बुधवार, 28 दिसंबर 2016

मालव भूमि की विराट शब्द-यात्रा

मालव भूमि की विराट शब्द-यात्रा: अक्षर पगडंडी
डा. शैलेन्द्रकुमार शर्मा
मालवी साहित्य और संस्कृति के अन्यतम हस्ताक्षर श्री झलक निगम (1940-2010 ई.) एक साथ अनेक दिशाओं में सक्रिय थे। उन्होंने मालवी को कई दृष्टियों से समृद्ध किया है। एक ओर उन्होंने मालवी साहित्य को अनेक महत्त्वपूर्ण कविताएँ और गद्य रचनाएँ देकर समृद्ध किया, वहीँ एक श्रेष्ठ अनुवादक, संपादक, शोधकर्ता के रूप में विविधमुखी अवदान दिया। उनकी रचनाओं में प्रयोगधर्मिता उभार पर है, जिसके लिए वे विशिष्ट पहचान रखते हैं। झलक जी का कौशल सर्वथा, अनछुए, अलक्षित विषयों को कविता में ढालने में दिखाई देता है। वे दिनों दिन बढ़ते कथित महानगरीकरण में ओझल होते लोक-जीवन के उन दृश्यों को अनायास पकड़ लेते हैं, जो हमारी जैविकता के प्रमाण रहे हैं। उनके मालवी कविता संग्रहों में ‘एरे मेरे की कविता’ (2003 ई.) एवं ‘उजालो आवा दो’ (2006) विशेष उल्लेखनीय हैं। ‘भाँत भाँत की कविता’ शीर्षक एक संग्रह उनके निधन के बाद 2011 में प्रकाशित हुआ। झलक निगम उन कवियों में एक हैं, जिन्होंने मालवी कविता की बनी-बनाई लीक को तोड़ने की कोशिश की। साथ ही अपने ढंग से उसे नए सिरे से बनाने की कोशिश भी की। मालवी या किसी अन्य लोक बोली में श्री निगम जैसे साहसी कवि कम ही नजर आते हैं, जिन्होंने पुराने और नए दौर की लोक कविता के बीच सेतु की भूमिका निभाई है। उनकी रचनाधर्मिता वर्ण्य-विषय और भाषा की एक नई दुनिया खोलती है। छन्द और लय के संस्कारों के बावजूद लोक-कविता को छंद से मुक्त करने से लेकर नई संवेदनाओं और नए विचारों को नए अंदाज में व्यक्त करने के झलक जी के प्रयत्न महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुए।

मालवी में स्वतंत्र पत्रिका के अभाव की पूर्ति सबसे पहले नरेन्द्र श्रीवास्तव ‘नवनीत’ एवं झलक निगम के संपादन में प्रकाशित ‘फूल-पाती’ से हुई, जिसके अब तक कई अंक प्रकाशित हो चुके हैं। इसी कड़ी में श्री झलक निगम के संपादन में वार्षिक पत्रिका ‘जगर मगर’ का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। उनके निधन के बाद श्री निगम की सुपुत्री जेड. श्वेतिमा निगम इसका कुशल संपादन कर रही हैं। ‘जगर मगर’ के अनेक विशेषांक प्रकाशित हुए हैं। झलक जी द्वारा संस्थापित मालवी की इन अव्यावसायिक पत्रिकाओं के प्रकाशन से आज इस क्षेत्र में बहुत बड़े अभाव की पूर्ति हो रही है।
झलक निगम लम्बे समय से मालवी की विशिष्ट शब्दावली पर कार्य कर रहे थे। उन्होंने सुगम राजपथ पर न चलते हुए अक्षर की पगडण्डी पर चलना स्वीकार किया। उनकी इस अत्यंत परिश्रमपूर्वक की गई यात्रा की उपलब्धि है यह पोथी। ‘अक्षर पगडंडी’ शीर्षक ग्रन्थ झलक जी के जीवन की बड़ी साध और साधना का साकार रूप है, जिसकी पूर्णता के लिए उन्होंने दशकों तक कार्य किया। गाँव-गाँव, डगर-डगर घूमते हुए वे एक सजग शब्द-संग्राहक के रूप में अपनी झोली भरते रहे और फिर एक जिज्ञासु की तरह उन शब्दों की व्युत्पत्ति, काल-प्रवाह में आए अर्थ परिवर्तन की मीमांसा करते रहे। यह सुखद है कि उनकी सुपुत्री जेड. श्वेतिमा निगम ने उनकी डायरी और अलग-अलग पन्नों में बिखरे इन शब्द-मोतियों को सँजोने का सार्थक उद्यम किया है, जो हमारे समक्ष है।
झलक जी स्वयं मालवी के विशिष्ट शब्दों, मुहावरों और कहावतों के सजग प्रयोक्ता भी रहे हैं। जीवन से कविता तक वे मालवी की समृद्ध शब्द-राशि का अर्थपूर्ण इस्तेमाल करते रहे। इसीलिए झलक जी की कविताएँ सही अर्थों में लोक हृदय का सार्थक प्रतिबिंब बन पड़ी हैं। वहाँ हमारे युग जीवन की आहट और सामयिक दबाव तो कारगर दिखाई देते ही है, इनसे परे जीवन के शाश्वत प्रवाह के साथ बहने का, मालवा के ऋतु-रंग और पर्यावरण में डूबने का सहज व्यापार भी मुखरित हुआ है। उनकी एक कविता में मालवी शब्दावली के सजग प्रयोग से सम्पन्न परिवेश के साथ काले बादल का खिलदंड़ापन हमें उसी तरह आनंदित करता है, जैसा किसी धरती पुत्र किसान या कामगार को। कवि हमें उसके स्वागत में मालवी लोक-संस्कृति के आचार-व्यवहार के साथ ला खड़ा कर देता है।
                घणा हऊ बखत पे आया हो
                म्हूँ गाम का आड़ी तो
                तमारे नारेल चड़ऊँ
                दूध ढोलू
                अगवानी में कंकू अखत चड़ऊँ
                ओ झरता झरमट करता बादला

