मालवा भारत का ह्रदय अंचल है. मालवा और उसकी भाषा ,साहित्य एवं संस्कृति सुदूर अतीत से निरंतर प्रवहमान है. इसे सहेजना भारतीय संस्कृति को सहेजना है.इसी की एक कोशिश है...
मालवी के मर्ममधुर गीतकार मोहन सोनी : रई रई के म्हारे हिचक्याँ अइ री हे - प्रो शैकेन्द्रकुमार शर्मा
Mohan Soni : The Melodious Lyricist of Malvi - Shailendrakumar Sharma
आत्मीय स्मरण दादा मोहन सोनी
मालवी गीतमाला का मनका - गीत 'रई रई के म्हारे हिचक्याँ अइ री हे' मूक हो चला है। दादा मोहन सोनी (23 मई 1938- 18 जून 2019) नहीं रहे, विश्वास नहीं होता। आधुनिक मालवी काव्य को नई रंगत उन्होंने दी थी। पूरे देश को मालवी कविताओं के रस से सराबोर करने वाले स्व. मोहन सोनी ने देश के जाने - माने कवि स्व. बालकवि बैरागी, निर्भय हाथरसी, काका हाथरसी, नीरज, डॉ. शिवमंगल सिंह सुमन, निर्भय हाथरसी, हरिओम पँवार सहित कई दिग्गज हिंदी कवियों के साथ मंच साझा करते हुए मालवी भाषा को नई पहचान दी थी।
उनका चर्चित गीत है-
रई रई के म्हारे हिचक्याँ अइ री हे
लजवन्ती तू ने याद कर्यो होगा।
थारे बिन मोसम निरबंसी लागे
तू हो तो सूरज उगनो त्यागे
म्हारी आँख्यां भी राती वईरी हे
तू ने उनमें परभात भरयो होगा।
सुन लोकगीत का पनघट की राणी
थारे बिन सूके पनघट को पाणी
फिर हवा,नीर यो काँ से लईरी हे
आख्याँ से आखी रात झरयो होगा।
बदली सी थारी याद जदे भी छई
बगिया की सगळी कली कली मुसकई
मेंहदी की सोरभ मन के भईरी हे
म्हारा फोटू पे हाथ धर्यो होगा।
रई रई के म्हारे हचक्याँ अईरी हे
लजवंती तू ने याद कर्यो होगा।
माँ पर मालवी में लिखी गई उनकी यह रचना मालवी की मिठास और माँ की महिमा का सुखद एहसास कराती है:
माता ने धरती माता सरग से बड़ी है
मोहन सोनी
(मालवी कविता)
माता ने धरती माता सरग से बड़ी है
म्हारा पे तो दोई माँ की ममता झड़ी है।
एक ने जनम दियो , दूसरी ने झेल्यो
दोई माँ का खोला में हूँ एक साथ खेल्यो।
एक है बगीचों , दूजी फूल की छड़ी हे
म्हारा पे तो दोई माँ की ममता झड़ी है।
जायी माँ धवावे तो धरती धपावे
एक गावे लोरी , दूजी पालने झुलावे
भावना का सांते जाणे गीत की कड़ी है
म्हारा पे तो दोई माँ की ममता झड़ी है।
सिंघनी को पूत हूँ मै ,गाजूँ ने गजउँगा
धायो हे थान माँ को दूध नी लजउँगा
धरती को धीरज देखो पावँ में पड़ी है
म्हारा पे तो दोई माँ की ममता झड़ी है।
करजदार दोई को पन हिरदा से पूजी
जनम तंई समाले पेली, मरवा पे दूजी
जनम से मरण तक दोई हाजर खड़ी है
म्हारा पे तो दोई माँ की ममता झड़ी है।
(यह कविता स्व. मोहन सोनी के सुपुत्र श्री प्रमोद सोनी ने वरिष्ठ पत्रकार श्री चंद्रकांत जोशी, मुंबई को भेजी थी। उनके सौजन्य से यह कविता साभार प्रस्तुत)
हर बरस मालवा-निमाड़ से लेकर गुजरात, राजस्थान और हरियाणा के विभिन्न अंचलों तक लोक पर्व गणगौर की धूम मचती है। यह विश्वाधार के लोक से संवाद का पर्व है। लोकमन इस मौके पर उमंग और उल्लास में डूब जाता है। आखिर क्यों न हो मालवा की रनुबाई-पार्वती से मिलने घणिया राजा - भोला भण्डारी अपने ससुराल जो आते हैं। फिर दामाद की आवभगत में कमी कैसे रहे।
कुछ तस्वीरें निज संग्रह के काष्ठ शिल्पों की।
चैत्र महीने की शुक्ल पक्ष की तीज को आता है यह लोक पर्व। इस दिन कुंवारी लड़कियां एवं विवाहित स्त्रियाँ शिवजी (इसर जी) और पार्वती जी (गौरी) की पूजा करती हैं। पूजा करते हुए दूब से पानी के छींटे देते हुए गोर गोर गोमती गीत गाती हैं।
नवरात्र के तीसरे दिन यानि कि चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया - तीज को गणगौर माता (माँ पार्वती) की पूजा की जाती है। पार्वती के अवतार के रूप में गणगौर माता और भगवान शंकर के अवतार के रूप में ईशर जी की पूजा की जाती है। प्राचीन समय में पार्वती ने शंकर भगवान को पति रूप में पाने के लिए व्रत और तपस्या की। शंकर जी तपस्या से प्रसन्न हो गए और वरदान माँगने के लिए कहा। पार्वती ने उन्हें ही वर के रूप में पाने की अभिलाषा की। पार्वती की मनोकामना पूरी हुई और पार्वती जी का शिव जी से विवाह हो गया।
तभी से कुंवारी लड़कियां इच्छित वर पाने के लिए ईशर और गणगौर की पूजा करती है। सुहागिन स्त्री पति की लम्बी आयु के लिए यह पूजा करती हैं। गणगौर पूजा चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि से आरम्भ होती है। सोलह दिन तक सुबह जल्दी उठ कर बगीचे में जाती हैं, दूब और फूल चुन कर लाती हैं। उस दूब से दूध के छींटे मिट्टी की बनी हुई गणगौर माता को देती है। थाली में दही, पानी, सुपारी और चांदी के छल्ले आदि पूजन सामग्री से गणगौर माता की पूजा की जाती है।
आठवें दिन ईशर जी पत्नी (गणगौर) के यहां अपनी ससुराल आते हैं। उस दिन सभी लड़कियां कुम्हार के यहाँ जाती हैं और वहाँ से मिट्टी के बर्तन और गणगौर की मूर्ति बनाने के लिए मिट्टी लेकर आती है। उस मिट्टी से ईशर जी, गणगौर माता, मालिन आदि की छोटी छोटी मूर्तियाँ बनाती हैं। जहाँ पूजा की जाती है उस स्थान को गणगौर का पीहर और जहाँ विसर्जन किया जाता है, वह स्थान ससुराल माना जाता है।
यह तस्वीर हमारे निजी संग्रह के काष्ठ शिल्प की।
गणगौर गीत: शुक्र को तारो रे ईश्वर ऊगी रयो। प्रसिद्ध लोक गायिका श्रीमती हेमलता उपाध्याय के स्वरों में। धन्यवाद Shishir Upadhyay - Jaishree Upadhyay
गणगौर नृत्य: श्रीमती साधना उपाध्याय के निर्देशन में निमाड़ गणगौर एवं लोक कला मण्डल, खण्डवा के कलाकारों की सम्मोहक प्रस्तुति। आत्मीय धन्यवाद Hemant Upadhyay Adv Animesh Upadhyay
