मालवा भारत का ह्रदय अंचल है. मालवा और उसकी भाषा ,साहित्य एवं संस्कृति सुदूर अतीत से निरंतर प्रवहमान है. इसे सहेजना भारतीय संस्कृति को सहेजना है.इसी की एक कोशिश है...
पेज
- मुखपृष्ठ
- हिंदी विश्व | Hindi Vishwa - Prof. Shailendra Kumar Sharma https://drshailendrasharma.blogspot.com
- e - Content : Online Study Material - Hindi | Prof. Shailendra Kumar Sharma | ई - कंटेंट : ऑनलाइन स्टडी मैटेरियल - हिंदी - प्रो. शैलेंद्र कुमार शर्मा
- Sanskriti Vimarsh - Prof. Shailendra Kumar Sharma | संस्कृति विमर्श - प्रो. शैलेंद्र कुमार शर्मा https://shailendrakumarsharma.wordpress.com
शुक्रवार, 25 मई 2018
रविवार, 13 मई 2018
बालकवि बैरागी: लोक की भूमि पर खड़े अनूठे कवि - प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा
दादा बैरागी! कैसे कहें अंतिम प्रणाम!!!
प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा
मालव सूर्य बालकवि बैरागी जी आज अस्ताचलगामी सूर्य के साथ सदा के लिए विदा कह जाएँगे, यह विश्वास नहीं होता। मालवी और हिंदी के विलक्षण कवि बैरागी जी मंचजयी कवि तो थे ही, उन्होंने लोकसभा, राज्यसभा और विधानसभा - तीनों में प्रतिनिधित्व करने वाले अंगुली गणनीय लोकनायकों में स्थान बनाया है।
मालवी लोक संस्कारों और लोक संगीत से अनुप्राणित कवि बालकवि बैरागी (1931- 2018 ई.) ने स्वातंत्र्योत्तर मालवी कविता को अपने शृंगार, वीर एवं करुण रसों से सराबोर गीतों के माध्यम से समृद्ध किया। वे मालव भूमि, जन और उनकी संस्कृति से गहरे सम्पृक्त रहे। उन्होंने अपनी सृजन-यात्रा की शुरूआत शृंगार एवं सौंदर्य के मर्मस्पर्शी लोक-चित्रों को लोक के ही अंदाज में प्रस्तुत करते हुए की थी। ऐसी गीतों में पनिहारी, नणदल, चटक म्हारा चम्पा, बारामासी, बादरवा अइग्या, कामणगारा की याद, बरखा आई रे आदि बहुत लोकप्रिय हुए।
अनेक देशभक्तिपरक और ओजप्रधान गीतों के माध्यम से उन्होंने भारत माता का ऋण चुकाने का उपक्रम भी किया। ऐसे गीतों में खादी की चुनरी, हार्या ने हिम्मत, लखारा, चेत भवानी आदि खूब गाये-गुनगुनाए गए। स्वतंत्र भारत में नवनिर्माण और विकास के सपनों के साथ उन्होंने श्रम के गीत भी रचे। बीच-बीच में युद्ध के तराने भी वे गाते रहे। उनकी काव्य-यात्रा के प्रथम चरण के शृंगार-सौंदर्य एवं ओजपूर्ण गीत ‘चटक म्हारा चम्पा’ (1983) में और द्वितीय चरण के श्रम एवं ओज के गीत ‘अई जाओ मैदान में’ (1986) में संकलित हैं। मालव लोक से गहरा तादात्म्य लिए उनके भाव एवं सौंदर्य-दृष्टि का साक्ष्य देतीं कुछ पंक्तियाँ देखिए:
उतारूँ थारा वारणा ए म्हारा कामणगारा की याद
नेणा की काँवड़ को नीर चढ़ाऊँ
हिवड़ा को रातो रातो हिंगलू लगाऊँ
रूड़ा रूड़ा रतनारा थाक्या पगाँ से
ओठाँ ही ओठाँ ती मेंहदी रचाऊँ
ढब थारे चन्दा को चुड़लो चिराऊँ
नौलख तारा की बिछिया पेराऊँ
ने उतारूँ थारा वारणा ए म्हारा मन मतवारा की याद।
बैरागीजी लोक की भूमि पर खड़े होकर नित नए प्रयोग करते रहे। उन्होंने मालवी में अपने गाँव-खेड़े से लेकर विश्व फलक पर आ रहे परिवर्तनों को बेहद आत्मीयता और सरल-तरल ढंग से उकेरा है। ‘देस म्हारो बदल्यो’ गीत में वे घर-आँगन, हाट-बाजार, गाँव-शहर सब ओर आ रहे परिवर्तनों के स्वर में स्वर मिलाने का आह्वान करते हैं। इस गीत के हर छंद की समापन पंक्तियों में उन्होंने एक-एक कर कुल छह लोकधुनों का अनूठा प्रयोग किया है।