इसी तरह भारतीय समाज व्यवस्था के विसंगत चेहरे का साक्षात् कराती ‘हाली प्रथा’ को कवि श्री निगम ने चीन्हा और उसे अपनी कविता में साकार किया। वे देखते हैं कि आज भी बड़ी संख्या में हाली हैं, जो बंधुआ मजदूर से भी बदतर जिन्दगी जी रहे हैं। उन्हें न दिन में चैन है और न रात में आराम। उस पर यह कहावत ‘‘हाली मवाली को कई है या जात भरोसे का लायक होयज नी है।’’ हाशिये के ऐसे यशहीन लोगों की व्यथा को कवि ने गहरी सहानुभूति के साथ उकेरा।
              घाणी का बैल जस भमता रेवे
              फेर भी जस कोनी हाली का भाग में
              दुनियां काँ जई री, ऊन्के नी मालम
             देस में कून राजा कुन पाल्टी को राज।  
लोकभाषाओं के शब्दकोश तो अनेक बने हैं, किन्तु विशिष्ट शब्दावली, जिसमें पारिभाषिक शब्दावली भी समाहित होती है, के विवेचनात्मक परिचय को लेकर बहुत कम कार्य ही हुए हैं।राजस्थानी, भोजपुरी, अवधी, ब्रजी जैसी कुछ लोकभाषाओं में इस तरह का कार्य हुआ है। मालवी में कथाकार स्व. चंद्रशेखर दुबे ने ‘जिंदगी के गीत’ पुस्तिका में इस तरह के चुनिन्दा शब्दों का संकलन कर परिचय दिया था। उसी पथ पर आगे चलकर श्री झलक निगम ने मालवी में इस तरह की विशिष्ट शब्दावली के संग्रह के अभाव की पूर्ति ‘अक्षर पगडंडी’ के माध्यम से की है।
लोक के शब्द लंबी यात्रा करते हैं। झलक निगम द्वारा तैयार इस कोश में ऐसे कई शब्द हैं जो काल प्रवाह में गति करते हुए अपनी पहचान को बरकरार रखे हैं। जैसे दान के रूप में अर्पित की जाने वाली अखोती, अक्षत का ही रूप है। पंचामृत दूध, दही, घी, शहद और शकर के मेल से निर्मित प्रसाद है तो पंजेरी पिसे हुए धनिये के साथ शकर या गुड़ का मिश्रण है, जो कृष्ण जन्माष्टमी पर पूजा में अर्पित किया जाता है। काशी जाना यज्ञोपवीत के अवसर पर विद्याध्ययन के लिए प्रवृत्त होने का प्रतीक है, वहीं पस्ताव तीर्थयात्रा के लिए प्रस्थान की क्रिया है, जो अपशकुन से बचाव के लिये की जाती है। इसमें तीर्थयात्री अपना सामान पहले किसी परिचित के यहाँ रख देते हैं, बाद में वास्तविक यात्रा प्रारम्भ करने पर वहीं से सामान उठा कर चल देते हैं।
इस शब्द संचयन में संकलित शब्द कई प्रकार के हैं। उदाहरण के रूप में कृषि एवं व्यवसाय संबंधी, पारंपरिक ज्ञानविज्ञानपरक,  लोकाचारपरक, संस्कारपरक, क्रीड़ा, कला एवं मनोरंजनपरक, लोक-देवता एवं पर्वोत्सव संबंधी, वस्तु संबंधी, विशिष्ट क्रियापरक, शृंगार एवं वस्त्राभूषण संबंधी, लोक-विश्वासपरक आदि। संग्रह के बहुत से शब्द मालवा में प्रचलित लोकाचारों का संवहन करते हैं। उदाहरण के रूप में संजा, मांडना, हिरणी, वलसो,मौसर, नातरा, तेड़ा, मांडवो, जलवा, आदि। क्रीड़ा, कला एवं मनोरंजनपरक शब्दों में सतोलिया, माच, छुपमछई, कामण आदि को देखा जा सकता है। कृषि एवं व्यवसाय संबंधी विशिष्ट शब्दों में वखार, वावस्यां, निहरनी आदि उल्लेखनीय हैं। शृंगार एवं वस्त्राभूषण संबंधी शब्दों में कांकण, कांचली, ओढ़नी आदि को देखा जा सकता है।    
झलक जी ने कई विलुत होती परम्पराओं, रीति-रिवाजों और वस्तुओं से जुड़े पारिभाषिक शब्दों को भी इस कोश में स्थान दिया है। हीड़, बेकड़ली आदि इसी प्रकार के शब्द हैं। बेकड़ली घर-घर जाकर अनाज मांगने की प्रथा है, जो अब लगभग विलुप्ति के कगार पर है। हीड़ मालवा की प्रबन्धात्मक वीरगाथा है, जो बगड़ावत के रूप में सुविख्यात है।
इस संग्रह में कई पारंपरिक ज्ञान-विज्ञानपरक शब्द भी संचित हैं, जैसे चींटियों के आवास को मालवी में कीड़ी नगरा कहा जाता है। मगर-कोदो वह पौधा है, जो जलराशि के किनारे पनपता है और उसे मगर बड़े चाव से खाता है। थुवर, थाला, थाग, तेलन (एक विशिष्ट कीड़ा), छुईमुई, छेक, घट्टी की माकड़ी, गोयरा, काबर, ओरा, हात्या आदि भी इसी प्रकार के हैं, जिनसे पारंपरिक ज्ञान का संवहन होता आ रहा है।
समग्रतः यह पोथी एक लोक-मनीषी की शब्द साधना का साकार रूप है। इस संचयन के लिए झलक जी ने बड़ी दुरूह राह अपनाई थी। मालवीप्रेमियों, साहित्यकारों के साथ ही आने वाले शोधकों के लिए उनका यह प्रयत्न अत्यंत उपयोगी और प्रेरणास्पद सिद्ध होगा, इसमें कोई संदेह नहीं।      