आवजो निमाड़ मs - निमाड़ी गीत (इस गीत में निमाड जनपद के प्रसिद्ध स्थानों,सन्त कवियों परम्पराओं और व्यंजनों का वर्णन है।)
आवजो निमाड़ मs--गीत
देस यो बसेल छे लीमड़ा की आड़ मs।
माळव्या काकाजी आवजो निमाड़ मs।
काकाजी अपणी छे हरी - भरी वाड़ी।
वाड़ी मs जाणई छे छकड़ा गाड़ी।
वाट तमरी देखी रई वड़दा वाळी लाड़ी।
थकी गया भाईजी न थकी गई माड़ी।
आई गई मिठास अवं वाड़ी का वाड़ मs।
माळव्या काकाजी आवजो निमाड़ मs।
ज्वार को खीचड़ो काकाजी राँधाँगा।
बाटी को चुरमा सी पल्लव बाँधाँगा।
खीर की भजा सी कराँगा वरावणी।
चरका मीठा ताया की पक्की पेरावणी।
मही -घाट भूल्यो रे हऊँ जाफा लाड़ मs।
माळव्या काकाजी आवजो निमाड़ मs।
मईसर का घाट पs कूदी नs न्हावाँगा।
बाबा की मजार पs चादर चढावाँगा।
अहिल्या की गादी पs टेकाँगा. माथो।
रजवाड़ा मs छे उनको बड़ो गातो।
किलो नs मन्दिर छे रेवा कराड़ मs।
माळव्या काकाजी आवजो निमाड़ मs।
रिषभ देव देखण कs बड़वाणी जावाँगा।
खजूरी सिंगा का पगल्या वधावाँगा।
अंजड़ की बयड़ी पs देवी को धाम छे।
ऊन का मंदिर नs को घणो नाम छे।
छिरवेल महादेवजी बठ्या पहाड़ मs।
माळव्या काकाजी आवजो निमाड़ मs।
नाँगलवाड़ी मs नागराज खास छे।
खरगुण मs बाकीमाता को वास छे।
नवग्रह की नगरी मऽ उजास छे।
डोला वाळा सिव का हात मऽ रास छे।
घाम घणो तेज पड़s जेठ नs असाढ़ मs।
माळव्या काकाजी आवजो निमाड़ मs।
महम्दपुर मऽ बड़ा हनुमान छे।
पानवा - सगूर मऽ न्हावण को मान छे।
जयंती माता बड़वाय की स्याण छे।
बाबा बोंदरू नागझिरी ठिकाण छे।
गुतई गयाज तम किनी गुंताड़ मऽ।
माळ्व्या काकाजी आवजो निमाड़ मऽ।
मल्लेसर नगरी देखी जाओ राणा।
गणेसजी रामजी का मंदिर पुराणा।
गंगा झीरा को चाखी जाओ पाणी।
आजादी युग की जेल छे पुराणी।
घर की फिकर अवं जाणऽ देओ भाड़ मऽ।
माळ्व्या काकाजी आवजो निमाड़ मऽ।
भावसिंग बाबा को गाँव छे दवाणा।
इनकी महिमा कऽ बी बखाणा।
नागेसर बाबा सी धरगाँव जाणा।
निमाड़ी लोग मेहनती नऽ स्याणा।
देव आवऽ लोग नऽ कऽ गाँव-गाँव हाड़ मऽ।
माळव्या काकाजी आवजो निमाड़ मऽ।
मनरंगगिर गुरु ब्रह्मगिर की माटी।
सन्त सिंगाजी नs पोसी परिपाटी। काळूजी म्हाराज पीपळया मs ठाँव छे।
अफ़जल जी सन्त को बड़वाणी गाँव छे।
रेवा की किरपा सी फळ लग्या झाड़ मs।
माळव्या काकाजी आवजो निमाड़ मs।
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(टीप--इस गीत में एक करोड़ की आबादी वाले निमाड जनपद के प्रसिद्ध स्थानों,परम्पराओं, सन्त कवियों व व्यंजनों का चित्रण है - कुँअर उदयसिंह अनुज)
शब्दार्थ
लीमड़ा की आड़=नीम की ओट में ,आवजो=पधारियेगा, माळव्या=मालवा वाले, वाट=रास्ता, माड़ी=माँ, खीचड़ो=निमाड़ी व्यंजन, बाटी चुरमा=निमाड के प्रतिनिधि व्यंजन, ताया=निमाड़ी व्यंजन, मही घाट=छाछ व दलिया, हऊँ=मैं, जाफा=अधिक, गणगौर=प्रतिनिधि निमाड़ी लोकपर्व, झालरियो=गीत, रोटा= मोटे अनाज के टिक्कड़, अमाड़ी की भाजी=प्रतिनिधि साग(जैसे पंजाब में सरसों का साग), धाणी=पॉप कार्न, मईसर का घाट= नर्मदा किनारे महेश्वर नगर के प्रसिद्ध घाट, अहिल्या = होल्कर स्टेट की शिव भक्त जग प्रसिद्ध शासिका, रेवा कराड़ =नर्मदा नदी के किनारे, रिषभ देव=जैनियो के प्रथम तीर्थंकर ऋषभ देवजी की बड़वानी नगर के पास सतपुड़ा पहाड़ में 84 फिट ऊंची पाषाण प्रतिमा, खजूरी=500 वर्ष पूर्व जन्मे निर्गुण निमाड़ी कवि सन्त सिंगाजी का जन्म स्थान गाँव, बयड़ी=पहाड़ी ,अंजड़=एक कस्बा जहाँ पहाड़ी पर देवी का मंदिर है, ऊन के मंदिर= यह गाँव खजूराहो के समकालीन मन्दिरो के लिए प्रसिद्ध , छिरवेल महादेव=निमाड़ के प्रसिद्ध सतपुड़ा पहाड़ में स्थित शिवजी, नाँगलवाड़ी= एक गाँव जहाँ सतपुड़ा पहाड़ पर 3 करोड़ की लागत से बना नाग मन्दिर है,खरगुण=खरगोन नगर ,निमाड़ का जिला मुख्यालय, कुंदा धड़= कुंदा नदी के किनारे, घाम=धूप, ठीकरी=एक कस्बा , गाड़ा=बैल गाड़ी से बड़े लकड़ी बड़े पहिये के गाड़े,खण्डवा=एक नगर जो कवि माखनलालजी चतुर्वेदीजी की कर्म स्थली रहा,
सिवा बाबा=निमाड के एक सन्त, बड़वाय =बड़वाह नगर, मल्लेसर =मंड़लेश्वर नगरी, हाड़ मऽ=शरीर में, औंकार= ज्योतिर्लिंग ओंकारेश्वर, खाड़ मs= गड्ढे में, ब्रह्मगिरि मनरंगगिर=600वर्ष पूर्व हुए निमाड़ी सन्त कवि, कालूजी म्हाराज=निमाड़ी सन्त कवि, अफजलजी= सन्त कवि, रेवा=नर्मदाजी
Interview of Prof. Shailendra Kumar Sharma on Malvi Language & Folklore by Hemlata Sharma Bholi Ben मालवी भाषा और लोक संस्कृति पर प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा से साक्षात्कार हेमलता शर्मा द्वारा
Hindi - Bhili Learner's Dictionary by Prof Shailendrakumar Sharma & Group
हिंदी-भीली अध्येता कोश : कोश निर्माण प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा एवं समूह केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा की अध्येता कोश निर्माण योजनांतर्गत अपने साथियों के साथ विषय विशेषज्ञ के रूप में लगभग तीन वर्षों के श्रमसाध्य कार्य के परिणामस्वरूप हिंदी - भीली अध्येता कोश परिपूर्ण हुआ। इस पुस्तक में कोशकार के रूप में प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा, डॉ जगदीश चंद्र शर्मा, डॉ कृष्ण कुमार श्रीवास्तव एवं अन्य लोगों का योगदान रहा। केंद्रीय हिंदी संस्थान के यशस्वी निदेशक प्रो नन्दकिशोर पांडेय के प्रधान सम्पादन में जारी अध्येता कोश निर्माण योजना में अब तक पचास से अधिक कोश या तो पूर्णता पर हैं या प्रकाशित हो चुके हैं।