बदल्यो रे बदल्यो यो देस म्हारो बदल्यो
आनी मानी लाल गुमानी अब विपता नहीं झेलेगा
कंगाली की कम्मर तोड़ी मस्साणां में झेलेगा
जामण को सिणगार करीर्या अपणा खून पसीना ती
ईकी ई ललकाराँ अईरी मथरा और मदीना ती।
तू चंदा मैं चांदनी ... बालकवि बैरागी जी की मशहूर संगीतकार जयदेव द्वारा संगीतबद्ध रचना, जिसे लता मंगेशकर ने स्वर दिया था।
तू चंदा मैं चांदनी, तू तरुवर मैं शाख रे
तू बादल मैं बिजुरी, तू पंछी मैं पात रे
ना सरोवर, ना बावड़ी, ना कोई ठंडी छांव
ना कोयल, ना पपीहरा, ऐसा मेरा गांव रे
कहाँ बुझे तन की तपन, ओ सैयां सिरमोल रे
चंद्र-किरन तो छोड़ कर, जाए कहाँ चकोर
जाग उठी है सांवरे, मेरी कुआंरी प्यास रे
(पिया) अंगारे भी लगने लगे आज मुझे मधुमास रे
तुझे आंचल मैं रखूँगी ओ सांवरे
काली अलकों से बाँधूँगी ये पांव रे
चल बैयाँ वो डालूं की छूटे नहीं
मेरा सपना साजन अब टूटे नहीं
मेंहदी रची हथेलियाँ, मेरे काजर-वाले नैन रे
(पिया) पल पल तुझे पुकारते, हो हो कर बेचैन रे
ओ मेरे सावन साजन, ओ मेरे सिंदूर
साजन संग सजनी बनी, मौसम संग मयूर
चार पहर की चांदनी, मेरे संग बिठा
अपने हाथों से पिया मुझे लाल चुनर उढ़ा
केसरिया धरती लगे, अम्बर लालम-लाल रे
अंग लगा कर साहिब रे, कर दे मुझे निहाल रे।
यूट्यूब लिंक पर जाएँ
https://youtu.be/HHVEd_WhTSk
सदस्यता लें
संदेश (Atom)
विशिष्ट पोस्ट
हिंदी-भीली अध्येता कोश : निर्माण प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा एवं समूह
Hindi - Bhili Learner's Dictionary by Prof Shailendrakumar Sharma & Group हिंदी-भीली अध्येता कोश : कोश निर्माण प्रो शैलेंद्रकुमा...

Folklore of India मालवी लोक संस्कृति की लोकप्रिय पोस्ट
-
आज से २०६८ वर्षों पूर्व चैत्र शुक्ल प्रतिपदा[गुडी पडवा] को मालव संवत का प्रवर्तन हुआ था. मालवा क्षेत्र से प्राप्त प्राचीन ताम्र मुद्रा [ प...
-
मालवा का लोकनाट्य माच और अन्य विधाएँ : पुस्तक समीक्षा लोक - नाट्य की परम्परा की दृष्टि से भारत सहित सम्पूर्ण एशिया अत्यंत समृद्ध है। ल...
-
सन् 1857 के महासमर में सोंधवा ड़ - मालवा की भूमिका The Role of Sondhwad - Malva in Great Rebellion of 1857 1857 ...
-
नरहरि पटेल उज्जैन में रचना पाठ करते हुए।साथ में डॉ. शैलेंद्रकुमार शर्मा, डॉ. टी. जी.प्रभाशंकर प्रेमी व डॉ. भगवतीलाल राजपुरोहित। ...
-
धर्मराजेश्वर मन्दिर और बौद्ध गुफा शृंखला : प्रकृति के सुरम्य अंचल में आस्था और सभ्यता का दृष्टान्त | Dharmarajeshwar Temple and Buddhist...
-
सु मालव देस भलो सबहीं तैं प्रो. शैलेन्द्रकुमार शर्मा भारत का अलग -अलग अंचल में ब...
-
मध्य प्रदेश के पश्चिमी भूभाग और राजस्थान के पूर्वी क्षेत्र को मालवा के नाम से जाना जाता है. इसी मालव प्रदेश की मर्म मधुर बोली...
-
मालवी के मली री हे दुनिया माय पेचान प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा ग्रीक ने मालवी सभ्यता को घणो पुरानो रिश्तो रियो हे। मालवा का केई पुरातात्...
-
मालव भूमि की विराट शब्द-यात्रा: अक्षर पगडंडी डा. शैलेन्द्रकुमार शर्मा मालवी साहित्य और संस्कृति के अन्यतम हस्ताक्षर श्री झलक निगम ...
-
Saila Dance of Gond Tribe|Rina Dance|गोंड जनजातीय समुदाय के सैला और रीना नृत्य की प्रभावी प्रस्तुति| https://youtu.be/VVfhp92mVe4 Prof....