प्रो शैलेन्द्रकुमार शर्मा
आचार्य एवं कुलानुशासक
विक्रम विश्वविद्यालय,उज्जैन 




गुरुवार, 17 नवंबर 2016

धर्मराजेश्वर मन्दिर और बौद्ध गुफा शृंखला: प्रकृति के सुरम्य अंचल में आस्था और सभ्यता का अनुपम दृष्टान्त - प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा | Dharmarajeshwar Temple and Buddhist Cave Series: A Unique Example of Faith and Civilization in the Picturesque Region of Nature - Prof. Shailendrakumar Sharma


धर्मराजेश्वर मन्दिर और बौद्ध गुफा शृंखला : प्रकृति के सुरम्य अंचल में आस्था और सभ्यता का दृष्टान्त | Dharmarajeshwar Temple and Buddhist Cave Series: A Unique Example of Faith and Civilization in the Picturesque Region of Nature

प्रो शैलेन्द्रकुमार शर्मा
Prof. Shailendrakumar Sharma

मालवा की समृद्ध स्थापत्य कला विरासत के अनन्य प्रतीक धर्मराजेश्वर के शिला निर्मित मन्दिरों और बौद्ध विहारों का अवलोकन स्मरणीय अनुभव बन पड़ा। मध्य प्रदेश के मन्दसौर जिलान्तर्गत शामगढ़ के समीप चन्दवासा (गरोठ) की मनोरम पहाड़ियों को काट कर बनाए गए ये आराधनालय वैश्विक कला विरासत का बेजोड़ उदाहरण हैं। बौद्ध वाङ्मय में उल्लिखित यह स्थान प्राचीन काल में चन्दनगिरि के नाम से प्रसिद्ध था, जिसका प्रभाव समीपस्थ कस्बे चन्दवासा (चन्दनवासा) की संज्ञा में देखा जा सकता है।

लोक किंवदंतियों के बीच भीम द्वारा निर्मित देवालय और गुफाओं के रूप में इनकी चर्चा रही है। धर्मराजेश्वर मन्दिर की तुलना एलोरा के कैलाश मन्दिर से की जाती हैं, क्‍योकि यह मन्दिर भी कैलाश मन्दिर के समान ही एकाश्म शैली में निर्मित है। 8वीं शती में निर्मित इस मन्दिर के लिए विराट पहाड़ी को खोखला कर ठोस प्रस्‍तर शिला को देवालय में बदला गया है। अपनी विशालता, सौंदर्य और कलात्मक उत्‍कृष्‍टता के लिये इस मन्दिर की प्रसिद्धि है, जो 54 मीटर लम्‍बी, 20 मीटर चौडी और 9 मीटर गहरी चट्टान को तराशकर बनाया गया है। उत्तर भारत के मन्दिरों की तरह इस मन्दिर में भी द्वार-मण्‍डप, सभा मण्डप, अर्ध मण्डप, गर्भगृह और कलात्मक शिखर निर्मित हैं।








मध्‍य में एक विशाल मन्दिर है, जिसकी लम्‍बाई 14.53 मीटर तथा चौडाई 10 मीटर हैं, जिसका उन्‍नत शिखर आमलक तथा कलश से युक्‍त है। मन्दिर में महामण्‍डप की रचना उत्कीर्ण की गई है, जो पिरा‍मिड के आकार में है। धर्मराजेश्वर मन्दिर की सुन्‍दर तक्षण कला यहाँ आने प्रत्येक व्यक्ति को पत्‍थर में काव्य का आभास कराती है। प्रतिहार राजाओं की स्थापत्य कलाभिरुचि यहाँ देखने को मिलती है। प्रशस्त शिवलिंग और चतुर्भुज श्रीविष्णु की प्रतिमा मुख्य मंदिर में स्थापित हैं। मुख्य मंदिर के चारों ओर बने छोटे-छोटे मंदिरों में भी 8वीं शताब्दी की मूर्तियां हैं। इनमें एक मूर्ति दशावतार भगवान विष्णु की है, जो तीन भागों में टूटी हुई है। पहले विष्‍णु मंदिर बनाया गया था, जिसे बाद में शिव मंदिर का रूप दिया गया।