केंद्रीय हिंदी संस्थान, मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार की महती योजना के तहत जारी कोश निर्माण कार्यशालाओं में तैयार किए जा रहे इन कोशों के माध्यम से हिंदी के साथ देश की अनेक लोक और जनजातीय भाषाओं का प्रभावकारी सेतु बन रहा है, वहीं इन तमाम भाषाओं के बीच अन्तःसम्बन्ध की नूतन दिशाएँ भी उजागर हो रही हैं। हिंदी - भीली अध्येता कोश में लगभग साढ़े तीन हजार आधारभूत शब्दों को लेकर उनके अर्थ के साथ व्याकरणिक सूचनाओं, सहप्रयोगों और विभिन्न अर्थ छबियों का भी समावेश किया गया है। भीली संस्कृति और परम्पराएँ इस देश की सर्वाधिक पुरातन परंपराओं में शामिल हैं। परिश्रम, शौर्य और स्वाभिमान की दृष्टि से यह समुदाय अपनी खास पहचान रखता है। इस कोश के माध्यम से भीली मध्यप्रदेश, राजस्थान और गुजरात के साथ महाराष्ट्र के सीमावर्ती क्षेत्रों की पहली जनजातीय भाषा बन गई है, जिसके अध्येता कोश का निर्माण सम्भव हुआ है। अपने सभी सहयात्रियों को आत्मीय धन्यवाद Dr Jagdishchandra Sharma डॉ. कृष्णकुमार श्रीवास्तव Madhuri Shrivastava श्री शैतानसिंह सिंगाड़, श्री पप्पू भाबोर और श्री बाबूलाल सोलंकी। इस कार्य में जिन भाषाविदों का सार्थक सहयोग मिला, उनमें प्रो चतुर्भुज सहाय, प्रो त्रिभुवननाथ शुक्ल, प्रो परमलाल अहिरवाल, प्रो उमापति दीक्षित शामिल हैं। हिंदी-भीली अध्येता कोश कोश निर्माण प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा एवं समूह Hindi - Bhili Learner's Dictionary by Prof Shailendrakumar Sharma & Group
हिंदी-भीली अध्येता कोश : प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा एवं समूह, विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन
ISBN 978-93-88039-03-1
प्रकाशक : केंद्रीय हिंदी संस्थान, मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार आगरा उत्तर प्रदेश
प्रकाशन वर्ष 2019 ई
Hindi - Bhili Learner's Dictionary by Prof Shailendrakumar Sharma & Group, in collaboration Vikram University, Ujjain
Publisher : Kendriya Hindi Sansthan, Ministry of Human Resourse Devlopment , Govt of India
विश्व फलक पर हिंदी के नए आयाम पर राष्ट्रीय परिसंवाद
सिने गीतकार अभिलाष को विश्व हिंदी सेवा सम्मान
मालवा रंगमंच समिति द्वारा हिंदी पखवाड़े के अवसर पर 22 वें अखिल भारतीय हिंदी सेवा सम्मान एवं दो दिवसीय राष्ट्रीय परिसंवाद के पहले दिन सुप्रसिद्ध सिने गीतकार अभिलाष (इतनी शक्ति हमें देना दाता, मन का विश्वास कमजोर हो ना) को विश्व हिंदी सेवा सम्मान से सम्मानित किया गया। इस कार्यक्रम में उनका सम्मान विक्रम विश्वविद्यालय के कुलानुशासक प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा, समाजशास्त्री प्रो शैलेंद्र पाराशर, व्यंग्यकार डॉ पिलकेन्द्र अरोरा, वरिष्ठ पत्रकार श्री नरेंद्र सिंह अकेला, संस्थाध्यक्ष श्री केशव राय ने किया।
विश्व फलक पर हिंदी के नए आयाम पर केंद्रित राष्ट्रीय परिसंवाद अतिथियों ने विचार व्यक्त किए। श्री अभिलाष ने सैकड़ों फिल्मों में बारह सौ से अधिक गीत रचे हैं। अंकुश, सावन को आने दो जैसी अनेक लोकप्रिय फिल्मों में समाहित उनके गीतों को देश-दुनिया में बहुत गाया-गुनगुनाया जाता है। विश्व प्रसिद्ध गीत 'इतनी शक्ति हमें देना दाता' के लिए अभिलाषजी तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह द्वारा नेशनल अवार्ड मिल चुका है। इस गीत को देश के सैंकड़ों विद्यालयों में प्रार्थनास्वरूप गाया जाता है। इतनी शक्ति हमें देना दाता के अलावा अभिलाषजी के लिखे साँझ भई घर आजा (लता), आज की रात न जा (लता), वो जो ख़त मुहब्बत में (उषा), तुम्हारी याद के सागर में (उषा), संसार है इक नदिया (मुकेश), तेरे बिन सूना मेरे मन का मंदिर (येसुदास) आदि सिने गीत भी लोकप्रिय हुए। सिने गीतों पर उनसे हुई चर्चा यादगार रहेगी।
सिने जगत के मीडिया परामर्शक श्री केशव राय Keshav Rai ने यह यादगार अवसर जुटाया था। उनकी ओर से समारोह रपट -
मालवा रंगमंच समिति द्वारा राष्ट्रीय हिंदी सेवा सम्मान 2018 और परिसंवाद आयोजित किया गया। समारोह में प्रख्यात सिने गीतकार श्री अभिलाष को सम्मानित किया गया। कार्यक्रम के अतिथि विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन के कुलानुशासक प्रो शैलेन्द्रकुमार शर्मा, समाज चिन्तक प्रो शैलेन्द्र पाराशर, वरिष्ठ पत्रकार श्री नरेंद्र सिंह अकेला, व्यंग्यकार डॉ पिलकेंद्र अरोरा, मालवा रंगमंच समिति के संस्थापक अध्यक्ष श्री केशव राय आदि ने अभिलाष जी को सम्मान पत्र, प्रतीक चिह्न अर्पित कर उनका आत्मीय सम्मान किया। सिने गीतकार अभिलाष जी ने अपने संबोधन में कहा कि हिन्दी सिनेमा के गीतों के माध्यम से उनकी पहचान दूर देशों तक पहुंची है। इतनी शक्ति हमें देना दाता गीत दुनिया की कई भाषाओं में अनूदित हुआ।
प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा
गीतकार अभिलाष
प्रो शैलेन्द्रकुमार शर्मा ने अपने उद्बोधन में कहा कि हिंदी को विश्व भाषा बनाने में सौ से अधिक देशों में बसे तीन करोड़ से ज्यादा भारतवंशियों की अहम भूमिका है। इसी तरह हिंदी फिल्मों और उनके गीतों ने महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। विदेशों में बसे भारतीयों के लिए हिन्दी महज सम्प्रेषण की भाषा नहीं, अपनी संस्कृति, अपने जीवन का पर्याय है।
