेन्द्रकुमार शर्मा

डॉ. शैलेन्द्रकुमार शर्मा , श्री पटेल, डॉ. देवेंद्र जोशी और डॉ. राजपुरोहित के साथ
       प्रोफेसर एवं कुलानुशासक
विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन

एफ -2/27 ,विक्रम विश्वविद्यालय परिसर, उज्जैन [म.प्र.]

email:shailendrasharma1966@gmail.com
                                   

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