 धर्मराजेश्वर मंदिर का शिखर


काउजन के अनुसार पहले यह वैष्णव मंदिर था। बाद में शैव मंदिर में बदल दिया गया। मुख्य मंदिर के गर्भगृह में मध्य में शिवलिंग विराजमान है तथा दीवार पर विष्णु की प्रतिमा है। मुख्य द्वार पर भैरव तथा भवानी की प्रतिमाएँ हैं, जिनके कलात्मक स्वरूप को सिन्दूर से अलग रूप दे दिया है। मुख्य मंदिर के आसपास सात छोटे मंदिर हैं। इनमें एक में सप्तमातृकाओं सहित शिव के तांडव नृत्य का अंकन है। लघु मन्दिरों में शेषशायी विष्णु, दशावतार के पट्ट भी हैं। वहीं कुछ लघु मंदिर प्रतिमा रहित हैं। प्रतिवर्ष महाशिवरात्रि पर यहां मेले का आयोजन किया जाता है।




धर्मराजेश्वर दिल्ली-मुम्बई रेल मार्ग पर स्थित शामगढ़ से 20 किमी दूर है। इस जगह को भीम नगरा भी कहते है। जनश्रुति के अनुसार भीम ने चंबल नदी से विवाह करना चाहा, तो चंबल ने एक ही रात में पूरा शहर बसाने की शर्त रखी, किन्तु शर्त पूरी नहीं हो सकी और भीम पत्थर का हो गया। धमनार की गुफाएं वास्तव में 4-5 वीं शती में निर्मित बौद्धविहार हैं। 





धर्मराजेश्वर मंदिर का गलियारा 








इतिहासकारों में सबसे पहले जेम्स टाड 1821 ई में यहां आये थे। अपने जैन गुरु यतिज्ञानचन्द्र के कथन पर इन्हें जैन गुफा बताया। जेम्स टाड ने अश्वनाल आकृति की शैल शृंखला में लगभग 235 गुफाओं की गणना की थी, किन्तु जेम्स फर्गुसन को 60-70 गुफाएं ही महत्वपूर्ण लगीं।



























लगभग 2 किमी के घेरे में फैली गुफाओं में भी 14 गुफाएं विशेष उल्लेखनीय हैं। छठी गुफा बड़ी कचहरी के नाम से पुकारी जाती है। यह वर्गाकार है तथा इसमें चार खंभों का एक दालान है। सभा कक्ष 636 मीटर का है। 8वीं गुफा छोटी कचहरी कहलाती है। 9वीं गुफा में चार कमरे हैं। चौथे कमरे में पश्चिम की तरफ एक मानव आकृति उत्कीर्ण है। 10वीं गुफा राजलोक रानी का महल अथवा 'कामिनी महल' के नाम से प्रसिद्ध है। 11वीं गुफा में चैत्य बना हुआ है। इसके पार्श्व में मध्य का कमरा बौद्ध भिक्षुओं की उपासना और ध्यान का स्थान था। पश्चिम की ओर बुद्ध की दो प्रतिमाएं उत्कीर्ण हैं। 12वीं गुफा हाथी बंधी कहलाती है। इसका प्रवेश द्वार 16 1/2 फिट ऊंचा है। 13वीं गुफा में कई बड़ी-बड़़ी बुद्ध मूर्तियां हैं।





बौद्ध विहार







गौतम बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद आज से लगभग 1500 साल पहले बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार और व्यापार के लिए एक देश से दूसरे देश तक भ्रमण करने वाले व्यापारियों की मदद ली जाती थी। गुप्त काल में व्यापारियों के लिए समुद्र तट तक पहुंचने के प्रचलित मार्ग में ही मंदसौर का धमनार बौद्ध विहार भी बना था। बौद्ध धर्म की शिक्षा-दीक्षा के लिए यहाँ विहार हुआ करता थे, जहां व्यापारी भी कुछ समय ठहर कर विश्राम करते थे।


प्रो शैलेन्द्रकुमार शर्मा
आचार्य एवम् 
विभागाध्यक्ष
कुलानुशासक
विक्रम विश्वविद्यालय
उज्जैन