प्रो शैलेंद्र पाराशर ने हिंदी से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला। श्री नरेंद्र सिंह अकेला, डॉ पिलकेन्द्र अरोरा आदि ने भी विचार व्यक्त किये । 1 सितम्बर को आयोजित समारोह के प्रारम्भ में स्वागत वक्तव्य संस्थाध्यक्ष श्री केशव राय ने दिया। सम्मान पत्र का वाचन श्री महेश शर्मा अनुराग ने किया। अतिथि स्वागत श्री राजेश राय, श्री महेश शर्मा अनुराग, श्री प्रमोद राय,श्री ऋषि राय, श्री हर्षवर्धन लाड़, श्री प्रकाश बांठिया आदि ने किया। श्री अभिलाष जी के लोकप्रिय गीत इतनी शक्ति हमें देना दाता पर आधारित कथक शैली में मनोरम नृत्य की प्रस्तुति प्रतिभा रघुवंशी के निर्देशन में नई पीढ़ी के कलाकारों ने दी। संचालन कवि श्री दिनेश दिग्गज और आभार श्री प्रकाश बांठिया ने माना ।
बहुरंगी भारतीय नृत्य, संगीत, नाट्य पर एकाग्र चैनल को पसन्द, शेयर और सब्सक्राइब करने के लिए लिंक पर जाएँ।
प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा
Prof. Shailendrakumar Sharma
मालव सूर्य बालकवि बैरागी जी आज अस्ताचलगामी सूर्य के साथ सदा के लिए विदा कह जाएँगे, यह विश्वास नहीं होता। मालवी और हिंदी के विलक्षण कवि बैरागी जी मंचजयी कवि तो थे ही, उन्होंने लोकसभा, राज्यसभा और विधानसभा - तीनों में प्रतिनिधित्व करने वाले अंगुली गणनीय लोकनायकों में स्थान बनाया है।
मालवी लोक संस्कारों और लोक संगीत से अनुप्राणित कवि बालकवि बैरागी (1931- 2018 ई.) ने स्वातंत्र्योत्तर मालवी कविता को अपने शृंगार, वीर एवं करुण रसों से सराबोर गीतों के माध्यम से समृद्ध किया। वे मालव भूमि, जन और उनकी संस्कृति से गहरे सम्पृक्त रहे। उन्होंने अपनी सृजन-यात्रा की शुरूआत शृंगार एवं सौंदर्य के मर्मस्पर्शी लोक-चित्रों को लोक के ही अंदाज में प्रस्तुत करते हुए की थी। ऐसी गीतों में पनिहारी, नणदल, चटक म्हारा चम्पा, बारामासी, बादरवा अइग्या, कामणगारा की याद, बरखा आई रे आदि बहुत लोकप्रिय हुए।
अनेक देशभक्तिपरक और ओजप्रधान गीतों के माध्यम से उन्होंने भारत माता का ऋण चुकाने का उपक्रम भी किया। ऐसे गीतों में खादी की चुनरी, हार्या ने हिम्मत, लखारा, चेत भवानी आदि खूब गाये-गुनगुनाए गए। स्वतंत्र भारत में नवनिर्माण और विकास के सपनों के साथ उन्होंने श्रम के गीत भी रचे। बीच-बीच में युद्ध के तराने भी वे गाते रहे। उनकी काव्य-यात्रा के प्रथम चरण के शृंगार-सौंदर्य एवं ओजपूर्ण गीत ‘चटक म्हारा चम्पा’ (1983) में और द्वितीय चरण के श्रम एवं ओज के गीत ‘अई जाओ मैदान में’ (1986) में संकलित हैं। मालव लोक से गहरा तादात्म्य लिए उनके भाव एवं सौंदर्य-दृष्टि का साक्ष्य देतीं कुछ पंक्तियाँ देखिए:
उतारूँ थारा वारणा ए म्हारा कामणगारा की याद
नेणा की काँवड़ को नीर चढ़ाऊँ
हिवड़ा को रातो रातो हिंगलू लगाऊँ
रूड़ा रूड़ा रतनारा थाक्या पगाँ से
ओठाँ ही ओठाँ ती मेंहदी रचाऊँ
ढब थारे चन्दा को चुड़लो चिराऊँ
नौलख तारा की बिछिया पेराऊँ
ने उतारूँ थारा वारणा ए म्हारा मन मतवारा की याद।
बैरागीजी लोक की भूमि पर खड़े होकर नित नए प्रयोग करते रहे। उन्होंने मालवी में अपने गाँव-खेड़े से लेकर विश्व फलक पर आ रहे परिवर्तनों को बेहद आत्मीयता और सरल-तरल ढंग से उकेरा है। ‘देस म्हारो बदल्यो’ गीत में वे घर-आँगन, हाट-बाजार, गाँव-शहर सब ओर आ रहे परिवर्तनों के स्वर में स्वर मिलाने का आह्वान करते हैं। इस गीत के हर छंद की समापन पंक्तियों में उन्होंने एक-एक कर कुल छह लोकधुनों का अनूठा प्रयोग किया है।
बदल्यो रे बदल्यो यो देस म्हारो बदल्यो
आनी मानी लाल गुमानी अब विपता नहीं झेलेगा
कंगाली की कम्मर तोड़ी मस्साणां में झेलेगा
जामण को सिणगार करीर्या अपणा खून पसीना ती
ईकी ई ललकाराँ अईरी मथरा और मदीना ती।
तू चंदा मैं चांदनी ... बालकवि बैरागी जी की मशहूर संगीतकार जयदेव द्वारा संगीतबद्ध रचना, जिसे लता मंगेशकर ने स्वर दिया था।
मालवी के मली री हे दुनिया माय पेचान प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा ग्रीक ने मालवी सभ्यता को घणो पुरानो रिश्तो रियो हे। मालवा का केई पुरातात्विक महिमा वाली जगा पे बाईस सो साल पेलां का ग्रीक सिक्का ने निष्क सरीका जेवर मिल्या हे। ग्रीक ने मालवी लोक गीत - संगीत का मेलजोल से मालवा की कलाकार डॉ सरिता मेकहार्ग ने मेलबॉर्न में रेवा वाला ग्रीक - ऑस्ट्रेलियाई संगीतकार बायरन जाग के सांते तैयार करी हे परम्परा माय नवाचार की नई जमीन। आओ मनावां गुड़ी पड़वा के दन मालवी दिवस: बोलांगा तो बंचेगी मालवी। घणी घणी बधइ ने स्वस्तिकामनाएँ डॉ सरिता बोरलिया Sarita Mcharg Sarita Borliya संग सहभागीजन। डॉ सरिता ने मालवा के विविधमुखी कला और संगीत रूपों के प्रशिक्षण, नवाचार और विस्तार के लिए भी पर्याप्त प्रयास किए हैं। इनमें प्रमुख हैं: संजा, गणगौर, बना-बनी गीत, कबीर एवं नाथ पंथी गायन आदि। मालवी लोक संस्कृति: परम्परा और नवाचार
ठावा कवि नवनीत जी ने उनां की मनभावन आत्मकथा: कंई कूँ ने कंई नी कूँ
प्रो शैलेन्द्रकुमार शर्मा
मालवी ने हिंदी का ठावा कवि ने गद्यकार नरेन्द्र श्रीवास्तव ‘नवनीत’ ( 9 मार्च 1942 ई.) ने एक साथ केई माध्यमहुण से पेलां हिंदी ने फेर मालवी साहित्य को मान बड़ायो हे। उनां ने केई दसक तक हिंदी माय सर्जन कर्यो। अबार वी मालवी माय मर्ममधुर गीत, दोहा, गजल, छंद बद्ध ने मुक्त रचना पिछला दो - तीन दसक से लिखी रिया हे। मालवी कविता ने गद्य - दोई का पाट चोड़ा करवा की उनकी कोसिस चोखो रंग लई री हे। उनां की खास मालवी कविताहुण भुंसारो (2005), ‘उजाला आवा दो’ (2006), ‘सवेरा सवेरी’ (2008), कविता नी मरे रे कदी (2011), कईं तमने सुन्यो (2013) संग्रहहुण में प्रकाशित हे। उनां ने मालवी में खंडकाव्य श्रीदेवनारायण चरित (2009) ने भरत को समाजवाद (2017) की रचना भी करी हे। मालवी में गद्य की कमी से उनको मन व्यथित थो, तब वी वणी दिशा में बी सक्रिय विया। उनां ने मालवी का लोक मनीषी डॉ प्रह्लादचंद्र जोशी की मालवी में जीवनी गुदड़ी को लाल लिखी ने फेर हाल में ज उनां ने मनभावनी मालवी माय अपनी आतमकथा ‘कंई कूँ ने कंई नी कूँ’ पूरी करी हे, जिके हम लोक भाषा की बड़ी उपलब्धि कईं सकां।
नवनीत जी की काव्य प्रतिभा की उठान मालवा का लोक जीवन का घणा ने जीता जागता बिम्बहुण की बुनावट में नगे आए हे। उनकी कविताहुण में लोक के देखवा की चोखी दृष्टि समइ हे। उनां ने जिंदगी का कई रंग गीत, दोहा, गजल आदि का जरिया पेश कर्या हे, जाँ वी छोटा छोटा काव्य कथन का जरिया बी आखो पूरो वातावरण खड़ा करवा में खूब सफल रिया हे। अईं चोमासा रा दोहा की बानगी देखी सको-
फर-फर चाले बायरो, झाड़ रया रे डोल,
छेड़ो उगाड़ आँगणे, आँख्या हँस री बोल।
अई बरात-बूंदा की, बज्या मेघ रा ढोल,
दुलो पानी बाबो रे, दरवज्जो तो खोल।
जद जाड़ो अपणा पूरा साज-बाज के साथ आए हे, तब कवि उका स्वागत में भी पलक-पावड़ा बिछई ने खड़्यो हे। कवि ने जाँ केई नवा उपमान गढ़या हे तो केई व्यंजनामूलक अभिव्यक्ति भी करी हे। ‘जाड़ा रा दोहा’ का कुछ मारक अंश देखो-
झरी रियो हे मेघरो, कंई नगे नी आय,
ई दन बी आँधा हुआ, आँख्या री मिचाय।
कामला में कँपई री, कैसी ठंडी धूर,
छोरा छोरी धूजर्या, या सतवंती हूर।
‘सियाले’ में उनां ने मानवोचित क्रियाकलापहुण के भी दर्शन कर्या हे। वी जद अपना साथ लईने हमारे हाँपता विया सियाला से भेंट करवाए हे, तब ऊना मोसम का अंदर ने बाहर की दुनिया पे पड़वा वालो असर जीवंत हुई जाए हे। एक चित्र देखो-
दन तो निकल्यो पण, दिखे नी उजालो हे,
धुँध लई ने आयो हाँ पीर्यो सियालो हे।
आँगणे बैठ्या बूढ़ा, तापे छोरा छोरी।
गोबर भर्यो टोपलों, लई ने चाली गोरी।
जिनगी बोझे मर री, मूँडे लग्यो तालो है,
धूँध लई न आयो रे हाँपीर्यों सियालो है। (सियालो)
मालवा में उनाला (ग्रीष्म), बसंत और फागुन की आमद के कवि ने ऊका देशज स्वभाव का सांते जोड़ी ने वर्णन कर्यो हे।
गरमी से जुड़्या केई लोक चित्रहुण के उनां ने दोहा हुण का माध्यम से भी उकेर्यो हे। मनुष्य और चौपायों की कईं पूछां खुद जिन्दगी अपनो दाँव हारती नगे आए हे।
घर बायर रात दन बस, मूँ ती निकले हाय,
कालो हुईर्या मूंड़ा अब बरसी रे लाय।
मनक ने ढाँड़ा ढूंडे, गेरी-गेरी छाँव,
बैठी बैठी हाँफ री, जिनगी हारी दाव (गरमी का दोहा)
बसंत की आमद पे धरती का शृंगार के कवि ने एक गीत का जरिया सरस अभिव्यक्ति दी हे। जाँ बसंत से मिलवा वास्ते बेचेन नायिका धरती ने जो आभूषण-अलंकरण धारण कर्या हे, वी बनावटी नी हुई के ऊनी ऋतुरंग से ही ज उपज्या हे। आखिर फूलां से सजी हरी चूनरी, गऊँ की गलसरी, केसूड़ी की पायल, अलसी की नथ जसा केई उपकरणहुण से सजी-धजी धरती से बसंत क्यों नी आकर्षित होएगा?
बसंत थारी अगवानी में या धरती सिनगार करे रे,
कोयल मीठा गीत गई के, मनवार सतकार करे रे।
देखो पेरी ली या हरी-हरी फूल टकी चूनड़ी,
गला में ‘गँऊ’ री गलसरी, पगड़ा पायल ‘केसूड़ी’।
आखी केसूड़ी वई री लाल।
नवनीत जी ने सामयिक विसंगतिहुण पे भी खूब लेखनी चलई है वहीं वी कविता के लोगाँ के बीच दिनों दिन चोड़ी होती धरम ने जात पात की खाई हुण के पाटवा को माध्यम भी बनाए हे।
खुदा क्याँ हे दूसरो, ई अल्ला ई राम,
घर का झगड़ा करे, घर को काम तमाम।
नवनीत जी केई गजल बी मालवी में रची हे। उनां की गजलहुण को संग्रह ‘कंई तमने सुन्यो’ माय वी जिंदगी का केई रंग उकेरवा में कामयाब रिया हे। उनकी एक गजल की मारक क्षमता देखो, जद वी घर-संसार में डुब्या लोगां से लईने घरबार छोडीने बाबा बन्या लोगां की खबर ले हे:
दुनियाँ से दूर तपी रिया, बाबाजी।
ईसवर को नाम जपी रिया बाबाजी।
मन मार मार के लगायो माला मेँ ,
संसारी सुख के छली रिया बाबाजी।
रंग रंगीला मुखडा पे मौन साध्यो
आज बोल के ईं छपी रिया, बाबाजी।
राखोडो खई के तेज बढायो हे,
हिरदा-हिरदा से नपी रिया बाबाजीl
सीख कड़वी या दुनियाँ नी माने हे
नवनीत घणा ईं कंपी रिया बाबाजी।
नवनीत जी ने संस्कृत ने हिंदी से केई खास रचनाहुण को अनुवाद भी कर्यो हे, उदाहरण सारू तुलसी कृत रामचरितमानस, जानकी मंगल, भरथरी का तीनी शतक- नीति, शृंगार ने वैराग्य। मालवी गद्य की परगति में भी वी लगातार लग्या हुआ हे। अच्छा गद्य के कवि को निकष मान्यो ग्यो हे। संस्कृत की उक्ति हे, गद्यं कवीनां निकषं वदन्ति। इको अरथ हे गद्य लेखन ही कवि होवा की सामर्थ्य की कसोटी होए हे अर्थात, जो कवि जितरो साफ सुथरो, गठ्यो हुओ, सारवान ने असर डालवा वालो गद्य लिखी सके हे, ऊ उतरो ज बड़ो कवि बी होय हे। हमारे किणी कवि को मूल्यांकन करनो होए तो ऊका द्वारा लिख्या ग्या गद्य को अध्ययन ने मीमांसा करनो चईये। नवनीत जी जितरा कविता माय सफल हे, उतरा गद्य माय बी निपुण हे। उनाँ की अविराम साहित्य साधना को एक ओर महेकतो फूल हमारे सामे हे, नवनीत जी की मालवी माय रची आतमकथा - कंई कूँ ने कंई नी कूँ। आधुनिक युग के गद्य को युग बोल्यो जाए हे। इणी गद्य साहित्य को परमाण बड़तो जई रियो हे, पण फेर बी गद्य की केई विधा हुण आज तक उपेक्षित ही हे। हिंदी साहित्य के ज देखां तो इणां माय संस्मरण, आतमकथा, जीवनी, यात्रा वृत्तांत, रेखाचित्र, डायरी जसी केई विधा सबसे कम देखवा में अइ री हे, फेर लोक भासा की बात कई करां। जाँ तक हिंदी