सोमवार, 15 जून 2015

संजा लोकोत्सव: विविधरंगी लोक और जनजातीय कला प्रदर्शन

संजा लोकोत्सव : उज्जैन में प्रतिकल्पा द्वारा आयोजित संजा लोकोत्सव के अंतर्गत 15 से 21 सितम्बर 2014 तक दक्षिण मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र, [भारत सरकार], नागपुर के सौजन्य से लोक यात्रा, संजा- मांडना स्पर्धा, कला सम्मान और विविधरंगी लोक और जनजातीय कला प्रदर्शन किये गए। महाराष्ट्र का बंजारा नृत्य, गुजरात का सिद्दी धमाल, राजस्थान का कालबेलिया नृत्य, लांगा गायन, डिंडौरी [मध्यप्रदेश] का सैला कर्मा, मालवा का माच, कानग्वालिया नृत्य, गणगौर, संजा गीत आदि रम्य- रंजनकारी सिद्ध हो रहे हैं। इस अवसर पर डॉ शैलेन्द्रकुमार शर्मा, श्री वानखेडे [नागपुर], डॉ शिव चौरसिया, संस्थाध्यक्ष श्री गुलाबसिंह यादव और सचिव डॉ पल्लवी किशन विभिन्न प्रान्तों के कलाकारों के साथ दीपदीपन करते हुए, नृत्यगुरू श्री हीरालाल जौहरी के सम्मान और विविध प्रस्तुतियों की छबियाँ पेश हैं । इसी कड़ी में 21 सितम्बर को राष्ट्रीय संगोष्ठी कालिदास संस्कृत अकादेमी में संयोजित हुआ। जिसमें डॉ पूरन सहगल, डॉ मणिमोहन चवरे, डॉ शिव चौरसिया, डॉ श्रीकृष्ण जुगनू, डॉ शैलेन्द्रकुमार शर्मा,   डॉ लक्ष्मीनारायण पयोधि, डॉ जगदीशचन्द्र शर्मा , डॉ पल्लवी किशन , डॉ सरिता मैकहार्ग , डॉ राजेश रावल सुशील , सन्दीप सृजन , डॉ अनिल जूनवाल आदि सहित कई संस्कृतिकर्मी शामिल रहे।







सोमवार, 9 दिसंबर 2013

मालवा के माच सहित विविध लोक आयामों को समेटता एक महत्त्वपूर्ण ग्रंथ

मालवा का लोकनाट्य माच और अन्य विधाएँ : पुस्तक समीक्षा 

लोक - नाट्य की परम्परा की दृष्टि से भारत सहित सम्पूर्ण एशिया अत्यंत समृद्ध है।  लोकरंजन एवं लोकोपदेश की अनायासता उसे विशिष्ट पहचान देती है।भारत के ह्रदय अंचल मालवा का लोक नाट्य माच इस क्षेत्र में यदि अपनी विलक्षण हैसियत रखता है तो इसका कारण है- माच का समावेशी व्यक्तित्व। माच सहित मालवा की विविधरंगी कला परम्पराओं पर केंद्रित पुस्तक  ‘मालवा का लोक-नाट्य और अन्य विधाएं’ हाल के वर्षों के गहन शोध और विमर्श का परिणाम है। इस पुस्तक की समीक्षा सुधी साहित्यकार  गफूर स्नेही की कलम से प्रस्तुत है।  