की आतमकथा साहित्य की परम्परा की बात हे, थोड़ी सी कृतिहुण चरचा में आए हे, जेसे भारतेंदु की कुछ आप बीती कुछ जग बीती, डॉ राजेन्द्र प्रसाद की आत्मकथा, राहुल सांकृत्यायन की मेरी जीवन गाथा, पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ की आत्मकथा अपनी खबर, डॉ हरिवंशराय बच्चन की चार खण्ड में लिखी थकी आत्मकथा- क्या भूलूँ क्या याद करूँ, नीड़ का निर्माण फिर, बसेरे से दूर, दशद्वार से सोपान तक, यशपाल द्वारा तीन खण्ड में लिखी गी आतमकथा सिंहावलोकन आदि। हिंदी माय कुछ आतमकथा स्त्री ने दलित साहित्यकार हुण ने बी लिखी हे, जिणां की घणी चरचा बी हुई। इनमें खास हे, मोहनदास नैमिशराय की अपने-अपने पिंजरे, ओमप्रकाश वाल्मीकि की जूठन, मैत्रेयी पुष्पा की कस्तूरी कुण्डल बसै, तुलसीराम की मुर्दहिया और मणिकर्णिका, श्यौराज सिंह ‘बैचेन’ की मेरा बचपन मेरे कंधों पर आदि। मालवी समेत लोक भासा हुण माय आतमकथा की परंपरा देखवा के बी नी मले हे। म्हारे लगे के मालवी ज ही नी, सगळी लोक भासा हुण माय नवनीत जी या आतमकथा के पेलां पेल की आतमकथा कई सकां।
आतमकथा में व्यक्ति खुद अपना जीवन की कथा के यादगार पलहुण के आधार पे लिखे हे। इणी विधा में लेखक को निष्पक्ष होनो भोत जरूरी हे। अपणा गुण ने दोष सगळा को तटस्थ विश्लेषण करनो चहिए ने काल्पनिक बात ने घटनाहुण से बचनो चहिए। फेर वर्णन करता टेम पे घणो प्रवाह ने घणी रोचकता भी जरूरी वे। नवनीत जी की आतमकथा कंई कूँ ने कंई नी कूँ इणी प्रतिमान हुण पे खरी उतरी हे। इणी आतमकथा माय नवनीत जी का जीवन का केई रंग, केई अनुभव, केई संघर्ष ने केई व्यथा कथा मले हे। इणी आतमकथा को उद्देश्य पाठक के अपनी संघर्ष कथा के सुनावा से ज्यादा उनके दुनिया माय सामे आवा वाली मुसीबत हुण से लड़वा की तैयारी करवाणो हे। नवनीत जी ने लिख्यो बी हे, ‘म्हारी जिनगी में असो तो हे, के दुनियां रा लोग उके बांची ने साहस से मुसीबतां को सामनो करी के अपणा लक्ष्य तक पोची सकेगा। ने अपणा जीवन के सफल बनई सकेगा।‘ वी सुरु से ज पुरुषारथ करता अइ रिया हे, पण जद उनने देख्यो के केवल करम से ज कई नी वे भाग बी होनो चईये तो उनांने माननो पड्यो, ‘म्हारो यो बिसवास रियो के अणी दुनिया में करम से सब कंई पई सकांI पण पोन सो बरस की इणी उमर में इणा नतीजा पे पोच्यों के करम का सांते भाग बी होनो ज़रुरी हेI मनख़ सोचे कंई ने सोच्यो साकार करवा सारु भरपूर करम बी करे पण भाग कंई से कंई मोड़ी दे याने आगेज नी बढ़वा दे। भाग जो चावे ऊज होय हेI मण चायो करम रा बाद कमज होय हे या नीज होय।‘ नवनीत जी का सामे या चुनोती बी थी के आत्मकथा में अपना जीवन के पारदरसी ढंग से रखणो जरूरी हे, ईमे वी काफी हद तक कामयाब बी रिया हे। उनां ने अपना आतमकथा लेखन की परक्रिया का बारा में लिख्यो हे, ‘वेचार आयो आतमकथा तो लिखां ई। थोड़ो लिख़नो बी सिरु कर्यो ने वेचार आयो, कंई आतमकथा सई सई लीखां। सई सई लिखनी बडो मुसकल हेI हर मनख में कमजोरी होय। मनख मे जा सदगुण होय वां दुरगुण बी होय। या यूं कई सका के बखत मन की कमजोरी को फायदो उठइ के नाजाईज़ काम बी करवई ले। असो ऊज करे, जिका संस्कार पक्का नी होय ओर जिका संस्कार पक्का नी होय, ऊ डगमगई जाय ने गरीबी का हालत तो पतन का खाड़ा में गिरई केज माने। बाद में उके पछतानो होय पण मजबूरी असी के उको मन बी बस में नी रेवे। उकी मति भिरष्ट हुई जाय ने ऊ नी चाता हुया बी अनैतिक काम करवा लगे। म्हारे तो यो पक्को बिसवास हुईग्यो हे के मनख जो बी करे, ऊ भगवान की प्रेरणा से ई करे। चाय ऊ अच्छी या बुरो काम करेI वणी के इणा जगत में जो जो काम करवाना हे, ऊज करनो पड़ेगा।‘
इणी आतमकथा की सुरुआत नवनीत जी ने अपना जनम का गाम झोंकर, जिला शाजापुर का परिचय से करी हे, जाँ पे उनको बचपन बित्यो थो। गाम ने घर परवार का वातावरण ने उनां के केई संस्कार दिया, जिकी बानगी हम शुरुआत का केई रोचक प्रसंग में देखी सकां। इणी प्रसंगहुण माय हमारे एक ऐसा दोर का लोक जीवन की झांकी देखवा के मले हे, जीनी बखत लोग बाग भोत सादगी से ने बिना किणी परकार का आडम्बर के रेता था। झोंकर में शुरूआती शिक्षा, उज्जैन का महाराजवाड़ा में हायर सेकंडरी ने फेर माधव कॉलेज में ग्रेजुएशन की पड़ई का दोरान इणी नगर का खास धार्मिक, साहित्यिक ने सांस्कृतिक माहौल ने उनां के व्यक्तित्व के खासो प्रभावित कर्यो थो, इके बहुत अच्छा ढंग से हम याँ देखी सकां। उनां का जीवन माय केई साहित्यकार आया, उनसे जुड़्या केई मार्मिक संस्मरण इणी आतमकथा की रोचकता के बड़ाए हे। काम काज ने नोकरी से लई ने परवार का पालन पोसन तक, हिंदी में क्षणिका ने गीत- नवगीत लिखवा से लई ने कविता पाठ ने प्रकाशन को सिलसिलो – इणा सब के बी नवनीत जी ने बेती वी भासा में पिरोयो हे। साहित्य का क्षेत्र में नवनीत जी केई दशक से सक्रिय हे, पन पिछला दो तीन दसक से तो उनां ने अपनो तन, मन ने धन सब कईं मालवी का सारू अरपित करी दियो हे। मालवी को प्रचार, प्रसार ने ऊका माय लेखन ने परकाशन सारू किया ग्या उनां का जी तोड़ परयास के हम पोथी का उत्तरार्ध वाला हिस्सा में देखी सकां हाँ। वी खुद मालवी माय लेखन, अनुवाद ने प्रकाशन में जुट्या रे ने नवी पीड़ी के भी आगे बड़ावा सारू खूब काम करे हे। मालवी का ठावा कवि श्री झलक निगम का साथे मिली ने मालवी माय पत्रिका को अभाव के खतम करवा वास्ते फूल पाती ने जगर मगर की सुरुआत करी। इणा पत्रिका माय उनां ने केई पेलां का लोगां के जोड्यो तो नई उछेर के बी आगे बड़ायो। इणी पत्रिका हुण का प्रकाशन की मुस्कल भरी यात्रा बी इणी आतमकथा माय समइ हे। जमुनादेवी लोक साहित्य संस्थान की संकल्पना, मालवी चोपाल की सुरुआत, केई किताब हुण को लेखन ने प्रकासन की प्रक्रिया के विस्तार से नवनीत जी ने वर्णन कर्यो हे। उनां की बेटी रचना नन्दिनी सक्सेना बी लेखन में जुटी गी हे, उनां की पोथीहुण का प्रकासन की कथा बी इणी आतमकथा माय अइ हे।
श्रीवास्तव जी ने भारतीय भाषाहुण से केई खास कृति हुण को मालवी में उल्थो कर्यो हे। केई दफा साधारण सा दिखवा वाला कथन को अनुवाद जद मुस्कल हुई जाए तो साहित्य, खास तोर पे कविता को उल्थो तो भोत कठन ने चुनोती देवा वालो होए हे। पण नवनीत जी इणी चुनोती का सामना करवा में अगवान हे। इणी आतमकथा माय उनां ने अपणा एसाज अनुवाद काम को जिकर भी कर्यो हे, जिणां में रामचरित मानस ने भरतरी का तीन सतक खास हे। भरतरी का तीनी सतक को अनुवाद हिंदी ने दूसरी केई भाषाहुण में वियो हे, पण लोक भाषा मालवी में पद्यानुवाद को बड़ो काम हात में लईने नवनीत जी ने बोत बड़ी चुनोती स्वीकार करी थी। तीन साल तक वी इणी काम में लग्या रिया ने केई बार मुसकल देखी ने घबराया बी, पण आखर में वी सफल हुआ हे। मालवी भरथरी सतक शीर्षक से हाल में ज प्रकाशित इणी अनुवाद माय उनां ने केई प्रसंग में भरतरी का भाव को विस्तार कर्यो हे तो कई जगा कठन से कठन बात के बी बड़ी सहजता से मालवी पद्य में राखी दी हे। सिंगार वर्णन का मोका पे कईं बी उनां प्रसंग के अश्लील नी बनवा दियो हे। कुछेक बानगी देखो:
मोटा, लांबा ने काला जेरीला सांप खई जाय,
वी भयानक नी, दवई कर्या ती जेर उतरी जाय,
पण लांबी, मोटी, जंघा ने तेडी मोया' वाली कामनी काट्रयो मनख, भोंया वाली
कामनी काट्यो मनख दवई कर्या नी बची पाय।
पांची इंदरी मनख के काम में ई लगई रखे
इनमे ती एक की किरिया, ग्यान के दबई रखे,
ऊ काम सुख पई, परमारथ ग्यान भूलें, इंद्री हुण
उके अपनो लक्ष भुलाय ने काम में फंसई रखे।
जो जोबन मदिरा छके, उपे काम को कोप हे रे,
उके मिरगी आय, तन टूटे, आँख्या नचाय हे रे,
मिरगी दवई ती ठीक हुई जाय हे, पण इणी रोग पे
कोई दवई, जंतर नी लगे, यो रोग बुरो है रे।
कामी मनख धन जोबन, काम आय दे झोक।
बेरा अपनी अदा ती, ग्यान, सोच दे रोक।।
नवनीत जी लोक का प्रति गेरी निष्ठा रखवा वाला कवि ने गद्यकार हे। वी इणा सारू दन रात लग्या रे हे। पचत्तर साल की उम्मर का पड़ाव पे बी उनां को उत्साह ने नवा नवा रचवा की साध देखवा लायक हे। इणी आतमकथा माय उनां को यो उत्साह ने लिखवा की उमंग जगे जगे नगे आए। वी इणी तरा माँ मालवी खोली भरता रे, ऐसी कामना हर मालवी परेमी की हे।
प्रो शैलेन्द्रकुमार शर्मा
आचार्य एवं हििंदी विभागाध्यक्ष
कुलानुशासक
विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन
ई मेल : shailendrasharma1966@gmail.com
मालवी साहित्य और संस्कृति के अन्यतम हस्ताक्षर श्री झलक निगम (1940-2010 ई.) एक साथ अनेक दिशाओं में सक्रिय थे। उन्होंने मालवी को कई दृष्टियों से समृद्ध किया है। एक ओर उन्होंनेमालवी साहित्य को अनेक महत्त्वपूर्ण कविताएँ और गद्य रचनाएँ देकर समृद्ध किया, वहीँ एक श्रेष्ठ अनुवादक, संपादक, शोधकर्ता के रूप में विविधमुखी अवदान दिया। उनकी रचनाओं में प्रयोगधर्मिता उभार पर है, जिसके लिए वे विशिष्ट पहचान रखते हैं। झलक जी का कौशल सर्वथा, अनछुए, अलक्षित विषयों को कविता में ढालने में दिखाई देता है। वे दिनों दिन बढ़ते कथित महानगरीकरण में ओझल होते लोक-जीवन के उन दृश्यों को अनायास पकड़ लेते हैं, जो हमारी जैविकता के प्रमाण रहे हैं। उनके मालवी कविता संग्रहों में ‘एरे मेरे की कविता’ (2003 ई.) एवं ‘उजालो आवा दो’ (2006) विशेष उल्लेखनीय हैं। ‘भाँत भाँत की कविता’ शीर्षक एक संग्रह उनके निधन के बाद 2011 में प्रकाशित हुआ। झलक निगम उन कवियों में एक हैं, जिन्होंने मालवी कविता की बनी-बनाई लीक को तोड़ने की कोशिश की। साथ ही अपने ढंग से उसे नए सिरे से बनाने की कोशिश भी की। मालवी या किसी अन्य लोक बोली में श्री निगम जैसे साहसी कवि कम ही नजर आते हैं, जिन्होंने पुराने और नए दौर की लोक कविता के बीच सेतु की भूमिका निभाई है। उनकी रचनाधर्मिता वर्ण्य-विषय और भाषा की एक नई दुनिया खोलती है। छन्द और लय के संस्कारों के बावजूद लोक-कविता को छंद से मुक्त करने से लेकर नई संवेदनाओं और नए विचारों को नए अंदाज में व्यक्त करने के झलक जी के प्रयत्न महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुए।
मालवी में स्वतंत्र पत्रिका के अभाव की पूर्ति सबसे पहले नरेन्द्र श्रीवास्तव ‘नवनीत’ एवं झलक निगम के संपादन में प्रकाशित ‘फूल-पाती’ से हुई, जिसके अब तक कई अंक प्रकाशित हो चुके हैं। इसी कड़ी में श्री झलक निगम के संपादन में वार्षिक पत्रिका ‘जगर मगर’ का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। उनके निधन के बाद श्री निगम की सुपुत्री जेड. श्वेतिमा निगम इसका कुशल संपादन कर रही हैं। ‘जगर मगर’ के अनेक विशेषांक प्रकाशित हुए हैं। झलक जी द्वारा संस्थापित मालवी की इन अव्यावसायिक पत्रिकाओं के प्रकाशन से आज इस क्षेत्र में बहुत बड़े अभाव की पूर्ति हो रही है।