समीक्षक - गफूर स्नेही  

                अंकुर मंच, उज्जैन द्वारा प्रकाशित एवं प्रख्यात रंग समीक्षक डा. शैलेन्द्रकुमार शर्मा द्वारा संपादित मुख्य रूप से लोक नाट्य माच पर केन्द्रित पुस्तक ‘मालवा का लोक-नाट्य और अन्य विधाएं’ हाल के वर्षों के प्रकाशनों के बीच एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है। संपादकीय में डा. शैलेन्द्रकुमार शर्मा माच को एक सम्पूर्ण नाट्य और मालवा अंचल का मूर्त स्वरूप माना गया है। प्रकाशकीय में हफीज खान ने इस परम्परा के समक्ष मौजूद चुनौतियों के प्रति चिंता प्रकट करते हुए निरंतरता एवं समर्पण की आवश्यकता जताई है । सम्पादक एवं प्रकाशक का परिश्रम किताब में सर्वत्र परिलक्षित होता है। पुस्तक में सम्मिलित आलेखों ने मालवा के लगभग सम्पूर्ण आयामों को समेट दिया है। जिज्ञासु एवं ज्ञान पिपासुओं के लिए पुस्तक सप्त - सिंधुओं का जल उपलब्ध कराती है।
                ग्रंथ में प्रकाशित लेख ‘भारतीय लोक-नाट्य और माच’ में देवीलाल सामर ने भरत मुनि के लिखित भाषाई स्वरूप को जटिल नियमबद्ध कहा तो लोक बोली को सरल-सहज लोक-नाट्य में समाहित बताया है। उन्होंने नाटक, रूपक और नाट्य की व्याख्या के साथ लोक नाटकों की उत्पत्ति और इतिहास पर भी प्रकाश डाला है। इनके स्रोत रामायण, महाभारत प्रमुख हैं। इनमें आंचलिक प्रेम कथाओं के साथ मुस्लिम आक्रमणों के समय उर्दू-फारसी का सीधा प्रभाव भी बताया है। लोक-नाट्य की विशेषताओं और तुर्रा-कलंगी का विस्तार से वर्णन है। गुंसाई और शाह अली के बीच के दंगल का जिक्र है। तुर्रा शक्ति और कलंगी पुरुष (शिव) का प्रतीक है।
                मालवा की माच परम्परा के संवाहक सिद्धेश्वर सेन ने माच के खेल रचे भी हैं । उनका लेख भी महत्त्वपूर्ण बन पड़ा है। उज्जैन से प्रारंभ इस गाथा के नायक गोपाल गुरु है तो बाद में बालमुकुंद जी। माच नायक जावरा के तो गायिका कालूराम की शिष्या। वैसे माचों में पुरुष ही स्त्री स्वांग रखते रहते हैं। इसी प्रकार विभिन्न वाद्य एवं नृत्यों का भी उल्लेख श्री सेन ने किया है। ‘माच का दर्शन’ में डा. भगवतीलाल राजपुरोहित ने संस्कृत ग्रंथों से बात प्रारंभ की है, जहाँ कालिदास का नाट्य दर्शन भी हैं। उन्होंने सांख्य दर्शन से वही पुरुष-प्रकृति के बीज का माच में प्रस्फुटन होते दर्शाया है।
                रंग समीक्षक डा. शैलेन्द्रकुमार शर्मा ने उज्जैन की माच परम्परा पर केन्द्रित अपने लेखों  में मालवा को विक्रमादित्य और कालिदास से लेकर भेाज-मुंज काल तक सांस्कृतिक वैभव से पोषित बताया है। उज्जैन के माच गुरुओं का ब्यौरा प्रामाणिक है। डा. शर्मा सरल-सहज शैली में प्रभावी परिचय छोड़ते हैं। वे अंकुर मंच तक वृत्तांत पूर्ण करते है। उनका एक आलेख 'लोकनाट्य माच : प्रदर्शन शैली और शिल्प ' माच मंच की सूक्ष्मताओं का प्रमाणिक आकलन करता है।
        डा. शैलेन्द्रकुमार शर्मा ने अपने एक और संकलित आलेख में सामाजिक समरसता के महत्त्वपूर्ण सूत्र माच में तलाशे हैं। इतना ही नहीं, उसकी महती भूमिका भी उजागर करते हैं । वेदकालीन संदर्भ से तुलसी काल तक दृष्टिपात करते हैं। भरत मुनि के नाट्य शास्त्र से लोक-नाट्य माच तक नजर दौड़ाते हैं। उन्होंने मालव सीमा, उससे लगे राजस्थान के ख्याल का प्रभाव और उज्जैन को माच भूमि निरूपित किया है। समरसता के अन्तर्गत दर्शन से लेकर सामाजिक समता तथा धार्मिक सहिष्णुता तक की भाव भूमि पर दृष्टिपात किया है। धार्मिक कथाओं का अतिरेक नहीं, समृद्धकारी कहना उचित होगा। वीरतापूर्ण कथानकों की भी शक्ति बताई है। लोक मंगल और साम्य भावना उभरी है। जाति एवं समाज संबंधी समस्या पर भी माच सुधारक दृष्टि रखते रहे हैं। निष्कर्ष में वे माच को सच्चा साहित्य कहते हैं, जो मूलतः सामाजिक-वैचारिक क्रांति का मार्ग प्रशस्त करता है।
            ‘राजस्थान और मालवा का ख्याल माच ’ में डा. महेन्द्र भानावत ने मालवा-राजस्थान को भौगोलिक और सांस्कृतिक रूप से नजदीक बताया जो सहज सत्य है। इसमें विदूषक संस्कृत नाटकों की तरह अनिवार्य रहा।
                डा. श्यामसुन्दर निगम ने तुर्रा-कलंगी को नौटंकी से एकदम पृथक् बताया है। लोकनुरंजन है, किंतु लोक आदर्श के साथ। मंच, बोली, वेशभूषा, गीत-संगीत, लय-नृत्य तक की बारीकियों का उल्लेख किया है। माच गुरुओं की फेहरिस्त सिलसिलेवार है। माच स्थल एवं विषय तथा विधान परम्परा श्लाघनीय है।