झलक निगम लम्बे समय से मालवी की विशिष्ट शब्दावली पर कार्य कर रहे थे। उन्होंने सुगम राजपथ पर न चलते हुए अक्षर की पगडण्डी पर चलना स्वीकार किया। उनकी इस अत्यंत परिश्रमपूर्वक की गई यात्रा की उपलब्धि है यह पोथी। ‘अक्षर पगडंडी’ शीर्षक ग्रन्थ झलक जी के जीवन की बड़ी साध और साधना का साकार रूप है, जिसकी पूर्णता के लिए उन्होंने दशकों तक कार्य किया। गाँव-गाँव, डगर-डगर घूमते हुए वे एक सजग शब्द-संग्राहक के रूप में अपनी झोली भरते रहे और फिर एक जिज्ञासु की तरह उन शब्दों की व्युत्पत्ति, काल-प्रवाह में आए अर्थ परिवर्तन की मीमांसा करते रहे। यह सुखद है कि उनकी सुपुत्री जेड. श्वेतिमा निगम ने उनकी डायरी और अलग-अलग पन्नों में बिखरे इन शब्द-मोतियों को सँजोने का सार्थक उद्यम किया है, जो हमारे समक्ष है।
झलक जी स्वयं मालवी के विशिष्ट शब्दों, मुहावरों और कहावतों के सजग प्रयोक्ता भी रहे हैं। जीवन से कविता तक वे मालवी की समृद्ध शब्द-राशि का अर्थपूर्ण इस्तेमाल करते रहे। इसीलिए झलक जी की कविताएँ सही अर्थों में लोक हृदय का सार्थक प्रतिबिंब बन पड़ी हैं। वहाँ हमारे युग जीवन की आहट और सामयिक दबाव तो कारगर दिखाई देते ही है, इनसे परे जीवन के शाश्वत प्रवाह के साथ बहने का, मालवा के ऋतु-रंग और पर्यावरण में डूबने का सहज व्यापार भी मुखरित हुआ है। उनकी एक कविता में मालवी शब्दावली के सजग प्रयोग से सम्पन्न परिवेश के साथ काले बादल का खिलदंड़ापन हमें उसी तरह आनंदित करता है, जैसा किसी धरती पुत्र किसान या कामगार को। कवि हमें उसके स्वागत में मालवी लोक-संस्कृति के आचार-व्यवहार के साथ ला खड़ा कर देता है।
घणा हऊ बखत पे आया हो
म्हूँ गाम का आड़ी तो
तमारे नारेल चड़ऊँ दूध ढोलू
अगवानी में कंकू अखत चड़ऊँ
ओ झरता झरमट करता बादला
इसी तरह भारतीय समाज व्यवस्था के विसंगत चेहरे का साक्षात् कराती ‘हाली प्रथा’ को कवि श्री निगम ने चीन्हा और उसे अपनी कविता में साकार किया। वे देखते हैं कि आज भी बड़ी संख्या में हाली हैं, जो बंधुआ मजदूर से भी बदतर जिन्दगी जी रहे हैं। उन्हें न दिन में चैन है और न रात में आराम। उस पर यह कहावत ‘‘हाली मवाली को कई है या जात भरोसे का लायक होयज नी है।’’ हाशिये के ऐसे यशहीन लोगों की व्यथा को कवि ने गहरी सहानुभूति के साथ उकेरा।
घाणी का बैल जस भमता रेवे
फेर भी जस कोनी हाली का भाग में
दुनियां काँ जई री, ऊन्के नी मालम
देस में कून राजा कुन पाल्टी को राज।
लोकभाषाओं के शब्दकोश तो अनेक बने हैं, किन्तु विशिष्ट शब्दावली, जिसमें पारिभाषिक शब्दावली भी समाहित होती है, के विवेचनात्मक परिचय को लेकर बहुत कम कार्य ही हुए हैं।राजस्थानी, भोजपुरी, अवधी, ब्रजी जैसी कुछ लोकभाषाओं में इस तरह का कार्य हुआ है। मालवी में कथाकार स्व. चंद्रशेखर दुबे ने ‘जिंदगी के गीत’ पुस्तिका में इस तरह के चुनिन्दा शब्दों का संकलन कर परिचय दिया था। उसी पथ पर आगे चलकर श्री झलक निगम ने मालवी में इस तरह की विशिष्ट शब्दावली के संग्रह के अभाव की पूर्ति ‘अक्षर पगडंडी’ के माध्यम से की है।
लोक के शब्द लंबी यात्रा करते हैं। झलक निगम द्वारा तैयार इस कोश में ऐसे कई शब्द हैं जो काल प्रवाह में गति करते हुए अपनी पहचान को बरकरार रखे हैं। जैसे दान के रूप में अर्पित की जाने वाली अखोती, अक्षत का ही रूप है। पंचामृत दूध, दही, घी, शहद और शकर के मेल से निर्मित प्रसाद है तो पंजेरी पिसे हुए धनिये के साथ शकर या गुड़ का मिश्रण है, जो कृष्ण जन्माष्टमी पर पूजा में अर्पित किया जाता है। काशी जाना यज्ञोपवीत के अवसर पर विद्याध्ययन के लिए प्रवृत्त होने का प्रतीक है, वहीं पस्ताव तीर्थयात्रा के लिए प्रस्थान की क्रिया है, जो अपशकुन से बचाव के लिये की जाती है। इसमें तीर्थयात्री अपना सामान पहले किसी परिचित के यहाँ रख देते हैं, बाद में वास्तविक यात्रा प्रारम्भ करने पर वहीं से सामान उठा कर चल देते हैं।
इस शब्द संचयन में संकलित शब्द कई प्रकार के हैं। उदाहरण के रूप में कृषि एवं व्यवसाय संबंधी, पारंपरिक ज्ञानविज्ञानपरक,लोकाचारपरक, संस्कारपरक, क्रीड़ा, कला एवं मनोरंजनपरक, लोक-देवता एवं पर्वोत्सव संबंधी, वस्तु संबंधी, विशिष्ट क्रियापरक, शृंगार एवं वस्त्राभूषण संबंधी, लोक-विश्वासपरक आदि। संग्रह के बहुत से शब्द मालवा में प्रचलित लोकाचारों का संवहन करते हैं। उदाहरण के रूप में संजा, मांडना, हिरणी, वलसो,मौसर, नातरा, तेड़ा, मांडवो, जलवा, आदि। क्रीड़ा, कला एवं मनोरंजनपरक शब्दों में सतोलिया, माच, छुपमछई, कामण आदि को देखा जा सकता है। कृषि एवं व्यवसाय संबंधी विशिष्ट शब्दों में वखार, वावस्यां, निहरनी आदि उल्लेखनीय हैं। शृंगार एवं वस्त्राभूषण संबंधी शब्दों में कांकण, कांचली, ओढ़नी आदि को देखा जा सकता है।
झलक जी ने कई विलुत होती परम्पराओं, रीति-रिवाजों और वस्तुओं से जुड़े पारिभाषिक शब्दों को भी इस कोश में स्थान दिया है। हीड़, बेकड़ली आदि इसी प्रकार के शब्द हैं। बेकड़ली घर-घर जाकर अनाज मांगने की प्रथा है, जो अब लगभग विलुप्ति के कगार पर है। हीड़ मालवा की प्रबन्धात्मक वीरगाथा है, जो बगड़ावत के रूप में सुविख्यात है।
इस संग्रह में कई पारंपरिक ज्ञान-विज्ञानपरक शब्द भी संचित हैं, जैसे चींटियों के आवास को मालवी में कीड़ी नगरा कहा जाता है। मगर-कोदो वह पौधा है, जो जलराशि के किनारे पनपता है और उसे मगर बड़े चाव से खाता है। थुवर, थाला, थाग, तेलन (एक विशिष्ट कीड़ा), छुईमुई, छेक, घट्टी की माकड़ी, गोयरा, काबर, ओरा, हात्या आदि भी इसी प्रकार के हैं, जिनसे पारंपरिक ज्ञान का संवहन होता आ रहा है।
समग्रतः यह पोथी एक लोक-मनीषी की शब्द साधना का साकार रूप है। इस संचयन के लिए झलक जी ने बड़ी दुरूह राह अपनाई थी। मालवीप्रेमियों, साहित्यकारों के साथ ही आने वाले शोधकों के लिए उनका यह प्रयत्न अत्यंत उपयोगी और प्रेरणास्पद सिद्ध होगा, इसमें कोई संदेह नहीं।