                डा. जगदीशचन्द्र शर्मा सीधे माच को मचान से जोड़ते हैं। परवर्ती प्रांतों के साथ मालवा में केन्द्रित माच गीतों से परिपूर्ण है। मालवा की नकल, स्वांग कला, सवाल-जवाब का सिलसिला, सूझ और दर्शन के साथ इतिहास और लोकजीवन से सम्मिश्रित है। इनमें गणेश, हनुमान भी लोक स्वरूप मे हैं। वे भानावत के हवाले से शेर खां पठान जैसे नायकों को भी सम्मिलित करते हैं। इसमें प्रेम वृत्तांत, संत चरित्र अहम स्वरूप में हैं।
               डा. शिव चौरसिया जैसे सुघर कवि-वक्ता हैं, वैसे ही माच के पैरोकार भी। वे मालवा का प्रांत और प्रांतों की सीमा तोड़ता परिक्षेत्रा बताते हैं। माच को सीधे लोक-नाट्य कहा है। इसकी तुल्यता गरबा, तमाशा, नौटंकी, गबरी के समकक्ष है। डा. चैरसिया के अनुसार मुस्लिम आक्रमणों से इतिहास में जो हुआ उसके विपरीत समृद्धि आई, नई धाराएं जुड़ीं। उज्जैन, बड़नगर, नीमच के परिक्षेत्रा से वर्तमान तक कलम चली है।
                डा. शिवकुमार मधुर ने माच को लोक-संस्कृति के विविध रंगों से चित्रित बताया है। माच को लोक जीवन का अपना साहित्य भी कहा है। वैवाहिक पद्धति का चित्राण भी उनमें एक बताया। बनड़ा, बधाबा, पारसी, कामण सोदाहरण है। सती वृत्तांत भी है, जो लोक जीवन में रचा बसा रहा। हल्दी गीत से भोजन तक का परिदृश्य उकेरा है।
                  मालवी माच में चिंतन की यात्रा नरहरि पटेल ने अपने लेख में की है। संक्षिप्त, सारगर्भित लेखन में इसे लोकरंजक बताया है। डा. प्यारेलाल सरस पंडित ने अपने लेख में प्रभावी लोक-नाट्य माच और उसके संगीत पक्ष पर बखूबी प्रस्तुति की। चूंकि लेखक संगीत के ज्ञाता हैं और माच की जान संगीत, वह भी ठेठ लोक अंचल का। उन्होंने इसमें 68 रंगतें (धुनें) बताई हैं, जो 24 लोक धुन पर आधारित हैं। स्वयं सिद्धेश्वर सेन ने 24-25 रंगतें साधी थीं। इस पर शोध कराना, उपादेय होगा। ढोलक, सारंगी, हारमोनियम, क्लेरेनेट जैसे साद्यों के साथ घुंघरू तो नर्तक के पगों में शुरू से होते हैं।
                संपादक डा. शर्मा ने ‘लोक-नाट्य माच की प्रदर्शन शैली और शिल्प’ विषय लेकर फिर उपस्थिति दर्ज की है। यह आपका अध्ययन एवं सामथ्र्य है। रंगमंचीय खूबियों का महत्त्व तो है ही, दर्शकों को रात-रातभर जादुई कथानकों में बांधे रखना विशेष तथ्य है। माच मंच खुला ही रहता है। जैसा सादा लोक जीवन, वैसा सादा माच मंच। मंच के रेखाचित्रा के साथ ही लेख में आधारभूत पृष्ठभूमि  का परिचय दिया है।
               अशोक वक्त ने शायराना अंदाज से ‘माच उर्फ शबे मालवा में थिरकती संस्कृति’ में बात पूरी की है। उन्हें माच में मालवा और उज्जैन को केन्द्र बनाए आसपास के रंग बिखरे दिखे हैं। न केवल माच वरन् मांडनों से भी क्षेत्रा जाना जाता है। तुर्रा-कलंगी वाला कथानक माच में ठेठ रूप लिए हुए है। इतना ही नहीं उन्होंने माच की अलग-अलग रिवायतंे भी बताई हैं। क्षेत्रों का उल्लेख करते हुए तकनीक और स्वरूप-मंच साज-सज्जा, अभिनय सहित मालवी वैभव का कोश माच है।
                मालवी कवि झलक निगम माच के संदर्भ ‘ढोलक तान फड़क के’ में सांगीतिकता पर बल देते हैं। उनके अनुसार सन् 1800 के आसपास राजस्थान की धारा उज्जैन की ओर आई वहीं विस्तार हुआ, जिसका सबने उल्लेख किया है। कलाकारों को रियासतें भी संरक्षक देती रही हैं। बालमुकुन्द जी से सिद्धेश्वर सेन और युवा अनिल पांचाल तक की माच यात्रा को श्री निगम ने सँजोया है। माच और काबुकी के तहत राजेन्द्र चावड़ा ने इतिहास में 300 वर्ष की यात्रा की है। वे इसे पूर्व की श्वेत-श्याम  फिल्म कहते हैं, जो रंगीन हो गया माच में।  अभिनय, गायन और संगीत का परिपाक माच है। काबुकी में तत्कालीन राजा-महाराजाओं का जीवन चरित्रा रहा। ये जापान के समुराई हैं, जो संस्कृति के रक्षक हैं। सहिष्णुता से माच व्यापक होता गया है।
                डा. धर्मनारायण शर्मा ने तुर्रा-कलंगी को सांस्कृतिक, धार्मिक समन्वय का माध्यम माना हैं जो यथार्थ के सन्निकट है। माच में भी यही देशकाल परिस्थितियों के अनुसार आई है। उन्होंने ब्रह्म और माया का आधार तुर्रा-कलंगी परम्परा में दिखाया है। जाहिर है कि राजा नवाब की भोग विलासिता के विरुद्ध माच विधा विकसित हुई और इसका सद्भाव उपजाने वाला संदेश भी मुखर हुआ। यह कबीर और सूफी विचारों से प्रभावित है। इस संदर्भ में विशद चर्चा की गई है। उदाहरण उक्तियां भी सराहनीय और विषय प्रतिपादित करती हैं।
               डा.  पूरन सहगल ने यायावरी शोध से ‘दशपुर-मालवांचल की माच परम्परा’ को अहम चर्चा का विषय बनाया। जैसे उज्जैन, वैसा गढ़ मंदसौर को बताया है। माच के उद्भव-विकास में चंदेरी का योग बताते हुए जयसिंह राठौर, शाहअली और तुकनगीर गुंसाई की अनिवार्य उपस्थिति दर्ज की, जो तुर्रा-कलंगी के मूल में है। अखाड़ों में रंगतें-लोकगीत खूब परवान चढ़े। इसी में नीमच, मल्हारगढ़, बघाना, धसूंडी का भी जिक्र है। इसमें संगीत, गायकी, नर्तन के समावेश का भी उल्लेख है। मेवाड़-झालावाड़ से प्रेरित माच आज दुर्दिन देख रहा है। उन्होंने इसे पुनर्जीवित करने की आवश्यकता बताई है।
             इसी भांति डा.सुरेन्द्र शक्तावत नीमच पर केन्द्रित तुर्रा-कलंगी अखाड़ों के इतिहास की प्रामाणिक व्याख्या करते हैं। उन्होंने तुर्रा-कलंगी के प्रमुख खिलाडि़यों की सूची और कुछ चित्र भी दिए हैं । मंचन से लेकर उद्देश्य, संगीत पक्ष सामाजिक सरोकार तक को कुशलता के साथ रेखांकित किया है। माच की दृष्टि और संदेश के साथ कुछ संग्राहकों के संग्रह राष्ट्रीय धरोहर योग्य हैं।
                ललित शर्मा की कलम से झालावाड़ की माच परम्परा की संक्षिप्त सारगर्भित प्रस्तुति की गई है। डा. पूरन सहगल के लेख में माच से हटकर प्रदर्शनकारी लोक कलाओं के ठाठ का भी विवरण है। वे कालबेलिया नृत्य, कच्छी घोड़ी नृत्य, घुमर घूमरा, भुवाई, माच, रासलीला, रामलीला, बहरूपिया, विवाह अवसर के खेल तमाशे, पाबूजी, देवनारायणजी की पड़, नट, बाज़ीगर, मदारी, सांसी, कंजर, बेड़नी नृत्य, मौजम बहार, कठपुतली, बाना, गरबा, कालगुवालिया का उल्लेख निपुणता से करते  हैं ।
                मालवा की लोककलाएँ और लोक विधाएं, लेख में डा. आलोक भावसार ने अनूठापन बताया है। उन्होंने मांडना, गोदना, संज्ञा, चित्रावण, लोकगीत, नृत्य, माच की चर्चा की है। ये सभी वसुधैव कुटुम्बकम् का समर्थन करते हैं।
               ‘धन है मनक जमारो ’ में डा. विवेक चौरसिया की युवा कलम ने परम्परा के प्रति अनुराग और समर्पण जगाया है। प्रकृति के साथ घुल मिलकर लोक जीवन में परम्पराएं बल प्रधान करती हैं। प्रत्येक माह के तीज-त्यौहारों में समाहित लोक देवता और उनकी कृपा से जीवन में धन्यता बिखरते लोग हम हैं, हम सब हैं।
                ‘मालवा में लुप्त होती लोक विधा-बेकड़ली’  लेख में डा. धर्मेन्द्र वर्मा ने बेकड़ली की चर्चा की है, जिसे बेजड़ली (घालमेल) भी कहा जाता है। इसमें छल्ले गाते हैं मांगते हुए। यह एक प्रकार से लांगूरिया की निकट भी है। कान गुवालिया, डेंडक माता के सन्निकट भी।
                ‘मालवी हीड़ लोक काव्य’ लेख को रमाकांत चौरडि़या ने सिद्धेश्वर सेन की पंक्तियों के साथ प्रारंभ किया है-मोती की मनवार मालवो, ममता भरयो टिपारो, धन धन या मालव की धरती, धन है मनक जमारो। हीड़ बगड़ावत वीर गाथा है। इसे मालवी-गुर्जर महाभारत भी कहते हैं। विभिन्न हीड़ें हैं- देवनारायण, चालर-गाय, साढू माता, धौला-बैल आदि की हीड़। पशुचारण काल में जन्मी हीड़ में ‘हे ऽ ऽ’ की टेर और लोकदेवताओं की स्तुति समाहित है।
                पुस्तक में ‘मालवा की चित्रकला-शैलचित्रों से चित्रावण तक (डा. भगवतीलाल राजपुरोहित), मालवा-निमाड़ एवं अन्य अंचल के पारम्परिक लोकचित्र (बसंत निरगुणे), मालवा की चित्रावण विधा (डा. लक्ष्मीनारायण भावसार), मालवा की लोककलाः मांडना और संजा (कृष्णा वर्मा) आदि जैसे महत्त्वपूर्ण और सारगर्भित लेख भी हैं। अस्सी का माच मेला-प्रयोजन एवं अनुभव, मालवा माच महोत्सव: खुली आँखों का सपना (हफीज खान), मालवा माच महोत्सवः विविध रंगी माच प्रस्तुतियाँ (डा. शैलेन्द्रकुमार शर्मा), मालवा माच महोत्सवः अपनी पहचान को बचाए रखने का सार्थक उपक्रम (राजेन्द्र चावड़ा) एक तरह से उपसंहारवत लगते हैं। बाल माच प्रदर्शन और लोक संस्कृति संरक्षण की कोशिशों में पंकज आचार्य उम्मीद जगाते हैं। अंत में लोकरंग श्री सम्मान से विभूषित विभूतियों का विवरण है। यह ग्रंथ मालवी संस्कृति और माच के संरक्षण का सुदृढ़ चरण है। 

 -गफूर ‘स्नेही’
सी-79, अर्पिता एंक्लेव
नानाखेड़ा, उज्जैन (म.प्र.)


पुस्तक: मालवा का लोकनाट्य माच और अन्य विधाएँ
सम्पादक: डा. शैलेन्द्रकुमार शर्मा
मूल्य: 100/-रु. पृ. 200, प्रथम संस्करण 2008

प्रकाशक: अंकुर मंच, फव्वारा चौक, उज्जैन









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